Showing posts with label Namdhari. Show all posts
Showing posts with label Namdhari. Show all posts

Thursday, 9 February 2023

नामधारियों ने किया हवन से पूजन अर्चन

Wednesday 8th February 2023 at 07:45 PM

हवन में महिलाओं ने भी सक्रिय योगदान दिया//भजन गायन भी हुआ   


कुरुक्षेत्र: 8 फरवरी 2023: (कार्तिक सिंह//आराधना टाईम्ज़)::

हवन के फायदे अनगिनत हैं। इसकी महिमा अपरम्पार है। हवन करने और करवाने वाली ही इससे मिलने वाले आनंद को महसूस कर सकते हैं। हवन की खूबियों के कारण बड़े बड़े लोग और राजनेता हवन करना आवश्यक समझते हैं। पर्यावरण को शुद्धता प्रदान करने के साथ साथ हवन के पास बैठने मात्र से ही मन की चिंता, संताप, शोक और रोग मिटने लगते हैं। मन में एक नया उत्साह आने लगता है। दिल और दिमाग में एक नई शक्ति का अद्भुत संचार सा होता हुआ महसूस होने लगते है। 

नामधारियों ने एक बार फिर से पूरी आस्था से कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक भूमि पर पहुंच कर किया हवन का आयोजन। यह जानकारी संत तेजिंदर सिंह नामधारी ने दी।  ऐसी बहुत सी वजहें और कारण हैं कि नामधारी समुदाय में हवन को आज भी विशेष स्थान प्राप्त है। बहुत सी आलोचना और विरोध के बावजूद नामधारी संगत से जुड़े भक्त लोग पूरी आस्था के साथ अक्सर हवन करते हैं। 

गौरतलब है कि नामधारी पंथ की स्थापना के समय से ही इसकी परम्परा एवं मर्यादा रही है। इस बार भी आठ फरवरी 2023 को स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वितीय जन्म शताब्दी के सबंध में हवन का विशेष आयोजन कुरुक्षेत्र में किया गया। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के आश्रम में यह एक अलौकिक सा अनुभव था। एक अध्यात्मिक ऊंचाई की अनुभूतियों से भरा हुआ अनुभव। इसमें नामधारी संगत ने अपने रूटीन की तरह यहां इस आश्रम में भी बहुत ही स्नेह और सम्मान से हवन का आयोजन किया। 

इस हवन में आहुतियां डालने वालों में सुश्री संदीप कौर ने पूरी मर्यादा के साथ हर औपचारिकता निभाई। इस हवन में उनके साथ सूबा अमरीक सिंह, सूबा रतन सिंह, प्रधान अरविन्द्र सिंह, दिल्ली यूनिट के प्रधान चरणजीत सिंह यमुनानगर, तेजिंदर सिंह और अन्य गणमान्य लोग भी शामिल हुए। इस मौके पर अंतरात्मा को छूने वाला भजन कीर्तन भी हुआ जिसके सुनते हुए मन दुनियादारी के झमेलों से हट कर आत्मिक आनंद की तरफ बहने लगता है। 

धर्मकर्म के क्षेत्र में आराधना टाईम्ज़ की कवरेज और प्रस्तुति क्षमता को मज़बूत बनाने में सहयोगी बनिए। 

निरंतर सामाजिक चेतना और जनहित ब्लॉग मीडिया में योगदान दें। हर दिन, हर हफ्ते, हर महीने या कभी-कभी इस शुभ कार्य के लिए आप जो भी राशि खर्च कर सकते हैं, उसे अवश्य ही खर्च करना चाहिए। आप इसे नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके आसानी से कर सकते हैं।

Tuesday, 18 October 2022

वार्षिक जप-प्रयोग तथा अस्सू का मेला श्रद्धा और आस्था से लगा

होती रही प्रेम, ज्ञान, भक्ति और आध्यात्मिकता के रंगों की अमृत वर्षा 

सतगुरु दलीप सिंह जी  गुरु के अवतरण की ज़रूरत और अहमियत 

*जब तक गुरु अवतार धारण करके नहीं आते तब तक मार्गदर्शन भी नहीं 

*तब तक गुरुवाणी को भी समझा नहीं जा सकता  

श्री गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब, डेरा बाबा तरसेम सिंह में  दीवान 


डेरा कार सेवा बाबा तरसेम सिंह/उत्तराखंड: 17  अक्टूबर 2022:(गुरमीत सग्गु//आराधना टाईम्ज़)::  

प्रत्येक बरस की तरह इस वर्ष भी सतगुरु दलीप सिंह जी की छत्रछाया में नामधारी संगत द्वारा रखे गए  40 दिन के वार्षिक जप-प्रयोग (सिमरन साधना) के उपरांत दो दिनों का अस्सू का मेला; आपसी एकता, प्रेम, ज्ञान, भक्ति और आध्यात्मिकता के रंग बिखेरता हुआ सम्पन्न हुआ। 
इस दौरान अनुशासन के नियमों का भी पूरी तरह से पालन किया गया और प्रत्येक प्रोग्राम को लाइव टेलेकास्ट कर, दूर बैठी संगतों तक संचारित किया गया। वर्णनयोग्य है कि नामधारी पंथ के सृजनहार सतगुरु राम सिंह जी द्वारा दर्शाये गए दिशा-निर्देश अनुसार चलते हुए, नामधारी सिक्ख प्रत्येक वर्ष जप-प्रयोग के आयोजन द्वारा अपने जीवन को गुरु वाणी अनुसार जीने तथा इस पर दृढ रहने का अभ्यास करते हैं। इस दौरान अमृत वेले से लेकर शाम तक लगभग  8-9 घण्टे परमात्मा के साथ जुड़कर, एकाग्रचित हो कर सेवा-सिमरन, कथा-कीर्तन, गुरु इतिहास की जानकारी लेते हुए एक आदर्श जीवन जीने के गुण सीखते हैं। इस समागम में विशेष रूप से सतगुरु दलीप सिंह जी ने विदेश से लाईव दर्शन देकर अपने प्रवचनों से निहाल किया। आपने संगत को गुरुवाणी आशय अनुसार चलते हुए अपने परिवारिक व समाजिक जीवन सुखी रखने एवं आदर्श जीवन जीने के तरीके बताते हुए एक दूसरे से मीठा बोलने, क्षमा करने, विनम्रता जैसे गुण धारण करने, किसी को बुरा न कहने एवं स्त्रियों को मंदा न कहने भाव शुभ कर्म करने की भी शिक्षा दी। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि सतगुरु नानक देव जी ने "आसा की वार" में लिखा है कि जीवन में पूर्ण सतगुरु बड़े सौभाग्य से मिलते हैं और सतगुरु ही हमारे जीवन में अज्ञान का अँधेरा दूर कर सकता है तथा सतगुरु के चरण कमलों से जुड़ कर जीवन का पार उतारा हो सकता है। आपने गुरुवाणी और गुरु को भिन्न बताया और कहा कि जब तक गुरु अवतार धारण करके नहीं आते, गुरुवाणी को समझा नहीं समझा जा सकता, क्योंकि गुरुवाणी तो गुरु जी के मुखवाक से उच्चारी हुई है। इसके साथ ही आपने कहा कि नामधारी सतगुरु राम सिंह जी को हमेशा याद रखने को कहा क्योंकि उन्होंने हमें गुरुवाणी के साथ जोड़ा एवं शुभ कर्म करने लगाया। 

40 दिन लगातार चलता हुआ यह कार्यक्रम प्रतिदिन आनन्द और सकारात्मक-ऊर्जा प्रदान करता रहा।  इन दिनों में वातावरण को शुद्ध करने लिए हवन आदि भी मर्यादा अनुसार किए गए। इस अवसर पर गुरमत मर्यादा अनुसार,  गुरुवाणी के पाठों के भोग डाले गए एवं गुरु का अतूट लंगर वितरित किया। इस शुभ अवसर पर कथा- कीर्तन एवं नाम-वाणी का प्रवाह चला। यह सारा कार्यक्रम गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब, डेरा कार सेवा बाबा तरसेम सिंह / उत्तराखंड कमेटी के सहयोग से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर सूबा भगत सिंह जी बहेड़ी, जथेदार  कवि पंजाब सिंह पंजाब, सूबा तरसेम सिंह जी इंग्लैंड, सूबा रतन सिंह जी, सूबा अमरीक  सिंह जी, जत्थेदार संत करतार सिंह नशहरे वाले, जत्थेदार अमरीक सिंह, जत्थेदार अवतार सिंह, जत्थेदार गोपाल सिंह, जत्थेदार कृपा सिंह, सूबा दर्शन सिंह जी, गुरमीत सग्गु दिल्ली, जत्थेदार मनमोहन सिंह जी,  ब्लॉक प्रमुख खटीमा रणजीत सिंह नामधारी, साधु सिंह नामधारी, संत कुलतार सिंह नामधारी, सुरेंदर सिंह नामधारी, राजपाल जी उपाध्यक्ष किसान आयोग उत्तराखण्ड, सरदार सुखदेव सिंह नामधारी बाजपुर, बलदेव सिंह नामधारी बाजपुर, एवं उनका जथा एवं कुछ खास शख्सियतों ने शामूलियत की

समाजिक चेतना और जन सरोकारों से जुड़े हुए ब्लॉग मीडिया को मज़बूत करने के लिए आप आप अपनी इच्छा के मुताबिक आर्थिक सहयोग भी करें तांकि इस तरह का जन  मीडिया जारी रह सके।

Saturday, 6 August 2022

हरप्रीत कौर प्रीत ने बताई आध्यत्मिक अनुभवों की कुछ बातें

 ठाकुर दलीप सिंह जी के 69वें प्रकाश पर्व पर विशेष 


लुधियाना: 5 अगस्त 2022: (कार्तिका सिंह//आराधना टाईम्ज़)::

भगवान है या नहीं! है तो किस रूप में है! मिलेगा तो कहां मिलेगा! इन सभी सवालों की जवाब किसी नास्तिक या तर्कशील के लिए निरथर्क हो सकते हैं लेकिन अध्यात्म की दुनिया में इन सवालों के जवाब बहुत बार बहुत से लोगों ने ढूंढे हैं। उन्होंने अपने अपने इष्ट के दर्शन कई कई बार किए हैं। स्वामी विवेकानंद जैसा नास्तिक और तर्कशील व्यक्ति भी जब सवाली रामकृष्ण परमहंस के सनिग्ध्य में आया तो हैरान रह गया। विवेकानंद इन बातों को आसानी से मानने वालों में नहीं था। उसने सीधा सवाल भी किया क्या आप ने भगवान देखा है? जवाब भी इसी तरह का सीधा था स्वामीरामकृष्ण परमहंस ने कहा हां बिलकुल देखा है और तुम्हे भी प्रतक्ष्य दिखा सकता हूँ। स्वामी राम कृष्ण परमहंस  न केवल स्वयं मां काली के दर्शन करते थे बल्कि उन्होंने स्वामी विवेकानंद को भी मां काली के दर्शन करवाए। स्वामी रामकृष्ण परमहंस तो मां से बातें भी करते थे और उन्हें  भोजन भी करवाते थे। यह सब केवल अतीत में नहीं था। आज भी आज ऐसे सिद्ध पुरुष मिल जाते हैं। बहुत सिउ कहानियां हमारे पास हैं लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी सही। आज बात करते हैं हरप्रीत कौर प्रीत की जिसकी बातें मधुर भी हैं, रहस्यमय भी बहुत कुछ नया बताने वाली भी और ऑंखें खोलने वाली भी।  

दुनिया की बहुत सी आम लड़कियों की तरह हरप्रीत कौर भी सी लड़की ही थी। नामधारी परिवार था इसलिए घर का माहौल सात्विक था। नाम बाणी और कीर्तन का परवाह किसी न किसी बहाने चलता रहता। नामधारी लाईफ स्टाईल के मुताबिक सफेद रंग की पौशाक उसे दिव्यता प्रदान करती।  जब आंखें बंद करके अरदास में जुड़ती तो लगता किसी और ही दुनिया से आई है। सफेद वस्त्रों में दिव्यता का संदेश देती कोई परी है शायद। वस्त्रों की सफेदी जीवनभर स्वयं को बेदाग़ रखने का संकल्प समरण करवाती रहती है। वह कैसे "एक जोत दो रूप" बनी इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है। बिलकुल सच्ची कहानी। 

बहुत पूछने पर वह कहती यह तो मेरा रूहानी खज़ाना है। पूरी तरह व्यकितिगत और गोपनीय। इसे सबसे शेयर  नहीं कर सकती। इससे अध्यात्म की शक्ति क्षीण होने लगती है। इंसान चमत्कारों में उलझ जाता है। ऋद्धियां   सिद्धियां उसे भगवान के सच्चे मार्ग से भटका देती हैं इस लिए इस पर प्लीज़ कुछ मत पूछो। फिर कोई  बात निकालनी पड़ती है। बार बार गुजारिशों करनी पड़ती है पर हरप्रीत कौर प्रीत बस एक झलक की बात बताने को राज़ी हो जाती है।  साथ ही चेतावनी भी देती है ऐसी बातें न किसी से पूछा करो न ही बताया करो। इन अनुभवों को पूरी तरह गुप्त रखने से ही फायदा होता है। भगवान और उसकी दुनिया की झलक आम बातों में आती ही नहीं। जब भगवान चाहते हैं कि दुनिया तक कोई बात पहुंचानी है तो भगवान इसका माहौल भी स्वयं ही तैयार करते हैं। किस के ज़रिए सारी बात कहनी है उसका चुनाव भी भगवान स्वयं करते हैं। मुझे भगवान के विधिविधान में दख्ल देने का कोई अधिकार ही नहीं। जब जब ठाकुर जी कृपा करते हैं तब तब ही मैं कुछ कर या कह पाती हूं। बार बार ज़ोर देने पर वह राज़ी होती है संक्षिप्त सी चर्चा के लिए। वह बताती है जबकी बात है वह वक्त था जब नामधारी समाज के गुरु की ज़िम्मेदारी सतिगुरु जगजीत सिंह जी के चरणों में थी। 

समय तेज़ी से गुज़रता जा रहा था। सतिगुरु जगजीत सिंह जी का शरीर कमज़ोर होता होता क्षीण होता जा रहा था। सतगुरु जगजीत सिंह जी के शरीर छोड़ने के कुछ महीने पहले ही मुझे सपने में उनके दर्शन हुए। इस दर्शन में ही  सतिगुरु जगजीत सिंह जी वो मेरा हाथ किसी और को पकड़ा कर खुद दूर चले गए।  मैं अचंभित थी।  भी थी। कुछ उलझन भी बढ़ गई थी। कौन है वह जिसके हाथों में सतिगिरु जगजीत सिंह मेरा हाथ पकड़ा कर स्वयं  गए हैं। कुछ समझ नहीं आ रहा था। एक दिन खबर आई सतिगुरु जगजीत सिंह जी सचमुच हम सभी को छोड़ कर इस लोक से उस लोक में चले गए हैं। सब अख़बारों  वह नहीं रहे। तब मुझे स्वप्न समझ आने लगा। 

जब गुरु जी शरीर छोड़ कर सचमुच चले गए। तब से उस अज्ञात चेहरे की " मक्खन शाह लुभाने" की तरह तलाश करने लगी। किसको पकड़ाया हाथ? कुछ समझ न आता।  हर पल आंखों में आंसू बहते रहते थे। उस बिरहा के पलों में दर्द शायरी लिखने की आदत पढ़ गई।  मुझे शायरी।   घरेलू लड़की से लेखिका बन गई। मैं उस वक्त भी नहीं जानती थी कि भगवान लीला कर रहे हैं। वास्तव में मुझे  यह दर्द और निखारने के लिए दिया गया था। इस बिरहा के दर्द  दुनिया  करना शुरू कर दिया। इसी तरह दो महीने बीत गए। मुझे अपने नए सदगुरु के दीदार नहीं हुए। मुझे लगता सदगुरु मेरे साथ लुकाछिपी का कोई खेल रहे हैं। हैं। आसपास ही हैं लेकिन दिखाई नहीं दे रहे हैं। 

फिर संकेत मिला नए सदगुरु ठाकुर दलीप सिंह जी ही हैं लेकिन एक बार भी उनके दीदार नहीं हुए। मेरी तड़प शिखर छूने लगी। जहां वो जाते थे, मैं भी वहीँ मिलने के लिए जाती लेकिन मेरे पहुंचने से पहले ही वह कहीं ओर रवाना हो जाते थे। मुझे गुस्सा भी आता। खीझ भी आती लेकिन अंत में केवल आँखों में आंसू ही बचते। फिर किसी अनुभवी साधक ने बताया किस्मत वाली हो। यह आंसू बिना नसीब के कहां  मिलते हैं।  बस इसी तरह काफी देर  चलता रहा। दीवानगी जैसी हालत बन गई। इंतज़ार हर पल रहने लगी। फिर मेरे इंतजार की भी इंतहा हो गई। कहीं से कुछ खबर मिली तो मैं उन्हें मिलने उत्तर प्रदेश स्थित एक गांव में चली गई। वहां पर भी दर्शन तो हुए पर प्यास नही मिट रही थी। उन्हें अपनी बिरहा का हाल सुनाने के लिए  स्टेज पर समय ले लिया। उनकी याद में जो बिरहा के गीत लिखे थे। रोते रोते स्टेज पर ही सुना आई। फिर ठाकुर जी ख़ुद भी वैराग में आ गए। सारा पंडाल ही आंसू बहाने लगा था। शयद मेरी विनती सुन ली गई थी। मेरी तड़प देख। मेरे आंसू उस दर पर कबूल हो गए थे। 

फिर ठाकुर जी से विनती कर चरणों में सीस रख बिरहा शांत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। तबसे ठाकुर जी ने बांह पकड़ी है " जीवन जीने की कला उन्होंने ही सिखाई है"। मुझमें जो भी है गुण उन्ही के हैं। उस वक्त अहसास हुआ-

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लगूं पाए। 

बलिहारी गुर आपने, जिन गोविंद दियो मिलाए।।

उसके बाद बहुत कुछ हुआ। बहुत से करिश्मे हुए। बहुत से चमत्कार भी हुए। मैंने तो हैरान होना भी छोड़ दिया। बस एक दर्शक की भांति देखती जाती। मैं किसी काबिल नहीं थी लेकिन ठाकुर जी ने अपनी कृपा से मेरे ही हाथों  बहुत से काम करवाए।  आ जाते हैं। गला है।  लगती है। हम भी कुछ पल रुक जाते हैं। जल्द ही हम कोशिश करेंगे अन्य बातें ही आपके सामने ला सकें अपनी किसी नई पोस्ट में। जिनमें होगी बहुत से दिव्य चमत्कारों और करिश्मों  की बात जो आपको भी हैरान कर देगी। --कार्तिका सिंह 

Tuesday, 24 May 2022

ब्राह्मण समाज ने चेतना सम्मेलन में भरी हुंकार

24th May 2022 at 2:05 PM

ब्राह्मण हिंदू समाज को संगठित करके राष्ट्र सेवा में लगे हैं 

पंडित सुनील भराला ने किया संस्कृति,धर्म,सेवा और समर्पण में अग्रसित होने का भी दावा 


लुधियाना
: 24 मई 2022:  (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::
महानगर के पंजाब ट्रेड सेंटर मिल्लरगंज में ब्राह्मण समाज द्वारा राष्ट्रीय ब्राह्मण युवजन सभा के बैनर तले ब्राह्मण चेतना सम्मेलन और भगवान परशुराम जयंती के उपलक्ष में कार्यक्रम का आयोजन हुआ जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम मंत्री पंडित सुनील भराला मुख्याथिति रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता करने वालों में राष्ट्रीय ब्राह्मण युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भृगुवंशी आशुतोष पांडे ने की कार्यक्रम में नागेंद्र शर्मा अध्यक्ष सुशासन विभाग भाजपा हरियाणा, उद्योगपति टी आर मिश्रा, नामधारी समाज के प्रमुख संत ठाकुर दलीप सिंह जी की तरफ से स.हरविंदर सिंह नामधारी और ब्राह्मण समाज के वरिष्ठ नेता राजेश मिश्रा विशेष तौर पर उपस्थित रहे। 
इस आयोजन में रिग्स इंटरनेशनल स्कूल अंबेडकर नगर के बच्चो ने मंत्रों के उच्चारण किए कार्यक्रम का संचालन पंडित अवधेश पांडे ने किया भगवान परशुराम जी के पूजन अर्चन उपरांत आरंभ हुए इस कार्यक्रम में संगोष्ठी दौरान विद्वान ब्राह्मणों ने अपने विचारों से सदन को अवगत करवाया और समाज के हर विषय पर विस्तृत चर्चा हुई। 
इस आयोजन को संबोधन करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम मंत्री पंडित सुनील भराला ने कहा की ब्राह्मण समाज ज्ञान और संस्कारों का धनी है। आज कुछ अराजक तत्व भगवान परशुराम जी के इतिहास और उनके विचारों को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। हमे अपने इतिहास अपने आराध्य देव और संस्कृति को हर घर में पहुंचाना है। आज हमारा ब्राह्मण समाज हिंदू समाज को संगठित करके राष्ट्र, संस्कृति,धर्म,सेवा और समर्पण में अग्रसित है। हमे अपने साथ साथ अन्य वर्गो के उत्थान के लिए भी संकल्पित होना होगा। ब्राह्मण हर वर्ग का कल्याण चाहता है कार्यक्रम में विदेश से नामधारी समाज के प्रमुख गुरु ठाकुर दिलीप सिंह जी का दूरभाष के माध्यम से उद्बोधन हुआ जिन्होंने शहीद ब्राह्मणों का ज़िक्र करते सभा को उनकी याद में आयोजन हेतु प्रेरित करते चेतना सम्मेलन की बधाई दी। 
इस अवसर पर भृगुवंशी आशुतोष पांडे ने कहा कि संगठन समाज को इकठ्ठा करके समाज की लड़ाई को हर स्तर पर लड़ने का प्रयास कर रहा है। अन्य आयोगों की तर्ज पर स्वर्ण आयोग का गठन होना चाहिए तभी इस वर्ग का कल्याण हो सकता है। इस अवसर पर अतिथियों को सम्मानित भी किया गया। 
कार्यक्रम में आए हुए अतिथियों का धन्यवाद संगठन के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र मिश्रा ने किया इस अवसर पर ए एन मिश्रा,सुनील त्रिपाठी, पराग दत्त शुक्ला, डी एस ठाकुर, रमेश पांडे,दिनेश मिश्रा, सुनील तिवारी, लक्ष्मीकांत तिवारी, प्रशांत पाठक, नागेंद्र मिश्रा, दिनेश चौबे, राजेश पांडे, मंत्री पांडे, राजमणि मिश्रा, अजय कौशिक, पल्लू तिवारी, राम चन्द्र दिवेदी, संतोष उपाध्याय सहित बड़ी संख्या में लोग शामिल रहे। 

Wednesday, 15 December 2021

सिख कौन है//ठाकुर दलीप सिंह जी की कलम से विशेष लेख

15th December 2021 at 9:12 PM

किन श्रद्धालुओं को मिलाकर , “सिख पंथ/धर्म” बनता है ?

१ਓ सतिगुरु प्रसादि।                 


सतगुरु नानक देव जी पर श्रद्धा रखने वाला प्रत्येक प्राणी “सिख" है , क्योंकि "सिखी" श्रद्धा से है; मेरे प्रभि सरधा भगति मनि भावे ( महला १ ) | जिस सर्प ने गुरु जी पर छाया की थी, वह भी “सिख" था। सभी गुरु नानक नाम लेवा (नानक पंथियों) को मिलाकर ही "सम्पूर्ण सिख पंथ" बनता है। 
इस लेख के लेखक
ठाकुर दलीप सिंह
 
"सिख पंथ", केवल “अमृतधारी खालसे" ही नहीं, जबकि “अमृतधारी खालसे " ( खालसा पंथ ) तो सम्पूर्ण सिख पंथ का एक श्रेष्ठ अंग है। भाई कन्हैया, भाई नंदलाल , दीवान टोडर मल आदि सिख; दसवें पातशाह जी के समय भी “अमृतधारी" नहीं थे लेकिन वो भी महान “ सिख" थे। आज जो भी हिन्दू, मुसलमान, जैन, बौद्ध आदि गुरु जी पर श्रद्धा रखते हैं, वो  सभी “नानकपंथी ” हैं और “सिख” ( शिष्य / मुरीद ) है। क्योंकि , गुरु जी ने कभी कोई अलग पंथ/धर्म नहीं बनाया और न ही उन्होंने कभी यह वचन दिया : " मैं यह अलग से नया पंथ बना रहा हूँ, इसका नाम “ सिख " (*अ ) होगा। 

यदि गुरु जी ने अपना नया अलग पंथ बनाकर उसको “सिख" नाम दिया होता तो मुसलमानों के बड़े - बड़े पीर : जैसे साईं मियां मीर, पीर बुद्धु शाह आदि ; कभी भी गुरु जी के श्रद्धालु न बनते। यदि गुरु जी ने अलग से नया पंथ बनाया होता, तो पीर भीखन शाह दो कुज्जियों  के स्थान पर, तीन कुज्जियाँ ले कर आता। लेकिन गुरु जी ने अपना अलगाव: अलग धर्म, अलग पंथ कभी बनाया ही नहीं। गुरु जी ने तो चमत्कार/दैविक शक्तियाँ  दिखाईं और साँझा शुभ उपदेश दिया, तभी: लामे, हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध आदि सभी सतगुरु नानक देव जी के श्रद्धालु सेवक बने। इसलिए प्रत्येक गुरु नानक नाम लेवा श्रद्धालु “सिख" है। जो भी सतगुरु नानक देव जी को मानता/श्रद्धा रखता है और उनके गद्दी नशीन गुरु साहिबानों को मानता है; चाहे वह एक को माने या अधिक को माने; वह मनुष्य अपने उसी विश्वास व श्रद्धा के साथ ही सिख/शिष्य/मुरीद है। जैसे:मुसलमान, धीरमलिए, रामराईए, सहजधारी, नामधारी आदि।

“गुरु नानक पंथियों” को, वे जिस विश्वास से भी सतगुरु नानक देव जी व उनके गद्दी नशीन गुरु साहिबानों को मानते हैं, उन श्रद्धालुओं को, उसी रूप में “ नानक पंथी ” होने के कारण “सिख" स्वीकार करना उचित है। जैसे उदासी: सतगुरु नानक देव जी के उपरांत बाबा श्री चन्द जी को, रामराईए: बाबा राम राए जी को और नामधारी: सतगुरु राम सिंह जी को मानते हैं। इसी तरह अन्य संप्रदायों की भी अपनी-अपनी मान्यताएं व विश्वास हैं, उनके विश्वास को उसी तरह ही स्वीकार  कर लेना चाहिए और किसी भी संप्रदाय को अपने विश्वास व मान्यताएं, दूसरी संप्रदाय पर थोपने नहीं चाहिए। यदि हम इस उत्तम व विशाल सोच को अपना लें, तो सभी गुरु नानक पंथियों को मिलाकर सिख पंथ की गिनती 50 करोड़ से भी अधिक हो जायेगी। (क्योंकि बहुत से हिन्दू कहलाये जाने भाई, सतगुरु नानक देव जी को मानते हैं) 

अक्टूबर-2019 में जब कराची में नगर कीर्तन निकला तो सिंधी संगत को सुसावगतम कहने के लिए  ननकाना साहिब से सैंकड़ों की संख्या में लोग बहुत ही प्रेम और सम्मान के साथ आए-देखो कितनी आस्था है सिंधियों में-नानक सभी के हैं Courtesy Photo
क्योंकि, सतगुरु नानक देव जी की रंग-बिरंगी फुलवारी के रंग-बिरंगे फूल; कई सम्प्रदाओं  के रूप में हैं। कुछ “गुरु नानक नाम लेवा सम्प्रदायों" के नाम निम्नलिखित हैं, परन्तु सभी नहीं मिले:

1) उदासी  2) सिन्धी  3) धीरमलिए 4) रामराईए  5) सति करतारिए  6) हिंदालिए  7) हीरा दासिए  8) नामधारी  9) निरंकारी  10)  निहंग  11) बंदई  12) निर्मले 13) सेवा पंथी  14) गहिर गम्भीरिए  15 ) नीलधारी 16) अकाली 17) भगतपंथी 18) सिकलीगर 19) सतनामी  20) जौहरी 21) अफगानी  22)  मरदाने के  23) असामी  24) लामे  25) वनजारे  26) अगरहारी   27) सहजधारी आदि। 

विशेष: इन सम्प्रदाओं की मान्यताएं, बाहरी स्वरुप और परंपराएं अपनी-अपनी, अलग-अलग हैं। उस अंतर व विलक्षणता के कारण ही सतगुरु नानक देव जी की फुलवाड़ी रंग-बिरंगी है। उस रंग-बिरंगी फुलवाड़ी को रंग-बिरंगी ही रखने की आवश्यकता है। 

 (अ) संस्कृति के “शिष्य" शब्द से पंजाबी का शब्द “सिख" बना है । गुरु जी के शिष्य / सिख होने के कारण हमारा 'सिख' नाम प्रचलित हो गया है। जोकि सही है, इस नाम का उपयोग करना उचित है। आज विश्व भर में "सिख" नाम वाले धर्म / पंथ का बहुत यश है।

 नोट: सिख पंथ की चढ़दी कला (उन्नति) चाहने वाले सज्जन, अपने विचार (तर्क सहित) बेझिझक होकर निम्नलिखित नंबरों व ईमेल द्वारा भेजने की कृपालता करें:                                                                                             --ठाकुर दलीप सिंह जी 

संपर्क नंबर : राजपाल कौर 9023150008 , रतनदीप सिंह 9650066108 

ई-मेल:  rajpal16773@gmail.com       ratandeeps5@gmail.com

---------------------------------------------------------------------------------------------------


तुम जब जाते हो मंदिर तो तुम मांगने जाते हो ! तुम्हारी प्रार्थना झूठी है ! नानक भी जाते है ! वे धन्यवाद देने जाते है ! वे कहने जाते है , जो तूने दिया है वह भरोसे के बाहर है ! कोई कारण नही मेरे भीतर की मुझे मिले ! कोई मेरी योग्यता नही ! न मिले , शिकायत करने का कोई उपाय नही ! और तू देता चला जाता है !
परमात्मा औघड़ दानी है, अस्तित्व दिए चला जाता है ! और हम? हमसे ज्यादा कृतघ्न लोग खोजने कठिन है! हम धन्यवाद भी नही दे सकते! उसके देने का अंत नही है और हमारी कृतघ्नता का कोई अंत नही! हम कृतज्ञता भी प्रगट नही कर सकते ! हम यह भी नही कह सकते की धन्यवाद! कि हम आभारी है! कि तेरा शुक्रिया! उतना भी हमसे नही होता ! उतने में भी हमें बड़ी कठिनाई मालूम पड़ती है! हमारा कंठ अवरुद्ध हो जाता है ! --- ओशो ( एक ओंकार सतनाम )

बिमारी कभी अकेली क्यूं नहीं आती?-ओशो

पढिए तन्त्र स्क्रीन में 

Monday, 5 July 2021

महिला सशक्तिकरण में नामधारी समाज का विशेष योगदान

5th July 2021 at 4:35 PM

धर्म के क्षेत्र में है यह क्रन्तिकारी कदम और अन्यों के बहुत बड़ी सीख 

नई दिल्ली: 5 जुलाई 2021: (*प्रीति सिंह//आराधना टाईम्ज़):: 
महिला सशक्तिकरण के प्रेरणा स्रोत माता चंद कौर जी 
आज के समय में
हम सभी महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं और महिलाओं को उच्च स्थान देने का वायदा भी करते हैं। वहीं नामधारी समाज ने कुछ ऐसा उदाहरण हम सभी के समक्ष पेश किया, जिससे समाज में वास्तविक रूप में महिलाओं को उच्च दर्जा व सम्मान लगातार मिल रहा है। नामधारी सिखों ने समाज के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी तथा उच्चयोग (सर्वोच्च) स्थान व सम्मान को सुनिश्चित करने की एक विशेष मुहिम शुरू की है। जिसके अंतर्गत पुरुष प्रधान क्षेत्रों में महिलाओं का प्रवेश सुनिश्चित किया जा रहा है।
अप्रैल 2021 में नामधारी समाज के मुखी सतगुरु दलीप सिंह जी ने एक अनूठी पहल की, जिसमें उन्होंने पूर्ण रूप से नामधारी सिंघनियों (महिलाओं) को पुरुषों के तुल्य बैठने, पाठ करने, मंच संचालन, अरदास, अमृतपान, हवन-यज्ञ आदि ऐसे कई कार्यो में उच्च स्थान ही नहीं बल्कि संपूर्ण होला मोहल्ला कार्यक्रम का संचालन नामधारी सिंघनियों (महिलाओं) द्वारा करवाया गया। इस अवसर पर विवाह के लिए आनंद कारज की रस्में, अरदास, हवन-यज्ञ, लंगर बनाने से लेकर अमृतपान व अमृत बनाने आदि का कार्य संपन्न किया।
होला महल्ला कार्यक्रम में आनंद कारज (लावां) का उच्चारण नामधारी सिंघनियों (महिलाओं) द्वारा श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में से किया गया तथा श्री दसम ग्रंथ साहिब जी में से होला महल्ला कार्यक्रम में भोग के श्लोक आदि सभी रीति-रिवाज महिलाओं ने संपन्न किए, जबकि ये सभी कार्य अभी तक सिंघ पुरुष ही करते थे। ये सभी परिवर्तन समाज में एक नई परंपरा का सूत्रपात करेंगे।
नामधारी सिख समुदाय ने अनूठी पहल शुरू करके पुरुषों द्वारा अमृतपान तथा अमृत बनाने का कार्य भी महिलाओं द्वारा शुरू करवाया जबकि सिखों की अन्य संप्रदायों में यह कार्य अभी तक पुरुषों द्वारा ही किया जाता है यहां तक कि तख्त श्री हजूर साहिल (नांदेड) में तो अभी तक स्त्रियों को अमृतपान नहीं करवाते।
सामान्यत: सिख पंथ में आज भी विवाह (आनंद कारज) से जुड़ी थार्मिक रीति-रिवाजों को गुरुद्वारे में तैनात कुछ पुरुषों द्वारा ही किया जाता है तथा महिलाओं की भागीदारी नाम मात्र भी नहीं रहती। जबकि, नामधारी पंथ ने अपने समुदाय में आनंद कारज की रीतियों में सिंघनियों (महिलाओं) को अधिकार  प्रदान किया गया, जो कि महिला सशक्तिकरण में एक नया मील पत्थर साबित होगा।
धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं में महिलाओं को सक्रिय भागीदारी के साथ ही नामधारी संप्रदाय ने सामाजिक क्षेत्रों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी को सुदृढ़ किया है।
हमेशा से ही नामधारी गुरु साहिबानो एवं विशेष रूप से वर्तमान सतगुरु दलीप सिंह जी ने नामधारी संगत को बुद्धिजीवी बनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बहुत सी ऐसी नई बातें बताईं, जिससे आने वाले समाज में महिलाओं के प्रति लोगों के मनोभाव, बुद्धिमता व सोच में बदलाव आएगा।
समाज का उद्धार तभी होता है जब किसी भी धार्मिक स्थलों पर धर्मगुरु कुछ ऐसे उदाहरण देते हैं जिससे लोगों की सोच को एक नई दिशा मिलती है। महिला सशक्त तभी कहलाती है जब समाज उसे पूर्ण रूप से स्वीकारता है।
नामधारी समाज महिला सशक्तिकरण वाले इस परिवर्तन को सहर्ष एवं पूर्णतया स्वीकार किया है। जो कि अपने आप में बहुत बड़ी बात हैं व कठिन हैं। क्योकि, समाज में परिवर्तन लाना जहां कठिन है वहां समाज द्वारा पुरातन परंपरा से निकलकर नई सोच तथा नई परंपरा को अपनाना और भी कठिन हैं। परंतु, नामधारियों ने अपने गुरु के आदेश को मानते हुए, महिला सशक्तिकरण को सहर्ष स्वीकार किया है। जो आश्चर्य जनक तथा प्रसन्नता की बात है।                                                                ---*प्रीति सिंह
*प्रीति सिंह विश्व सत्संग सभा, दिल्ली की प्रधान है और ऐसे विषयों पर लिखती रहती है 

Monday, 5 April 2021

होला मोहल्ला पर जीवन नगर में हुए विशेष आयोजन

सतगुरु दलीप सिंह ने बताया समाज को मज़बूत बनाने का गुर 

*सतगुरु दलीप सिंह जी ने स्त्रियों को महान समागम का संचालन करने का दायित्व संभाला  

*होले महल्ले के दौरान किया नया ऐलान 

*बहू-बेटियों को समाज में आगे बढ़ाने से उनका हौंसला एवं आत्मसम्मान बढ़ता है

*दूसरे दिन भी नामधारी होला-महल्ला का समागम आस्था की भावना से हुआ 

*सेवा, प्रभु भक्ति एवं नई परम्पराओं का सबूत देता हुआ 

लुधियाना: 3 अप्रैल 2021: (*गुरमीत सिंह सग्गू//आराधना टाईम्ज़)::

गुरद्वारा श्री जीवन नगर में चल रहा  प्रोग्राम वर्तमान नामधारी प्रमुख सतगुरु दलीप सिंह जी की अगुवाई में पूरे उत्साह, श्रद्धा एवं प्रेम भक्ति से सराबोर रहा । यह प्रोग्राम बहुत ही नियमबद्ध  एवं अनुशासित तरीके से मनाया जा रहा है।  इस दौरान सतगुरु दलीप सिंह जी की आज्ञानुसार सारे समागम का प्रबंधन विशेष रूप से नामधारी महिलाओं ने संभाला। समागम में शामिल हो प्रत्येक कार्यभार संभाला और सतगुरु जी द्वारा दिए अधिकारों को अपना धन्य भाग समझा। आज फिर से इस समागम के दौरान नाम-सिमरन, कवि दरबार, कथा-कीर्तन तथा गुरुवाणी के पाठों का प्रवाह चला।

यह प्रोग्राम आज "आसा की वार" से शुरू हुआ तथा सतगुरु दलीप सिंह जी ने (लाइव कॉन्फ्रेंस) द्वारा अपने  कल्याणकारी संदेश द्वारा बताया कि गुरुवाणी में लिखा है, "दुख रोग संताप उतरै सुनी सच्ची बानी" अतः आप जी ने बताया कि गुरुवाणी पढ़ने से एक नहीं अनेक लाभ हैं, आपने  गुरुवाणी पढ़ने, सुनने एवं मानने के लाभों से परिचय करवाया।  

इस समागम की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इस महान समागम की जिम्मेवारी नामधारी महिलाओं को देकर  महिलाओं के सम्मान में एक और क्रन्तिकारी पहल की। आप जी ने बताया कि मैंने स्त्रियों को समाज में आगे बढ़ाने के लिए, इस समागम का प्रबंधन महिलाओं को सौंपा है ताकि उनमें काम करने का उत्साह और आत्मविश्वास  बढ़े कि वे किसी भी काम में पीछे नहीं हैं।  

आप जी ने बेटियों को ज्यादा से ज्यादा शिक्षा पढ़ाने तथा गरीबों की मदद करने की प्रेरणा दी। आप ने कहा कि हमें फिजूलखर्ची और महंगे लंगर लगाने छोड़कर जरूरतमंद लड़कियों को पढ़ाने तथा जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए। आप स्त्रियों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए यत्नशील हैं।                                   

आज होले महल्ले के दूसरे दिन सुबह अमृत वेले  आसा की वार के कीर्तन में सारी संगत ने रागी सिंघों के साथ मिलकर गुरुवाणी गायन किया । इस अवसर पर सतगुरु गोबिंद सिंह जी के फौजी सिक्खों अर्थात गतके की टीम ने ने वीर रस का प्रतीक गतके के जौहर दिखाकर सब को निहाल किया। इसके साथ ही पंथ के महान जत्थेदारों, जत्थेदार जोगिन्दर सिंह मुक्ता जी ने साथ में होले महल्ले से संबंधित वीर रस से ओत-प्रोत  शबद गायन किया; "सुरा सो पहचानिए जो लरै दीन के हेत"  इस अवसर पर जसपाल सिंह, प्रधान सुखदेव सिंह, रघबीर सिंह सग्गू, अजीत सिंह, सूबा बलजीत सिंह, मोहन सिंह झब्बर, अंग्रेज सिंह, नरिंदर सिंह, गुरनाम सिंह, गुरभेज सिंह, मुख्तयार सिंह, बीबी दलजीत कौर, सतनाम कौर, जसवीर कौर, मंजीत कौर,कुलदीप कौर, जसविंदर कौर, मंजीत कौर, राजपाल कौर, भूपिंदर कौर, संदीप कौर, भगवंत कौर, गुरवंत कौर, हरप्रीत कौर, रंजित कौर, बलविंदर कौर के अलावा विशाल संगत हाजिर हुई । गुरु का लंगर सुनियोजित तरीके से चलता रहा। 

*गुरमीत सिंह सग्गू नामधारी समाज में परिवार सहित सक्रिय रहने वाले सज्जन पुरुष हैं। 

Wednesday, 3 February 2021

मोहाली के भिंडर परिवार की तरफ से जारी हैं जनसेवा के सफल प्रयास

  ज़रूरतमंद लोगों के काम आना ही उनके लिए भगवत पूजा 


जालंधर: 2 फरवरी 2021: (राजपाल कौर//आराधना टाईम्ज़)::

नामधारी सदगुरु ठाकुर दलीप सिंह 
दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपनी ज़रूरत बता सकते। अंदर ही अंदर घुटते हुए उनका जीवन कितना कठिन बन जाता है इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं चाहिए। मजबूरियों से भरा जीवन जी रहे ऐसे परिवारों  और सहायता करना ही भिंडर परिवार का  मकसद है।  सरबजीत सिंह भिंडर का यह परिवार मोहाली में रहता है लेकिन इसके  दायरा दूर दूर तक फैला हुआ है। इसकी प्रेरणा शक्ति के संबंध  उन्होंने बताया कि यह सब उनके सदगुरु ठाकुर दलीप सिंह जी की कृपा है। इस परिवार ने इसी प्रेरणा और शक्ति के सहारे न जाने कितने  लोगों को सर छुपाने की छत देने के लिए रहने लायक मकान बना कर दिए। जिन मकानों युवा  लेकिन पाखाने इत्यादि का  उन्हें घर  दीवारी के अंदर ही पखाने बना कर दिए। जिन राशन की ज़रूरत थी उन्हें नियमित राशन का  प्रबंध  करके दिया। जिन  बच्चों के कालेजों की फीसें देने की क्षमता नहीं थी उन्हें फीसों  दिए। भिंडर परिवार का  कहना है उनके लिए  और यही कारसेवा है। 

शिक्षण के संस्थान खोल कर वहां पढ़ीलिखी युवा लड़कियों को अध्यापन का काम दिया तांकि उन्हें रोज़गार मिल सके। इस तरह दीप से दीप जलाते हुए समाज को आत्मनिर्भर बनाने का एक मिशन शुरू किया जो अब तक जारी है।  वह इसकी सफलता के लिया  काम करते जा रहे हैं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो आत्म निर्भर भारत का नारा कोरोना काल में दिया लेकिन नामधारी सम्प्रदाय के लोग इसे बहुत पहले से लागू करते आ  आ रहे हैं। भिंडर परिवार ने नामधारी मिशन को लागू करते हुए लोगों के कारोबार शुरू करने और उन्हें चलाने के लिए  सरगर्मी दिखाई। 

बहुत से घरों में गरीबी का अँधेरा था और   मजबूरी का दर्द भी था।  गम के इस अँधेरे को चीरा नामधारी सम्प्रदाय से जुड़े हुए भिंडर परिवार की सहायता और हमदर्दी की किरणों ने।  जिस घर में ऐसी मजबूरी होती है उस घर को ही पता होता है इसका दंश। बड़ी बड़ी इमारतों पर संगमरमर और सोना लगवाने की बजाये इन परिवारों अपने पांवों पर खड़ा करने में सहयोग देना भी भक्ति और सेवा से कम नहीं। इस तरह नामधारी सम्प्रदाय के लोग एक ऐसे समाज का निर्माण करने में लगे हैं जो पूरी तरह आत्मनिर्भर हो, खुशहाल  हो, समृद्ध हो, सम्पन्न हो। एक ऐसा समाज जिसमें मजबूरियां न हों। 

प्रिंसिपल राजपाल कौर 
इस मकसद के लिए नामधारी सक्रिय भी हैं। इनका एक नेटवर्क भी काफी मज़बूत है। तकरीबन हर पिछड़े हुए इलाके की इनको पहचान है। मोहाली/खरड़/रोपड़ और मोरिंडा में भी इस मकसद टीमें जुटी हुई हैं। मिशन  बहुत बड़ा है लेकिन ज़रूरत जितना फंड  कहां? आसपास के कई गांवों-चुन्नी, मछली, लांडरां, देसू माजरा इत्यादि में भी इसी तरह की बहुत से काम किए। उनके इन कार्यों में नामधारी तेजिंदर सिंह,, बलविंदर सिंह सोनू, दलजीत सिंह, गोबिंद सिंह, और नामधारी संगत के अन्य लोग भी शामिल रहे। इस तरह जनसेवा का यह काफिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसे भगवान का चमत्कार ही कहा जा सकता है।  भगवत कृपा से ही चल रहा है जनसेवा का यह अभियान।   

गौरतलब है कि नामधारी सम्प्रदाय ने भिंडर परिवार की तरह ऐसे बहुत से लोग तैयार किये हैं जो हर क्षेत्र के लोगों का ध्यान  रखते हैं। हर किसी की मजबूरी को समझना और सही वक़्त पर सहायता करना ये लोग कभी नहीं भूलते और इस मदद को कभी जतलाते भी नहीं। बिना पूछे किसी का दुःख जान लेना और बिना शोर मचाए दुःख दूर कर देना इन नामधारियों का एक ऐसा ख़ास अंदाज़ जो दिव्य कृपा के बिना सम्भव ही नहीं होता। 

अगर आप भी इस मिशन में सहयोग देना चाहते हैं तो इसी रिपोर्ट के  में दिए कुमेंट बॉक्स में अपना नाम, पता और मोबाईल नंबर लिख सकते हैं। 

(रिपोर्ट का सम्पादन और डेस्क इनपुट-कार्तिका सिंह)

Friday, 11 September 2020

दस रुपए का नोट और गणेश जी की कृपा

 11 सितंबर 2020:आध्यात्मिक बातें 
 ठाकुर जी ने समझाया परमसत्ता के हिसाब किताब का मर्म 
लुधियाना: 11 सितंबर 2020: (मीडिया लिंक रविंद्र//आराधना टाईम्ज़)::
पत्रकारिता में अपनी मेहनत और जुनून से आगे बढ़ने वालों में वह बहुत ही जानामाना नाम बन गया था। प्रिंट मीडिया में काफी अच्छा नाम कमाने के बाद उसने बड़ी छलांग लगाई और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी चमक उठा। यह शायद 90 के दशक की आखिरी तिमाही शुरू होने से भी पहले का ही कुछ वक़्त था।
जिस पत्रकार की बात कर रहा हूं उसके नाम का ज़िक्र फिर कभी सही। फ़िलहाल नाम का ज़िक्र यहां उचित भी नहीं लग रहा क्यूंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आघात जैसा महसूस होने का चोटिल सा अहसास हो सकता है। फिर भी काम चलाने को आप उसे एस एस डी कह सकते हैं अर्थात शुद्ध अंग्रेजी में SSD होगा। 
हम अधिकतर दोस्त उसे आम तौर पर इसी तरह के एक अन्य नाम से बुलाया करते थे। उसने ज़मीनी हकीकतों को नज़दीक से देखा था। हर कोई सच का सामना नहीं कर पाता। कई हकीकतों को कई लोगों ने खुद भी बेहद नज़दीक से देखना चाहा लेकिन बहुत से ऐसे सच वक़्त और हालात ने भी उनके सामने ला रखे जिनकी कल्पना उन्होंने सपने में भी नहीं की थी। इसलिए ज़िंदगी के रंग बहुत अजीब से भी लगने लगते हैं।
एक दिन हम कहीं जा रहे थे। दोनों की जेब भी खाली थी और ऊपर से स्कूटर अचानक रुक गया। तेल की टैंकी भी खाली हो गई थी। उस टूटे फूटे स्कूटर ने हमारा बहुत साथ दिया था। उसका सफेद रंग था इसलिए हम उसे चिट्टा घोड़ा कहा करते। अपने घोड़े को इतनी शाबाशी तो कोई तांगेवाला भी न देता होगा जितनी शाबाशी उस टूटे फूटे सफेद स्कूटर को हम दिया करते थे। 
कुछ कदम तक स्कूटर को ठेलते हुए पैदल चल कर जब सांस फूलने लगी तो एक साथ दो नाम हमारे ध्यान में आये। सोचा इनसे पैसे मांग लेते हैं। उन दिनों दस रूपये में तेल डलवा कर हम इतना खुश हो लेते थे कि न जाने कितनी मंज़िलें सर कर ली हों। ज़्यादा बड़ी बात यह होती कि बहुत ही मेहनत से लिखी खबर को फैक्स वाले पीसीओ तक पहुंच कर अख़बार के दफ्तर प्रेषित कर सकेंगे। खबर को अगले दिन की अख़बार में कितनी जगह मिलती है इसकी इंतज़ार भी कम रोमांचिक नहीं होती थी। खैर जब तेल खत्म हुआ तो उस समय हम लुधियाना की घुमार मंडी में के इलाके में थे और पहुंचना था प्रीत पैलेस से कुछ आगे स्थित दीवान पीसीओ पर।
सो इस मकसद के लिए एक जानकार से मैंने पैसे मांगें और दुसरे से एस एस डी ने। हम तो यह सोच कर दोनों के पास अलग अलग गए थे तांकि अगर एक ने इंकार किया तो दूसरा दे देगा। लेकिन यहां तो दोनों से दोनों को ही मिल गए। हम सोच रहे थे कि दस रुपयों का तेल डलवाने के बाद अब पांच रूपये के दो दो कुलचे छोले खा लिए जाये और पांच रूपये की चाय पी ली जाये। यूं तो उन दिनों पांच रूपये के तीन कुलचे छोले आते थे लेकिन रोज़ का लिहाज़ था और हमें लगता था कि आज पांच रुपयों के वह चार कुलचे छोले दे देगा। उसने सचमुच दे भी दिए। इससे थोड़ा भूख शांत होने की उम्मीद थी।
इतने में ही एक हाथी दूर से सड़क का मोड़ मुड़ता हुआ दिखाई दिया और एस एस डी ने दस का वही इकलौता नोट हाथी वालों के साथ चलते काफिले की तरफ बढ़ा दिया यह कह कर कि गणेश जी हमारे दुःख दर्द दूर करेंगे। कमाल की बात कि उस हाथी के साथ चल रहे साधु बाबाओं का हाथ नोट तक पहुंचने से पहले हाथी ने सूंढ़ लम्बी करके वह दस रूपये का नोट पकड़ लिया। सीन बहुत ही अच्छा बन गया था लेकिन मुझे गुस्सा बहुत आया। इसी दस रूपये वाले नोट के दम पर तो हमने चाय भी पी ली थीऔर छोले कुलचे भी खा लिए थेअब इसके पैसे कहां से देंगें। दस का नोट तो अब गणेश जी को दे दिया।
मुझे गुस्से में आया देख कर एस एस डी बोला बाबा जी चिंता मत करो। मुझे उन दिनों सभी लोग बाबा जी कहा करते थे। एस एस डी ने अपनी बात जारी रखी। गणेश जी सब ठीक कर देंगें। हाथी जी का और उनको पालने वाले काफिले वालों का खर्चा भी तो इसी तरह चलता है। हमारे खर्चे के लिए भी गणेश जी कुछ सोचते होंगें। मुझे एस एस डी कभी भी इतना गंभीर नहीं लगा था। मुझे लगा सिख परिवार में पैदा होने के बावजूद सिगरेटें पीते पीते यह एस एस डी अब पूरी तरह हिन्दु रंग में रंग गया है। हालांकि इसी एस एस डी ने सिख संघर्ष पर बनी एक जानीमानी और बहुचर्चित फिल्म में भी सक्रियता से योगदान दिया। उन दिनों तो यही लगने लगा था कि कहीं एस एस डी बाकायदा अमृत छक कर सिंघ तो नहीं सज गया।  उसके बारे में आ रहे ख्यालों के साथ साथ ही यह भी महसूस होने लगा कि दुनिया की आर्थिकता कितनी गहराई से आपस में जुड़ी हुई है। कुदरत एक दुसरे को एक दुसरे का सहायक बनाये रखती है। एस एस डी के "प्रवचनों" का मनन करते हुए  चाय के आखिरी घूंट मैं इसी चिंता के साथ पी रहा था कि अब चाय समाप्त होने के बाद चाय वाले को पैसों के उधार  चक्कर कैसे कहना है! चाय की चुस्कियां लेते लेते मैं चाह रहा था कि चाय का गिलास तब तक खत्म न हो जब तक चाय वाले को आज फिर उधारी वाली बात कहने की हिम्मत मुझमें नहीं आ जाती।
इतने में ही हमारे दो तीन अमीर दोस्त उधर आ निकले और हमारे औपचारिकता वश मना करने के बावजूद सारे का सारा बिल उन्होंने ही दे दिया। मुझे यह सब किसी करिश्मे से कम नहीं लग रहा था। बिल अदा हो चुका तो मुझे खत्म हो चुकी चाय का स्वाद अब आया। सोचा इसी ख़ुशी में चाय का एक कप और पी लिया जाए लेकिन मन में आया लालच अच्छा नहीं होता।  यूं भी अभी बाकी बहुत से बिल बकाया थे। फैक्स का बिल। अपनी जेब के खर्चे। रोज़ गार्डन के पास लिए गए कमरे का किराया। घर का राशन। बहुत सी चिंताएं थी। मन में गिला शिकवा सा भी आ गया और मन में उठा सवाल, "गणेश जी आप ने हमारे लिए सिर्फ चाय का बिल ही देना था क्या? अब बाकी सब का हम क्या करें? अब किस से मांगें कुछ और?" सवाल हमारे दिल और दिमाग से निकल कर शायद रुक  रही ठंडी ठंडी हवा में गम हो गया।  
चाय वाली दुकान के उस गर्म माहौल से बाहर  निकलते ही हवा की ठंडक फिर से चेहरे पर महसूस हुई तो साथ ही वहां चल रहे ट्रांज़िस्टर पर एक पुराना गीत bhi शुरू हो गया,
"जहां ठंडी ठंडी हवा चल रही है--
किसी की मोहब्बत वहां जल रही है.....!" 
मैंने एस एस डी से कहा ज़रा रुको यह गीत पूरा सुन लेने दो। जवाब में वह बोला जिसका दिल आपके लिए या जिसके लिए आपका दिल जल रहा है न वह पीएयू के जर्नलिज़्म डिपार्टमेंट वाली कैंटीन पर आपका इंतज़ार कर रही है। मुझसे उसका झगड़ा चल रहा था  मैं बहुत ही हैरान भी हुआ और पूछा तुम्हे कैसे मालूम?  
जवाब में एस एस डी ने कहा आज सुबह टेलीफोन पर बात हुई थी। आज आपका झगड़ा सुलझाना है। आज गुस्सा छोडो और उसके साथ चाय पी लो। साथ में केक और पेस्ट्री का प्रबंध भी होगा। आज पार्टी मेरी तरफ से। मन में तुरंत ख़ुशी, उत्साह और हैरानी की मिलीजुली सी लहर भी उठी। वह उन दिनों एक अंग्रेजी अख़बार में काम करती थी और कार में आती जाती थी। कभी कभी उसकी कार और कोठी देख कर मन में इंफियरिटी कम्प्लेक्स भी आता लेकिन जल्द ही बात आई गई  हो जाती।  
हम उस तरफ जाने के लिए
 स्कूटर स्टार्ट कर रहे थे कि अचानक कांग्रेस के चुनावी इंचार्ज रह चुके प्यारा सिंह ढिल्लों हमारे सामने हमारे बिलकुल पास आ कर रुके। एक बार फिर चाय का आर्डर उन्होंने भी दे दिया। हमने कहा भी कि हमने चाय पी है लेकिन वह कहने लगे कुछ ज़रूरी बात करनी है बैठ कर ही हो सकेगी बाकी चाय का क्या है यह तो सर्दी में पता ही नहीं लगता। 
वहां बैठते ही उन्होंने हमें चुनाव के दिनों में प्रकाशित हुए विज्ञापनों के बाकी बचे पैसे दे दिए जो काफी देर से उनकी पार्टी की तरफ रुके हुए थे। अब हम दोनों को पच्चीस पच्चीस सो रूपये मिल चुके थे। उस ज़माने में यह रकम बहुत बड़ी थी। इसके साथ ही हमें पंख लग गए। हमने उन्हें आभार व्यक्त किया। फैक्स का बिल दिया। तेल भी और डलवाया और घर का कुछ राशन भी लिया। खबरें लिखने का जोश फिर से दोगुना हो गया। इसके साथ ही समझ आया कि गणेश जी को दिए दस रूपये व्यर्थ नहीं गए थे। वे कितना कुछ ले कर लौटे। उसी दिन यह भी समझ आया कि हम सभी आपस में किसी अदृश्य तार से जुड़े हुए होते हैं। हम दूसरों का ध्यान रखेंगे तो दुसरे भी हमसे इसी तरह पेश आएंगे। हम सभी किसी न किसी   कुछ लगते हैं। 
मुझे यह घटना और बाकी सब कुछ पूरी तरह भूल चुका था लेकिन अचानक एक दिन नामधारी समुदाय के सद्गुरु ठाकुर दलीप सिंह जी के प्रवचनों को सुनते हुए याद आया कि ऐसी संवेदना, ऐसा अहसास केवल भारत में ही सम्भव है। पत्थर में भी भगवान का अहसास कर लेना, चांद को भी मामा कह कर पुकारना, धरती को मां कहना, पहाड़ों में भी ईश्वरीय सत्ता को महसूस कर लेना, वायु में भी देवता की शक्ति को महसूस करना, जल में भी दिव्यता से भरी शक्ति का पान करना क्या ऐसी आस्था कहीं और मिलती है?  है न मेरा भारत महान! क्या दुनिया के किसी और कोने में ऐसा विश्वास कहीं मिलता है? ठाकुर जी कहते हैं है तो सारी दुनिया उसीके रंग में रंगी हुई लेकिन भारत पर भगवान की विशेष कृपा रही है। हमारे कर्मों ने ही समाज की दुर्दशा की है। पूजा, पाठ और पवित्रता के जीवन को अपनाते ही उसकी कृपा बरसनी शुरू हो जाती है। 
मुझे यह बातें कभी जचती और कभी नहीं भी जचती लेकिन एक दिन तो हद हो गयी। एक धार्मिक आयोजन में ठाकुर जी के काफी नज़दीक खड़ा था। किसी ख़ास दृश्य को कैमरे में कैद करने के लिए। किसी श्रद्धालु ने अपनी सभी जेबें टटोल कर दस रूपये का मैला कुचैला सा नोट निकाला और ठाकुर जी के सामने रख दिया। श्रद्धालु की उम्र 50 के  होगी। मुझे उस नोट की हालत देख कर कुछ घृणा सी हुई। इतना मैला कुचैला नोट! पसीने से भीगा हुआ! क्या इसने यही नोट यहां माथा टेकना था?
वह तो चला गया लेकिन मेरा मन अजीब सा बना रहा। मेरे मन की भावना और चेहरे के हावभाव को भांपते हुए ठाकुर जी बोले यह दस रूपये का नोट इसकी मेहनत की कमाई का अनमोल हिस्सा है। यह दस लाख रुपयों से भी बढ़ कर है। गरीब मज़दूर जब एक पैसा भी दे तो वह अनमोल होता है। इसी को भाग लगते हैं। देखना एक दिन यही शख्स कितने पैसे  बनेगा। मेरे मन की आशंका जाने का नाम नहीं ले रही थी। बहुत देर तक मैं हैरानी भरे सदमे की स्थिति में रहा।
मैं कैमरा लिए कवरेज कर रहा था कि अचानक ही ठाकुर जी ने मुझे नज़दीक आने का इशारा किया। पास हुआ तो उन्होंने कान में कहा याद है एक बार गणेश जी ने आप लोगों के दस रूपये बहुत स्नेह और सम्मान से कबूल किये थे। उसके बाद आपका भी सब नक्शा ही बदल गया था।  
पहले तो मैं कुछ सकपकाया लेकिन बाद में सब याद आ गया। मेरी आँखें भर आई। यह बात भी आई गई हो गई लेकिन आज सोचा इसे लिख कर सहेज ही लूं।
मैं हैरान था करीब बीस वर्षों से भी अधिक पुरानी यह बात ठाकुर जी कैसे जानते हैं? ठाकुर जी की बात सुन कर मैं काफी देर हैरानी भरे अजीब से सदमे में रहा। मुझे एक बार फिर अहसास हुआ कि समस्त दुनिया किसी परमसत्ता की देखरेख में ही है। हम मानें या न मानें लेकिन बहुत कुछ ऐसा होता है जो हमारे किये से कभी नहीं होता लेकिन जब ऊपर वाला चाहे तो बिगड़ा हुआ काम भी झट से बन जाता है। इसी सिलसिले की कुछ और बातें अलग पोस्टों में भी होंगीं। फ़िलहाल इतना ही। --मीडिया लिंक रविंद्र 

Monday, 13 April 2020

कोरोना के कहर में फंसे लोगों का दर्द सुना ठाकुर दलीप सिंह ने

कुलदीप कौर की टीम को भेजा ज़रूरतमंद घरों तक ज़रूरी सामान के साथ 
पटियाला: 13 अप्रैल 2020: (कार्तिका सिंह//आरधना टाईम्ज़)::
कोरोना का कहर टूटा तो सबसे अधिक दिक्कत आई उन लोगों को जो हर रोज़ दिहाड़ी करके कमाते थे और उसी से उनका घर चलता था।  इसके साथ ही वे लोग भी थे मध्यवर्गों से सबंधित थे। जब मार्च के अंत में लॉक डाउन शुरू हुआ तो  उनके घरों का राशन भी समाप्त हो चुका था और वेतन अभी मिला नहीं था। साथ ही गली मौहल्लों के वो दुकानदार भी इसी संकट का शिकार हुए जिनकी दुकानें कर्फ्यू के कारण बंद करा दी गईं थीं। छोले-भटूरे, टिक्की-समोसा, भुजे हुए चने इत्यादि और चाय बेचने वालों का भी यही हाल हुआ। इन लोगों ने कभी ज़िंदगी में हाथ नहीं फैलाया था। हमेशां अपना कमाते और जो कमाई होती उसी में खुश रहते हुए ज़िंदगी काटते। कोरोना के संकट की बात तो किसी की कल्पना में भी नहीं थी। सबसे ज़्यादा  दिक्क्त समाज के इन्हीं वर्गों से सबंधित लोगों को आई। न तो ये लोग गरीबों के लिए बनी राशन वितरण लाइनों में जा कर खड़े हो सकते थे और न ही किसी और के पास जा सकते थे। ऐसे लोगों की आवाज़ नामधारी प्रमुख ठाकुर दलीप सिंह ने सुनी और वह भी इन लोगों के बोले बिना। ठाकुर दलीप सिंह ने विदेश की धरती से ही अपने पैरोकारों से कहा कि इस तरह के सभी वर्गों का पता लगाएं और बिना कोई शोर या प्रचार किये इन लोगों तक सहायता पहुंचाएं। 
आदेश का पालन भी तुरंत शुरू हुआ। घरों की रसोई के लिए आवश्यक सामान को छोटे छोटे पैकटों में बंद कराया गया। उनकी किट अर्थात गठड़ियाँ बनवायीं गईं। हर ज़रूरतमंद के घर तक यह सब सामान पहुंचा दिया गया। साथ ही दवाई और दूध जैसे ज़रूरी खर्चों के लिए एक निश्चित अमाउंट के पैसे भी सभी घरों तक पहुंचाए गए। हर घर का पता लगाना।  फिर बिना किसी को बताए चुपके से अचानक जा कर उनका दरवाज़ा खटखटाना और जब दरवाज़ा खुलना तो बहुत ही स्नेह और सम्मान के साथ उनको वह राशन की किट भी पकड़ा देनी और साथ ही पैसे भी। देश भर के बहुत से राज्यों में यह सिलसिला शुरू हुआ और अब तक जारी है। ठाकुर दलीप सिंह के सेवक पंजाब, हरियाणा, यूपी, बिहार, राजस्थान, दिल्ली सहित कई राज्यों के पिछड़े इलाकों तक भी तेज़ी से पहुंचे। ख़ामोशी के साथ सेवा का यह बिलकुल ही नया अध्याय बना। 
पटियाला में इसकी कमान संभाली महिला वैलफेयर सोसायटी की प्रमुख कुलदीप कौर और उनकी टीम ने। इस टीम ने कच्चा राशन भी ज़रूरतमंद लोगों के घरों तक पहुंचाया और पका हुआ लंगर भी। इस मकसद के लिए इन्होने अपनी चिर परिचित वैन का सदुपयोग किया जिसे आप तस्वीर में भी देख सकते हैं।   
टीम की अध्यक्षा कुलदीप कौर के साथ महासचिव-बीमा सेन, कोषाधिकारी-मनप्रीत कौर और जसबीर कर सहित अन्य पदाधिकारी भी साथ रहे। पुरुष सहयोगियों में से हरमीत सिंह, चरणजीत सिंह मंगा और रवनीत सिंह ने भी सक्रिय हो कर इस टीम का साथ दिया।
यह भी पढ़िए बस यहां नीचे दिए गए  नीले लिंक पर क्लिक करके 
 नामधारी संगत के साथ शहीद सरबजीत की बहन ने भी बांटा राशन 

Saturday, 13 October 2018

वार्षिक जप-प्रयोग अमिट यादों के साथ सम्पन्न

जप प्रयोग में दृढ़ करवाई जाती है आध्यात्मिक साधना
जालंधर//दसूहा: 12 अक्टूबर 2018:(राजपाल कौर//पंजाब स्क्रीन)::
प्रत्येक साल की तरह इस साल भी सतगुरु दलीप सिंह जी की छत्रछाया में नामधारी संगत द्वारा शुरू किया गया वार्षिक जप-प्रयोग, आपसी एकता ,प्रेम और भाईचारे के संदेशों द्वारा अमिट छाप छोड़ता हुआ  आज सम्पन्न हुआ। आज से अस्सू के मेला बड़े उत्साह व उल्लास से शुरू हो गया है। सतगुरु राम सिंह जी द्धारा दर्शाये गए दिशा-निर्देश अनुसार चलते हुए, नामधारी सिक्ख जप-प्रयोग के आयोजन द्धारा अपने जीवन को गुरबाणी अनुसार जीने तथा इस पर दृढ रहने का अभ्यास करते हैं। इस दौरान अमृत वेले से लेकर शाम तक तकरीबन 8-9 घण्टे परमात्मा के साथ जुड़कर, एकाग्रचित हो कर सिमरन-साधना का अभ्यास, कथा-कीर्तन, गुरु इतिहास की जानकारी लेते हुए एक आदर्श जीवन जीने के गुण सीखते हैं। इस के इलावा भावी पीढ़ी को सेवा-सिमरन जैसे गुरसिक्खी आचरण बताते हुए उन्हें अपनी प्रतिभा निखारने का भी मौका दिया जाता है। इस जप-प्रयोग की विशेष बात यह है कि यह आयोजन श्री सतगुरु दलीप सिंह जी की आज्ञा से विशेष रूप से सरोवर अर्थात जल के पास ही करवाया जाता है क्योंकि गुरबाणी के अनुसार जल के पास बैठकर नाम सिमरन करने का बहुत महत्व माना गया है जैसे कि हम देखते हैं की गुरु साहबानों द्वारा कई धार्मिक स्थल सरोवर के किनारे ही स्थापित किये गए हैं। इस लिए सतगुरु जी की आज्ञा से यह आयोजन ,सतगुरु प्रताप सिंह सरोवर ,श्री जीवन नगर और प्राचीन पांडव तालाब मन्दिर,दसूहा जैसे पावन स्थानों पर होना नियत किया गया। चालीस दिन लगातार चलता हुआ यह कार्यक्रम प्रतिदिन आनन्द और सकारात्मक-ऊर्जा प्रदान करता रहा। संगत ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया और आनन्द की प्राप्ति की। 
               आज इस जप-प्रयोग की समाप्ति अमृत वेले आसा की वार के अमृतमयी कीर्तन और शाम के समय संत तेजा सिंह जी (खुड्डा वाले)की मनोहर और आनंदमयी कथा के साथ हुआ। उन्होंने संगत को नाम-बानी और जीवन में गुरु का महत्व बताया। आप जी ने बताया कि परमात्मा का वास हमारे अंदर ही है ,हम उसे बाहर ढूंढते रहते हैं। संत जी ने सतगुरु दलीप सिंह जी की कृपा से चल रहे इस शुभ कार्यक्रम की प्रशंसा की तथा आपस में मिल-जल कर रहने का सन्देश दिया। इस के साथ ही संगत को अस्सू का मेला शुरू होने की बधाइयाँ भी दी। 
   अंत में संत तेजा सिंह जी को नामधारी संगत द्वारा सम्मानित कर उनके कीमती समय निकलने का आभार भी प्रकट किया। इस अवसर पर प्रधान बलविंदर सिंह डुगरी,जागीर सिंह ,सुखविंदर सिंह ,बूटा सिंह,पलविंदर सिंह ,महिंदर सिंह ,रघबीर सिंह पटवारी ,प्रिंसिपल हरमनप्रीत सिंह काहलों ,सरपंच जोगिन्दर सिंह ,दर्शन सिंह मल्ली ,मास्टर इक़बाल सिंह ,रणजीत सिंह ,गुरदीप सिंह और विशाल संगत हाज़िर हुई।

Wednesday, 21 September 2016

हमें अपने संस्कारों तथा रीति-रिवाजों को महत्व देना चाहिए

सभ्यता तथा संस्कृति के प्रति स्वाभिमान सिखाते ठाकुर दलीप सिंह 
हमारा देश भारत महान है।इसकी सभ्यता और संस्कृति भी महान है इसलिए हमें अपने देश के प्रति स्वाभिमान होना चाहिए। सबसे पहले तो हमारे देश का नाम इंडिया या हिंदुस्तान नहीं बल्कि भारत है जो कि भरत नाम के प्रतापी और महान राजे के नाम पर रखा गया है। अन्य नाम तो विदेशियों द्वारा रखे हुए नाम है इसलिए हमें अपने देश के नाम भारत पर गर्व होना चाहिए कि हमारे देश जैसा कोई और देश हो ही नहीं सकता।
        इसी तरह सभी को अपनी-अपनी मातृभाषा का प्रयोग ही ज्यादा करना चाहिए। हमारी मातृभाषा हमारी अपनी माँ है। इसलिए हमें अपनी भाषा पर स्वाभिमान होना चाहिए। हमारी भाषा की विशेषता यह भी है की इसमें अंग्रेजी से ज्यादा अक्षर व शब्दावली हैं, अतः हमारी भाषा ज्यादा अमीर है। इसलिए अपनी भाषा पर गर्व करते हुए हमें दैनिक जीवन में, आपस में वार्तालाप करते समय Father , Mother , Brother, Sister , Uncle ,or Aunt की जगह; माता जी, पिता जी, वीर जी, बहन जी, चाचा जी, चाची जी, मामा जी, मामी जी, इत्यादि शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए जो कि ज्यादा प्यार व स्नेह के सूचक हैं। इसके अलावा आपस में एक दूसरे को मिलने पर नमस्ते, सत श्री अकाल या फतहि आदि बुलानी चाहिए। जो हमें हाथ जोड़ना ,एक दूसरे के चरण स्पर्श करना तथा सत्कार करना सिखाती है।हाथ मिलाना  हमारे संस्कारों में नहीं आता। वैसे भी एक दूसरे से हाथ मिलाने से शरीर में कीटाणु फैल सकते हैं। 
         शिक्षा की नींव भी हमारे देश में ही सबसे पहले रखी गई। गणित की शिक्षा ,योगा , आयुर्वेद जैसी शिक्षाएं भारत की ही देन है.
       अपनी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व करते हुए हमें स्वदेशी प्रथा अर्थात अपने ही रीति -रिवाजों को अपनाना चाहिए। जैसे यदि हम अपने जन्म दिन मनाते हैं,तो उस अवसर पर हमें एक दूसरे को शुभ कामना हैप्पी बर्थडे तो यू कह कर नहीं," जन्म दिन की बधाई हो" कह कर देनी चाहिए।इसके अलावा हैप्पी बर्थडे टू यू गाने के बजाय गुरबाणी का शबद पुता माता की आसीश पढ़ना चाहिए,जिससे सतगुरु जी की खुशियां तथा कृपा प्राप्त होगी। इसी तरह जो हम केक काटने की परम्परा को अपना चुके हैं उसकी जगह कड़ाह प्रसाद बनाकर प्रसाद के रूप में दिया जा सकता है। यदि हमें काटकर ही कहना है है तो करद या चाकू की जगह किरपान का प्रयोग कर सकते हैं ,जो कम से कम हमारे संस्कारों में तो शामिल है। विशेष बात यह है कि क से केक, क से कड़ाह प्रसाद, क से करद और के से ही किरपान होती है। 
       अतः हमें अपने ही संस्कारों तथा रीति-रिवाजों को ही महत्व देना चाहिए तथा इन सब के प्रति हमारे अंदर स्वाभिमान की भावना होनी चाहिए।            (श्री ठाकुर दलीप सिंह जी के प्रवचनों में से)
द्वारा: प्रिंसिपल राजपाल कौर : 90231-50008,  ईमेल: rajpal16773@gmail.com

Saturday, 27 August 2016

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया

और दसों उँगलियों पर चलने वाळी बांसुरी को भूल गए ?
                                                                                                                                                                           साभार चित्र 
यह रचना हमें सोशल मीडिया ले ज़रिये प्राप्त हुई है जिसे कई लोगों ने भेजा है। इस लिए इसका वास्तविक लेखक कौन है इसका पता बहुत प्रयासों के बाद भी नहीं चल सका। इस लिए इसे यहाँ बिना नाम के ही छपा जा रहा है। इसमें छुपे गहन सन्देश को पहचानिये जिसे जन जन तक पहुँचाने की ज़रूरत जितनी आज है उतनी शायद पहले कभी नहीं थी। 
विचलित से कृष्ण ,प्रसन्नचित सी

राधा…
कृष्ण सकपकाए, राधा मुस्काई
इससे पहले कृष्ण कुछ कहते राधा बोल
उठी
कैसे हो द्धारकाधीश ? 
जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह
के बुलाती थी
उसके मुख से द्धारकाधीश का संबोधन
कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया
फिर भी किसी तरह अपने आप को
संभाल लिया
और बोले राधा से ………
मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्धारकाधीश मत कहो!
आओ बैठते है ….
कुछ मै अपनी कहता हूँ कुछ तुम अपनी
कहो
सच कहूँ राधा जब जब भी तुम्हारी
याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल
आती थी 
बोली राधा, मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं 
हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू
बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे
जो तुम याद आते
इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे
प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?
कुछ कडवे सच, प्रश्न सुन पाओ तो
सुनाऊ आपको ?
कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने
पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू
की
और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच
गए ?
एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर
भरोसा कर लिया और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए ?
कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ….
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर
लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम
आने लगी
कान्हा और द्धारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ
कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर
जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता
युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता
है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं
कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता
आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो
पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप
दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर
लिया
सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालाक होता है
उसका रक्षक होता है
आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर
बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी
क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे
आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्धारकाधीश वाळी छवि
को
ढूंढते रह जाओगे हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे
आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है
मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्धारकाधीश पर नहीं
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं
गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं
है
पर आज भी लोग उसके समापन पर
” राधे राधे” करते है”