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Tuesday, 20 October 2020

बीजेपी टीम ने मंदिर जा कर लिया आशीर्वाद

20th October 2020 at 6:21 PM

 कैलाश नगर मंडल की नवनियुक्त टीम हुई नतमस्तक  


लुधियाना
: 20 अक्टूबर 2020: (कार्तिका सिंह//आराधना टाईम्ज़)::
तेज़ी से बढ़ रही नास्तिकता और स्वार्थपूर्ण जीवन शैली के बावजूद अभी भी बहुत से लोग और बहुत वर्ग हैं जो अपने कर्मों लिए भगवान का आशीर्वाद आवश्यक समझते हैं। इन्हीं आस्तिक वर्गों में शामिल हैं भारतीय जनता पार्टी के कई लोग। इस तरह के गिनेचुने धार्मिक लोगों की आस्था आज भी यही है कि सच्ची शक्ति और सच्ची सत्ता केवल भगवान हैं। भगवत कृपा के बिना कुछ भी कर सकना सम्भव ही नहीं।  इसी विश्वास को ले कर वे लोग भगवान का आशीर्वाद लेना बेहद आवश्यक समझते हैं। 
भाजपा कैलाश नगर मंडल की एक बैठक मंडल के प्रधान रोमी मल्होत्रा की अध्यक्षता में नूरवाला रोड पर रोमी मल्होत्रा के दफ्तर में हुयी ! इस बैठक में मंडल प्रभारी जिला उपाध्यक्ष योगेंद्र मकोल,भाजपा के सीनियर नेता डा. सतीश कुमार व शिव पूरी मंडल के प्रभारी, नर्गेश्वर महादेव मंदिर के प्रधान लकी शर्मा विशेष रूप से शामिल हुए। कैलाश नगर मंडल की नवनियुक्त टीम ने मंडल के प्रधान रोमी मल्होत्रा के नेतृत्व में नर्गेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन करने के बाद नर्गेश्वर महादेव मंदिर के मुख्य स्वामी शिवानंद जी महाराज जी के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लियाऔर मंडल की टीम ने नतमस्तक होकर जीवन में श्रेष्ठ कामना को लेकर आशीवार्द लिया। नर्गेश्वर महादेव मंदिर के मुख्य स्वामी शिवानंद जी महाराज जी ने योगेंद्र मकोल, डॉ सतीश कुमार, लकी शर्मा, रोमी मल्होत्रा व नवनियुक्त पूरी मंडल की टीम को सन्मानित किया।  
  इस मौके पर नवनियुक्त मंडल महामंत्री-राकेश नागपाल, रंजीत सिंह नीटा, उपाध्यक्ष-रवि अग्रवाल, प्रेम सिंह खेड़ा, हरविंदर लाली,रमन शोरी, सचिव जय प्रकाश,नीलम टंडन, पवन अरोड़ा, यस कुमर, विनीत तिवारी, मंजीत कौर, संतोष कुमार, परवीन कुमारी, गोविंद द्रिवेदी, सूरत जैन  इत्यादि भी बैठक में उपस्थित रहे। 

Sunday, 22 December 2019

आज की ज़्यादातर थरेपियाँ मेंटल वेकेशंज़ ही हैं-साध्वी वीरेशा भारती

Sunday:Dec 22, 2019, 6:40 PM
दिव्य ज्योति जागृति सतसंग में हुई आध्यात्मिक रहस्यों की गहन चर्चा 
लुधियाना: 22 दिसंबर 2019:(आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा कैलाश नगर में सत्संग का आयोजन किया गया। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी वीरेशा भारती जी ने बताया कि आजकल कल्पना पर आधारित बहुत सी  ध्यान-साधनाएं एवं पद्धतियां प्रचलित हैं। बहुत से मनोचिकित्सक भी इन पद्धतियों को थेरेपी के रूप में अपने मरीजों पर आज़माते हैं। उन्हें मेंटल वेकेशन्स (मानसिक छुट्टियों) पर ले जाते हैं। रंग बिरंगी ख्याली दुनिया की सैर कराते हैं। इन सभी ध्यान पद्धतियों का मकसद होता है तनावग्रस्त इंसान को शांति की अनुभूति करवाना। जिस उपकरण के माध्यम से यह कल्पना की उड़ान भरी जाती है उसे मनोवैज्ञानिक मन की आंख  कहते हैं। उनका मानना है कि सब कुछ मन से होता है और मन के स्तर  पर ही होता है। अब क्योंकि इस सारी प्रक्रिया में मन ही कर्ताधर्ता है, इसीलिए इस माध्यम से आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर वास्तविक आनंद को पाना असंभव है। यह सीधा सीधा अनुपात पूर्ण तर्कसंगत है। वह इसलिए कि जो सत्ता आत्मस्वरूप मन के दायरे में आती ही नहीं उसकी अनुभूति मन कैसे कर सकता है। चाहे वह कितनी ही ऊंची छलांग क्यों ना लगा ले।
 गीता में भगवान श्री कृष्ण जी कहते हैं कि इंद्रियों से ऊपर मन है ,मन से ऊपर बुद्धि है और आत्मा  बुद्धि से भी ऊपर है। यानी कि  आत्मा का क्षेत्र मन व बुद्धि से बहुत ऊंचा है। मनोविज्ञान में भी आत्म सत्ता को मन से उच्चा माना गया है। विख्यात मनोवैज्ञानिक मास्लो पिरामिड के अनुसार भी सबसे ऊपर आत्मस्वरूप में स्थित होना है। इस शीर्ष पद के नीचे आती है तन और मन से जुड़ी आवश्यकताएं। अतः दूसरे शब्दों में कहें तो मन की परिधि इतनी विस्तृत नहीं कि उसमें आत्मा को सम्मिलित किया जा सके। इसलिए मन अपनी कल्पना के कितने भी पंख क्यों न पसार ले। उसकी  पहुंच आत्म- अनुभव तक जा ही नहीं सकती। अतः आत्म तत्व को देखने के लिए हमें उसी स्तर के उपकरण को प्राप्त करना होगा। इस उपकरण को ब्रह्म ज्ञानी महापुरुषों ने आई ऑफ द सोल अर्थात दिव्य चक्षु की संज्ञा दी है। जो समय के पूर्ण गुरु ही सक्रिय कर सकते हैं। सार रूप में आप भी अपने जीवन में ऐसे तत्व वेता ब्रह्मनिष्ठ सतगुरु की खोज करें जो आपको ब्रह्म ज्ञान की परम विद्या से दीक्षित कर सके।

Saturday, 30 November 2019

गुरु वह मिले जो चार पदार्थों का ज्ञान घट के भीतर प्रकट कर दे

Nov 30, 2019, 11:58 AM
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के सतसंग का सिलसिला निरंतर जारी
लुधियाना: 30 नवंबर 2019: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो):: 
दिव्य ज्योति जाग्रति सस्ंथान द्वारा कैलाश नगर  में सत्संग का आयोजन किया गया।  सस्ंथान के संचालक एवं संस्थापक श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी नीरजा भारती जी ने नामदेव प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भक्त नामदेव भगवान विठ्ठल के बहुत बड़े भक्त थे। उनसे प्रगाढ़ प्रेम करते थे। भगवान विठ्ठल उनके भावों को स्वीकार करने के लिए कई बार मूर्ति से प्रकट हुए क्योंकि भगवान तो भाव के भूख होते हैं। खुद प्रेमस्वरूप भगवान प्रेमावतार लेकर भक्तों के द्वार-द्वार पर अलख जगाते हैं। इसी प्रेम को ग्रहण करने के लिए प्रभु कभी विदुर के घर साग खाते हैं तो कभी शबरी के जूठे बेरों का भोग लगाते हैं। इसी प्रेम के वशीभूत होकर भगवान विठ्ठल नामदेव के समक्ष भी प्रकट होते हैं और उन्हें भक्ति का शाश्वत र्माग प्राप्त करने के लिए कहते हैं। भक्त नामदेव जी ने भक्ति के शाश्वत र्माग को प्राप्त करने के लिए गुरू विशोबा खेचर जी की शरण को प्राप्त किया। गुरू विशोबा खेचर जी ने उन्हें चार पदार्थो का ज्ञान प्रदान किया। 
साध्वी जी ने बताया कि श्री हरि के चार हाथ इन्हीं चार पदार्थो की ओर संकेत करते हैं। उनके एक हाथ में है शंख, एक में चक्र, एक में पद्म और एक में गदा है। सुदर्शन चक्र प्रतीक है प्रकाश का, शंख प्रतीक है अनहद नाद का, पद्म अमृत का और गदा प्रतीक है प्रभु के शाश्वत नाम का। गुरू ब्रह्म्ज्ञान द्वारा घट में ये चार पदार्थ प्रकट करता है और दिक्षा के समय ही परमात्मा का दर्शन करवाता है। आज हमें भी ऐसे सतगुरू की आवश्यकता है जो चार पदार्थों का ज्ञान घट के भीतर प्रकट कर दे। 

Monday, 11 November 2019

हिन्द को इक मर्दे कामिल ने जगाया खाब से...

श्री गुरू नानक देव के प्रकाश पर्व पर हज़ूर शरण बेदी की विशेष रचना 
लेखक के बेटे भरत बेदी की तरफ से बनाया गया श्री गुरुनानक साहिब का चित्र 
जिस प्रकार सूर्योदय से पूर्व रात का अन्धेरा अपनी चरमसीमा को पार कर जाता है उसी प्रकार सत्गुरू नानक देव जी से पहले का युग भारत के इतिहास का अन्धकारमय पृष्ठ था। इस काल में अन्याय का एक अध्याय खुला हुआ था। देश और समाज छोटे-2 टुकड़ों और अनेक धर्मो तथा जातियों में बंटा हुआ था, भोली-भाली जनता एक ओर तो निर्दयी शासकों की निर्दयता का शिकार हो रही थी और दूसरी ओर धर्म के ठेकेदार मौलवी और पंडित अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए धर्म के नाम पर जनता को पथभ्रष्ठ कर के आपस में लड़ा रहे थे। इस तरह जनता इनके शिकंजे में बुरी तरह से जकड़ी हुई थी, चरित्र का दिवाला निकल चुका था, घृणा और अहंकार का बोलवाला था। किन्तु,       
लेखक हज़ूर शरण बेदी 
जब इस नुकते पे आया दहर की प्रकार का चक्कर, 
जब इस हालत में पहुंची फितरते इन्सां की बदहाली,
  तो नानक ले के पैगामें हियाते जाबदां आया,
जमीं के रहने वालों में, खुदा का राज़दा आया। 
गुरू साहिब का इस देश में प्रकाश हुआ तथा उन्होंने भारतवासियों को गहरी निद्रा से जगाया। इकबाल के शब्दों में
फिर उठी तौहीद की आखर सदा पंजाब से
हिन्द को इक मरदे कामिल ने जगाया खाब से
गुरू जी ने एक चतुर वैद्य की भांति समाज की नांडी को टटोला और कराह रही मानव जाति के जख्मों पर प्रेम और एकता की मरहत लगाई। आप ने हिन्दु मुस्लिम एकता के लिए तथा जातिया भेदभाव के ज़हर को दूर करने के लिए ‘एक पिता एकस हम बालक’’ का न केवल नारा ही लगाया बल्कि अमली रूप में भाई बाला और मरदाना को साथ लेकर धर्म प्रचार का कार्य प्रारम्भ किया।
आपने हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों के तीर्थ स्थानों के दर्शन किए, एक बार जब आप से पूछा गया कि
‘‘एक साहिब, दो हदें
केहड़ा सेबें, केहड़ा रद्दे
उन्होंने फरमाया
नानक एको सिमरिए जो जल थल रिहा समाए
उस को क्या सिमरिए जो जन्मे और मर जाए
अर्थात्
‘‘इक्को साहिब, इक्को हद्द
इक्को सेवें, दूजा रद्द’’
गुरू जी ने एकता-प्यार तथा भाई-चारे का मार्ग दिखाया जिस पर चल कर भगवान को प्राप्त किया जा सकता है। 
प्रेम कियो तिन ही प्रभु पायो
गुरू जी पर प्रभु नाम की खुमारी सदा चढ़ी रहती थी और परमात्मा का नाम आते ही बेखुदी उन पर छा जाती थी। 
एक कवि के अनुसार 
‘‘मोदी खाने में रसद तोलने बैठे इक दिन
एक आेंकार कहा तोल के पहली धारण
दूई जाती रही जब दूसरी उठी धारण
तोलते युं ही रही तीसरी-चौथी धारण
बाहरवीं तोल चुके तेरहबीं आई धारण
तेरह कहना था कि एक शोला उठा अंदर से
आतशें शौक से उलफत के शरारे बरसे
इसवा फूंकने को सोजे़ ज़िगर आया था,
साहिब खाना अजब शान से घर आया था
आंख को जलवा-ए दीदार नज़र आया था
शीश-ए दिल में कोई साफ उतर आया था
बे खुदी छाई रटने लगे ‘‘तेरा-तेरा’’
‘‘यानि तेरा हूँ मैं तेरा हूँ मैं तेरा-तेरा’’
इसलिए गुरू साहिब भक्ति पर बल देते थे वे कहते थे कि ईश्वर के बिना मनुष्य इस प्रकार है जिस प्रकार 
कूप नीर बिना, धेनु क्षीर बिना, मंदिर दीप बिना 
देह नैन बिना, रैन चंद्र बिना, धरती मेह बिना
किन्तु यह ईश्वर भक्ति गुरू कृपा के बिना नही मिलती और 
गुरू जब बखशे ज्ञान का वह सुरमापुर नूर
जिस से सब अज्ञान का हो अन्धेरा दूर 
फिर तो कण-2 में भगवान की झांकी दीखने लगती है और मनुष्य की ‘‘मैं’’ निकल जाती है। और कहा ‘‘नानक जो हक्क को पाता है, वह मैं से रिहा हो जाता है,
मै छोड़ के ‘तू ही’ कहता है, ‘तूही तू’ जपता रहता है।’’
गुरू जी की भक्ति जहां शील-संयम-दया तथा संतोष पर टिकी हुई है वहां भय और डर का उस में कोई स्थान नही। आपने लोधी शासकों की स्पष्ट रूप से निन्दा की और कहा ‘‘भारत हीरे जैसा देश था परन्तु कायर लोधी शासकों ने इसे ध्वस्त और विनष्ट कर दिया ‘‘आपने बाबर के सामने कहा-
‘‘पाप की जंज लै काबलों छाया जोरी मंग दान वे लालो
निडर भक्ति की इस परम्परा को श्री गुरू अंगद देव जी ने आगे बढ़ाया, जिस से एक जीती जागती वीर तथा जिन्दादिल जाति का उदय हुआ।
गुरू जी कर्म और भक्ति पर बल देते थे। मक्का में जब हाजियों ने पूछा,
‘‘पुच्छन फोल किताब नू, हिन्दु बड़ा कि मुसलमानोई
बाबा आखे हाजियो, कर्मों बाझो दोबे रोई’’ 
आप ने निष्कर्म पर बल दिया और कहा
किए जा अमल और न ढूँढ इस का फल 
अमल कर अमल कर न हो वे अमल 
गुरू जी ने नारी जाति का बहुत सम्मान किया
‘‘उस क्यों मंदा आखिए, जिस जन्मे राजन,’’

श्री गुरू ननक देव जी ने जहा भ्रम, पाखंड, संदेह और छूआछात आदि को दूर करने के लिए निडरता से जनता का पथ-प्रदर्शन किया वहां उन्होंने मानव-मात्र की एकता पर भी बल दिया।
‘‘नाम-जपन-वण्ड छकन’’ की प्रथा चलाई। आज जब देश में फूट ने अपना डेरा जमा लिया है पृथकता की भावनाओं को बढ़ावा मिल रहा है, भाषा तथा जाति के नाम पर तूफान खड़े किए जा रहे हैं जिस से देश की एकता और अखण्डता खतरे में पड़ गई है इस कठिन समय में भी गुरू जी का प्रेम-एकता तथा कर्मो का मार्ग ही हमारा ठीक नेतृत्व कर सकता है। यदि हम ठीक अर्थो में उन का जन्म दिन मनाना चाहते हैं तो एक उर्दू शायर के शब्दों में
जो उनका दिन मानते हो तो इरशादात भी समझो 
जो उनका दिन मानते हो तो उनकी बात भी समझो
जो उनका दिन मानते हो कुछ इखलाक भी सीखो
जो उनका दिन मानते हो तो गमे आफाक भी सीखो
                                                                                      --‘‘हज़ूर शरण बेदी’’ 

Saturday, 28 September 2019

ग्यासपुरा में सात दिवसीय श्रीमद देवी भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन

Saturday:Sep 28, 2019, 4:37 PM
आयोजन दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से ग्यासपुरा  में 
लुधियाना: 28 सितंबर 2019: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से गगन नगर ग्यासपुरा  में  29 सितम्बर से 5 अक्टूबर  तक सात दिवसीय श्रीमद देवी भागवत  कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। जिसका समय प्रतिदिन सांय 7 बजे से रात्रि 10 बजे तक रहेगा। इस कथा में आप  को   माँ के विभिन्न अवतारों के पीछे छिपे रहस्यों को  अध्यात्म, विज्ञान, संगीत के माध्यम से रसपान करेंगे। इस कथा को वांचने के लिए श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या  साध्वी  भद्रा भारती जी दिल्ली से पधार रही हैं। 

इस उपलक्ष्य में शहर में मंगल कलश यात्रा का आयोजन किया गया।  इस कलश यात्रा की शुरुआत स्वामी प्रकाशानंद जी,  पार्षद सोनिया शर्मा ,श्री पंकज शर्मा ,बलजीत सिंह मान,निर्मल सिंह,सरबजीत सिंह जी,तरलोचन सिंह काका जी  द्वारा झंडी   दिखाकर की गई।कलश यात्रा  से पहले  श्री  सुमन ठाकुर,धर्मपत्नी पूनम ठाकुर सपरिवार द्वारा पूजन करवाया गया। कलश यात्रा के महत्व को बताते हुए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य  स्वामी गुरुकृपानंद जी ने कहा कि  माँ शक्ति के सभी रूप मोक्ष और बलिदान का संदेश देते हैं।वह शुद्धता ,ज्ञान,सत्य और आत्म साक्षत्कार का अवतार है।कलश के अग्रभाग में देवताओं का निवास होता है। दूसरा, यह हमारे मानव मस्तिष्क का भी प्रतीक है। जिसमें अमृत का कुंड स्वीकार किया गया है। कलश यात्रा हमें निमंत्रण देती है कि आओ अपने मानव तन में ही परमात्मा का दीदार प्राप्त करो। यही हमारे जीवन का लक्ष्य है। इस यात्रा में  प्रदूषित हो रहे वातावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने हेतु पर्यावरण संरक्षण नामक झांकी का भी आयोजन किया गया, जिसमें बताया गया कि यदि वातावरण को प्रदूषित होने से न रोका गया तो आने वाले समय में हमारे लिए सांस लेना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए हमें अधिक से अधिक वृक्ष लगाने चाहिए ओर उनकी देखभाल भी करनी चाहिए। ताकि हमारी आने वाली पीढिय़ां अच्छे से जीवन यापन कर सकें।

वैदिक मंत्र उच्चारण के साथ इस कलश यात्रा में   501 सौभाग्यवती महिलायें  पीले वस्त्रों में  कलश उठा कर चलीं और प्रभु के आशीर्वाद को प्राप्त किया। सारा शहर इस यात्रा की भव्यता में लीन हो गया ।यह कलश यात्रा विभिन्न  मार्गों से होती हुई कथा स्थल पर आकर समाप्त हुई।  कलश यात्रा का जगह-जगह पर बहुत ही श्रद्धा और सम्मान के साथ स्वागत किया गया। 

Friday, 25 January 2019

भज गोविन्दम के लिए निमंत्रण देने का अभियान जारी

आयोजन 26 जनवरी 2019 को लुधियाना के गुरु नानक भवन में  
लुधियाना:24 जनवरी 2019: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो):: 
बहुत से विरोधों और विवादों के बावजूद दिव्या ज्योति जागृति संस्थान निरंतर सक्रिय है। मामला सतसंग आयोजनों का हो या फिर शिक्षा से सबंधित अन्य क्षेत्रों का। इस संस्थान ने हमेशां इस बात  केंद्रित रखा कि उनका अभियान तेज़ कैसे हो। इस बार तैयारी है भज गोविन्दम भजन संध्या की। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान से स्वामी प्रकाशा नंद ने जिला कांग्रेस के नव नियुक्त जिला प्रधान अश्विनी शर्मा एवं सूरज उद्धोग के मदन लाल बस्सी से एक भेंट करके उन्हें आमंत्रित किया। स्वामी प्रकाशा नंद ने इन दोनों को भज गोविन्दम भजन संध्या का निमंत्रण कार्ड दे कर आयोजन में आने के लिए निमंत्रित किया। स्वामी प्रकाशा नंद ने   बताया कि यह प्रोग्राम 26 जनवरी  को गुरु नानक देव भवन ,भारत नगर चौक में साय 6 से 9 30 बजे तक होगा। इस यादगारी आयोजन में पहुंचने वालों को आध्यत्मिक जागृति के दुर्लभ आनंद के पल प्राप्त होंगें। 

Sunday, 27 May 2018

बुराई की जड़ पर वार करना ज़रूरी-साध्वी महाशारदा भारती

Sun, May 27, 2018 at 2:27 PM
तभी मानव वास्तव में मानव बन पायेगा
लुधियाना: 27  मई 2018: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा गांव हरनाममपुरा   में अध्यात्मिक सत्संग विचारों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ समुधर भजन ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान’ के गायन से की गई। 
इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को अध्यात्मिक विचार देते हुए श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या साध्वी  महाशारदा भारती जी ने कहा कि वर्तमान समय में समाज नफरत, स्वार्थ, आतंकवाद जैसी तरह-तरह की कुरीतियों से ग्रस्त है। अमानवीय आचार-विचार मानवीय निष्ठाओं का गला घोंट रहे हैं। समाज में तरह-तरह की कुरीतियां मानव का दमन कर रही हैं। ऐसा नहीं कि कुरीतियों को समाप्त करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा, निरन्तर कोशिशें जारी हैं, पर परिणाम सामने नजर नहीं आ रहे। दरअसल प्रयास तो मौजूद हैं, परन्तु सही दिशा का अभाव है। हमें खत्म करना था आतंकवाद को, लेकिन हमने खत्म किये आतंकवादी, हमें लगता है कि इसमें गलत क्या है। यहां पर एक छोटी सी गलती हो गई, हमने समाप्त करना था आतंकवाद एक, आतंकवादी को मार दिया और अनेकों आतंकवादियों ने जन्म ले लिया। ठीक वैसे ही जैसे एक

रोगी का रोग खत्म करने के स्थान पर हम उसका यदि रोग कुछ समय के लिए दबा दें तो क्या उसका रोग खत्म होगा, नहीं। उसका रोग समाप्त करने के लिए हमें रोग की जड़ तक जाना पड़ेगा, फिर ही वह रोगी रोग मुक्त होगा। साध्वी जी ने कहा जैसे यदि कोई जंगली पौधा उग जाए तो उसे समाप्त करने के लिए उसके पत्ते, टहनियों को काट देना प्रयत्न नहीं होता, उसकी जड़ पर वार करना पड़ता है। ठीक वैसे ही समाज में फैली समस्त कुरीतियों को ऊपज मानव मन है, आज आवश्यकता है ब्रह्मज्ञान द्वारा मन को सही दिशा पर लेकर जाने की। आज आवश्यकता है निकृष्ट विचारों का दमन करने की और यदि ऐसा हो जाता है तो
मानव वास्तव में मानव बन पायेगा। कार्यक्रम के अंत में ब्रह्मज्ञानी साधकों ने प्रभु ध्यान कर विश्व शांति की मंगल कामना की। 

Thursday, 1 February 2018

अध्यातिमक परिर्वतन द्धारा ही युवा वर्ग कुरीतयो का अंत कर सकता है

Thu, Feb 1, 2018 at 11:08 AM
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्धारा होटल महल  में संगीत मई भजन संधया का आयोजन किया गया

लुधियाना: 31 जनवरी 2018: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::
हमारी सनातन पद्धति को निभाते हुए श्री  रजनीश धिमान (बी.जे.पी सैकरेटरी लुधियाना), ज्ञान चनद शरमाजी के द्वारा ज्योति को प्रज्जवलित  किया गया। जिसमें सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के परम शिष्य साध्वी गरिमा भारती जी ने अध्यातम की जानकारी देते हुए समुह को संबोधित किया कि आज इंसान ने संसार की हर बुलंदी को छुआ है। चाहै वह विज्ञान का जगत हो या फिर राजनीतिक जगत। पर इन बुलंदीयो को प्राप्त कर लेना ही जीव की असल प्राप्ति नही है। कयोकि इन सभी का सबंध अध्यातिमक जगत से है। कयोकि अध्यातम को जाने बिनां इंसान का जीवन अपूर्ण है। जब इंसान अध्यात्म की शरण में जाता है तो उसके जीवन में आंतरिक बदलाव आता है। बाहर से जीव जितना भी बदल जाए कितनी भी उन्ती कयो न कर लें। यदि उसने अपने आप को नही बदला, अच्छाई को अपने भीतर आरोपित नही किया। तब तक वह असली जीत को हासिल नही कर सकता और यह बदलाव एक पुर्ण संत की शरण में जाकर ही हासिल हो सकता है।  
           आगे साध्वी जी ने बताया कि जैसे अंगुलीमार डाकू अपने जीवन में पाप करने के लिए चाहे कितना दृढ संकलपी था पर उसके जीवन को सही दिशा तब ही मिली, जब उसके जीवन में भगवान बुद्ध जी का आगमन हुआ। कयोंकि बुद्ध जी ने ऊंगलीमार के जीवन में अध्यातिमक परिर्वतन किया। जिसके कारण वह डाकु से भकत बन गया। संसार में अनेक प्रकार की क्रांतियां अनेक प्रयासों के द्धारा की जाती हैं। अध्यातिमक क्रांति केवल पुर्ण संत के द्धारा ही संभव है। सत्संग में जाकर इंसान की सोच परिवर्तित होती है और जो इंसान सोचता है वही उसके कर्म में दिखाई देता है और कर्म के आधार पर ही इंसान की आसतित्व निरधारित होता है। सत्संग में ही इंसान की हैबानीयत या बुराई भरी सोच को परिवर्तत करके अच्छाई में तबदील किया जाता है।  
           आगे साध्वी जी ने कहा कि आज समाज में जो सबसे बढी समस्या है वह है युवा वर्ग में नशे की समस्या नशे की बढती हुई लत। समाज का प्रत्येक वर्ग इस गंभीर बिमारी से जुझ रहा है। आज यदि इस समस्या को नियंत्रण ना किया गया तो इसके बहुत ही कुप्रभाव हमारे समाज को देखने को मिलेगे। एक मात्र सत्संग ही ऐसा माध्यम है जो युवा वर्ग को उस की वास्तविक पहचान करा सकता है। 
          इसी अवसर पर विशेष रूप में स्वामी प्रकाशानंद, स्वामी गुरु कृपा नंद, ने अपनी अपस्थित दी

Monday, 25 December 2017

साध्वी मीमासां भारती ने किया सभी को मंत्रमुग्ध

Mon, Dec 25, 2017 at 11:24 AM
कर्म ही हमारे जीवन का करता धरता
लुधियाना: 25 दिसम्बर 2017: (आराधना टाईम्स ब्यूरो)::
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्धारा कैलाश नगर  आश्रम में अध्यात्मिक प्रवचनों का आयोजन किया गया जिसमें श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या साध्वी मीमासां भारती जी ने आए हुए समुह को संबोधित करते हुए कहा कि कण-कण में ईश्वर निवास करता है। वही ईश्वर हमारे घट में विराजमान है उसी से मिल जाना ही आज के इंसान का प्रथम लक्ष्य है। जिस प्रकार से तेज वेग के साथ बहती हुई नदी का लक्ष्य है सागर में मिलना ठीक वैसे ही एक जीव आत्मा का उदेश्य सागर रूपी प्रभु में मिल जाना है। तभी जीव आनंद, शांति और सुख को प्राप्त कर सकता है। हर जीव अपने कर्म के अनुसार ही सुख और दुख को प्राप्त करता है। कर्म ही हमारे जीवन का करता धरता भी है। जिसको किए बिना हमारा जीवन चल ही नही सकता। इंसान जीवन और मृत्यु के बीच में बहुत से कार्य करता है। पर हमने विचार यह करना है कि हमने कर्म कौन सा करना है। प्रमात्मा के द्धारा बनाई गई यह सृष्टि कितनी सुन्दर और कितनी प्रेरणा दायक है। अगर इंसान चाहे तो इससे बहुत कुछ सीख सकता है। जैसे हम हर सुबह सुरज को देखते है जब वह निकलता है तो जो उसकी रौशनी सारी धरती पर पड़ती है क्या वह सदा के लिए धरती पर रहती है? चांद निकलता है अपनी मधुर रौशनी देता है तो क्या उसकी रौशनी भी सदा के लिए धरती पर रहती है? विशाल सागर को देखे उसकी विशाल लहरे पुरे दम खम के साथ तट की और आती हैं उसे छुने के लिए तो क्या तट को छू लेने के बाद वह सदा सदा के लिए तट की होकर रह गई? नही यह  सत्य नहीं है। यह सभी कुछ हमारे लिए है हमे समझाने के लिए है सांझ ढलने पर जो सुरज की रौशनी है वह वापिस सूरज में समाहित होती है, चांद की रौशनी को चांद में लौटकर शांति मिलती है इसी तरह सागर की लहरों को भी सागर में लौटना होता है। क्यूँकि अंशी सदैव अपने अंश की और ही बढा करता है।
                        आगे साध्वी जी ने कहा कि प्रभु की एक अदुभुत भेंट इस सृष्टि को इंसान जिसका यह सौभाग्य प्राप्त है कि वह ईश्वर का अंश है। इंसान के अंश होने के साथ इसका अंशी वह प्रमात्मा है। हम देखें कि जहां सभी अंश अपने अंशी की ओर जा रहे हैं वही पर आज के मानव को अपने अंशी की बिलकुल भी खबर नही है। उसकी बिलकुल भी याद इंसान के भीतर नही है।  वह प्रमात्मा से बेमुख हो चुका है। वह अपने कर्म को भुल कर इस संसार की मौह माया की नींद में सो गया है। लेकिन हमारे महापुरूष कहते है कि इंसान इस संसार में तेरा कोई नही है और ना ही तुमने इस संसार में सदा सदा के लिए रहना है तुझे एक ना एक दिन इस संसार को छोड कर जाना है इस लिए तु जाग इस नींद से और अपने अंशी उस प्रभु की और मुख कर उसे जान और अपने जीवन को सार्थक कर। और इस जीवन को मुल्य को जानने के लिए अपने अंशी से मिलने के लिए तुमे आज जरूरत है एक मार्ग दर्शक की। और इंसान का मार्ग दर्शक तो एक गुरू-एक संत ही हो सकता है जो उसका मार्ग प्रशस्त करे। इस संसार की ओर नही बल्कि उसके अंशी उस प्रमात्मा की तरफ जाना ही लक्ष्य हो। वह लक्ष्य जिससे मिलने के लिए उसे यह मानव तन प्राप्त हुआ। इंसान अपने जीवन में बहुत से पाप कर्म करता है इन पापों का निवारण इंसान गुरू की शरण को प्राप्त कर ही कर सकता है। ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करना और अपने जीवन को उसके माध्यम से सफल बनाना ही वह कर्म है जिसे करने के लिए प्रमात्मा ने इंसान को इस संसार में सब से ऊंचा दर्जा दिया। 

                        अंत में इसी अवसर पर साध्वी रवनीत भारती जी के द्धारा प्रेरणा दायक भजनों का गायन किया गया।  

Sunday, 5 November 2017

भगवान कृष्ण की रासलीला के गहन रहस्यों की चर्चा

Sun, Nov 5, 2017 at 12:45 PM
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की तरफ से विशेष आयोजन 
लुधियाना: 5 नवंबर 2017: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::  
जुर्म और बुराई की आंधी के बावजूद आध्यात्मिक तरंगों के आयोजन का सिलसिला लुधियाना में बड़े पैमाने पर जारी है। शायद इन्हीं तरंगो के कारण अभी तक बहुत से लोगों के मन में भगवान का डर बना हुआ है और वे पाप करते समय कई कई बार सोचते हैं।
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की तरफ से गगन नगर, ग्यासपुरा में समूह इलाका निवासीयों के सहयोग से शुरू हुई नौ दिवसीय श्री मद्धभागवत  कथा ज्ञान यज्ञ के अष्टम दिवस की सभा का शुभारंभ श्री सि़ग़ल, सुमन ठाक़ुर जी ने  परिवार सहित भागवत पूजन कर किया। इसके उपरांत आज के मुख्य अतिथी विश्वनाथ सिह,रजिनदर मरपाल जी ने ज्योति प्रज्वलित कर किया। कथा को भक्तों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या महामनस्विनी कथा व्यास साध्वी भागयाश्री भारती जी ने भगवान श्री कृष्ण की अलौकिक लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि जिस प्रकार शबरी और केवट ने प्रभु श्री राम से अन्नय प्रेम स्थापित किया उसी प्रकार द्वापर में भी भगवान श्री कृष्ण के साथ गोपियों का अन्नय प्रेम था। भगवान श्री कृष्ण के साथ उन गोपियों का अटूट प्रेम, विश्वास एवं श्रद्धा थी। इसी कारण वह प्रेम में मगन हो चुकी थी। लेक्नि आज संसार गोपियों के उस प्रेम को संदेहात्मक दृष्टि से देखता है। इस संबंध में लोगो के तरह तरह के बिचार है कि वह तो गोपियों के साथ रासलीला करते थे। भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ जो रासलीला की उस समय उनकी बालक अवस्था थी और गोपियाँ कुछ वृद्धा कुछ यौवनाए एवं बालक अवस्था की थी। रासलीला के पीछे छुपे हुए रहस्यों को उजागर करने के साथ-साथ संशयात्मक दृष्टिकोण को भी दूर किया कि वास्तव में रास लीला का क्या अर्थ है? हमारे शास्त्रों में कहा गया है जिस रस से आनन्द की प्राप्ति होती है वह रस है परमात्मा। परमात्मा ही रस है। श्वेतासर उपनिषद में भी इस संबंधी कहा गया है कि विश्व के निवासी उस अमृत रस रूपी ईश्वर संतान है। जब आत्मा और परमात्मा का मिलाप होता है तभी रास लीला होती है। यह अन्तर की स्थिति होती है। यह मिलन केवल पूर्ण संत सद्गुरू की कृपा से ही संभव है।
                 आगे साध्वी जी ने सदगुरु के बारे में बताते हुए कहा कि कुछ समाज विरोधी तत्व ऐसे गुरू का विरोध करते आए है। क्योकि वह नही चाहते कि समाज में किसी प्रकार की शांति या अमन फैले वह तो इंसान का इंसान से बंटवारा चाहते हैं। लोगो में एैसे संतो के विषय में निराधारा गलत धारणाओं व अफवाहों को फैला देते है तांकि लोगो के मन में ऐसे संतो के प्रति हफरत पैदा हो सके। लेकिन जिस ने भी संत सद्गुरू की कृपा से अपने भीतर प्रभु का दर्शन किया है वह कभी भी इस तरह की व्यर्थ बातों पर विश्वास नही करते। संत की पहचान करने वाले कभी भी संत का विरोध नही करते। विरोध करने वाले तो वह लोग होते है जिनका धर्म व सत्य से कोई लेना देना नही होता। आगे साध्वी जी ने कथा प्रसंग की आते हुए कहा कि भगवन श्री कृष्ण की लीलाएं एक दिव्य संदेश प्रस्तुत करती है। जिसका भगवन श्री कृष्ण ने भी भागवद्गीता में उद्घोषण किया है कि मेरे जन्म और कर्म दिव्य व अलौकिक है। पभु इन उदगारों का अर्थ यही है कि वह अपने जीवन के प्रत्येक पहलू से कोई ऐसी सीख, कोई ऐसा संदेश प्रस्तुत करते है जिसे अपने जीवन में धारण करने हर मानव दुख और क्षोभ को छोडकर आनन्द को प्राप्त कर सकेगा। उस सुख को प्राप्त कर सकेगा जिसकी प्राप्ति के लिए वह ताउम्र प्रयासों में लगा रहता है। यदि वर्तमान मानव की समस्याओं को देखे इससे निजात का मात्र एक ही तरीका है। प्रभु का साक्षातकार जिससे न केवल मन को सही दिशा ही मिलेगी बल्कि एक अंकुश भी मिलेगा। यह केवल पूर्ण गुरू के चरणों में अर्पित हो, ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति से ही सम्भव  है। ब्रह्म ज्ञान का अर्थ ही गुरू कृपा के द्धारा मानव तन के भीतर प्रभु दर्शन करना है या यूँ कहिए कि यही प्रभु का अवतरण है।
                      इसी अवसर पर साध्वी सुश्री भगवती भारती जी, साध्वी सुश्री सतिन्दर भारती जी, साध्वी पुष्पभद्रा भारती जी, साध्वी संदीप भारती, साध्वी रेनु भारती जी के द्वारा सुन्दर भजनों का गायन किया गया। विशेष रूप मे परमहंस, रमन शर्मा, के.एस. ठाकुर , लाला रमेश, संदीप सिंह ढिल्लों, दर्शन गोगना, अर्वन कुमार, सतनाम सिंह, सरबजीत सिंह, सधु सुद,  मान सिंह, कैलाश चौधरी, जतिंदर  मलहौत्रा जी ने अपनी हाजरी लगवाई। कथा को विराम प्रभु की पावन आरती के साथ दिया गया।  

Tuesday, 12 September 2017

आज सारा संसार बारूद के ढेर पर बैठा है

Tue, Sep 12, 2017 at 5:48 AM
मन को बेलगाम छोड़े रखा तो विनाश निश्चित
लुधियाना: 12 सितम्बर 2017:(पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्धारा लोहारा में चल रहे दो दिवसीया सतसंग विचारों के दुसरे दिन की अध्यक्षता करते हुए श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या साध्वी तेजस्वनी भारती जी ने प्रवचन करते हुए कहा कि सादा सरल और सफल जीवन जीने के लिए कुदरत को समझना बहुत जरूरी है। मानव का कुदरत के नियमों के साथ अटूट संबंध है। मानव ने कुदरत में से ही जन्म लिया है लेकिन आज इंसान की जिन्दगी के अलग-अलग क्षेत्रों में गंभीर संकटो का सामना कर रहा है। पदार्थवाद का बढ़ रहा असर और जीवन में सुख प्राप्त करने की लालसा ने मानव की सामाजिक दशा के ऊपर बहुत असर डाला है। जिस कारन इंसान रूझान ऊँच कदरों कीमतों से मुडकर भ्रष्टाचार, नफरत और ईर्खा की और ज्यादा हो गया है। इसी कारण सत्य, दया और नैतिकता जैसे सदाचारक पहलुओं पर आधारित जीवन की कदरों कीमतों को बहुत नुकसान पहुँचा है। परिवारिक रिश्तों में विखराव बड़ गया है। इसको रोका जा सकता है अगर कुदरत के नियमों के अनुसार आपस में प्यार से रहते हुए ऊंचे सदाचारक गुणों को जीवन में धारण किया जाए और अध्यात्मिक और नैतिक क़द्रों कीमतों के उपर अधारित जीवन की तरफ कद़म बढाए जाएँ।

                   साध्वी जी ने कहा कि इंसान इस सृष्टि का सबसे विकसित प्राणी है। उसने अपनी बुद्धि से इस संसार के रहस्यों का काफी हद तक पता लगा लिया है। कुदरत में छिपे रहस्यों को जान कर उसने अपनी जिन्दगी को खुशहाल बनाया है। लेकिन इस विकास के दौर में उसका स्वार्थ पता नही कब शामिल हो गया कि उसने अपनी बुद्धि का नकारात्मक प्रयोग करना शुरू कर दिया। मानव का विकास तब तक अधुरा ही रहेगा जब तक वह अंत्रमुखी होकर अपने सच्चे स्वरूप की पहिचान नही कर लेता। जिस तरह विज्ञान बाहरी जगत से अवगत करवाता है इसी तरह अध्यात्म विज्ञान मानव के भीतरी जगत के भेद खोलता है। यह विज्ञान ही देन है कि आज सारा संसार बारूद के ढेर के उपर बैठा है। कोई पता कि कब एक धमाका हो और सारा विश्व तहस नहस हो जाए। मानवी समाज आज लाचार होकर विनाश के किनारे पर खड़ा  है। आज का मानव लोक कलयाण की भावना को विसार चुका है। मानव के अंदर बैठा शैतान इतनी तेजी से काम कर रहा है कि वह दिन दुर नही है जब जीवित लोग मुर्दों से ईर्ष्या करनी शुरू कर देंगे। नैतिक मुल्य स्वार्थ की भेंट चड़ कर अपने आप खत्म हो रहै है। आज युवा अपने राह से भटक रहा है और उसे देखकर यह लग रहा है कि अगर समय के रहते हुए उसे सही रास्ता ना दिखाया गया तो समाज का विनाश निशचित है। यह बात बिल्कुल सत्य है कि नैतिक और अध्यात्मिक कदरो कीमतो के स्थान पर इंद्रीयों के सुख को ज्यादा महत्व देने वाले भौतकिवादी आदर्श और अपने सुख बढ़ाने वाले दुसरो का नुक्सान करने वाली प्रावृति मानवता को घोर विनाश के मार्ग की और लेकर जा रही है। अगर हमने अपने सुखो को प्राप्त करने के लिए अपनी आत्मा की आवाज को अनसुना कर दिया तो इन सब का कया लाभ? अगर इंसान अपने ही मन पर लागु नही कर सकता तो फिर अनेको पुलाड़ी यंत्रों को काबु करने का कया फायदा? जबकि हमारे महापुरूषों ने कहा है कि- ‘मन जीते जग जीत’ अगर हमने अपने मन को वश में कर लिया तो हम सारे संसार को जीत लेंगे। लेकिन हम अपने मन की लगाम को खुला छोडक़र सब कुछ हासिल करना चाहते है और हमारी इसी सोच के नतीजे आज हमारे सब के सामने है।  
             इसी अवसर पर साध्वी रवनीत भारती जी ने सुमधुर भजनो का गायन भी किया। विशेश रूप में मनजीत सिंह, बलबीर सिंह कुलार, सतवंत सिंह, जसप्रीत सिंह, सुखदेव सिंह, सतनाम सिंह आदि ने अपनी उपस्थति दी।

Monday, 11 September 2017

शिष्य वही जिसे गुरू वचनों पर विश्वास है-साध्वी भारती जी

Mon, Sep 11, 2017 at 7:07 AM
शिष्य तो वह है जो चुनौतियों का डट कर सामना करे
लुधियाना: 11 सितम्बर 2017: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: 
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा लोहारा में दो दिवसीय विषेश सभा का आयोजन किया गया।  प्रथम दिवस मे कार्यक्रम की शुरूआत साध्वी रवनीत भारती जी द्धारा गुरु महिमा में एक भजन ‘धीरज रख वो रहमत की वर्षा बरसा भी देगा’ गाकर की। इसके उपरांत सर्वश्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या साध्वी ममता भारती जी द्धारा उपस्थित भक्तों को विचार देते हुए कहा कि जैसे एक स्त्री श्रृंगार के बिना और वृक्ष पत्तों व फूल के बिना सुंदर नहीं लगते, ठीक वैसे ही एक साधक भी धीरज, दया, प्रेम, विश्वास, श्रद्धा आदि के बिना साधक नहीं बन पाता। हमारे धार्मिक ग्रंथों में कहा गया कि शिष्य वो नहीं जो पल-प्रतिपल संकट से घबराकर डर जाये, शिष्य तो वह है जो चुनौतियों का डट कर सामना करे। जैसे भक्त हनुमान जी जब भक्ति को प्राप्त करने के लिए चले तो उनका मार्ग रोकने वाले कितने ही लोग आये, परन्तु वह सभी का डटकर सामना करते हैं। भक्त को यदि कोई विजय दिला सकता है तो वह भक्त का दृढ़ विश्वास जैसा विश्वास शबरी जी के पास था। उनके गुरु मंतग मुनी जी ने कहा एक दिन तुमहारी ‘कुटीया में श्रीराम जी अवश्य आयेंगे’। उन्हें अपने गुरु के वचनों पर विश्वास था और वह इंतजार करती है और एक दिन वह भी आता है, जब उसकी कुटिया में श्री राम जी आते भी हैं। कहने का भाव यदि विश्वास हो तो चट्टान की तरह मजबूत।
   आगे साध्वी जी ने कहा कि यदि हम संसार की ओर ध्यान से देखें तो इसमें यदि कुछ महतवपूर्ण है तो वह है केवल मात्र विश्वास-जैसे बनाने के लिए बहुत लम्बा समय लगता है और टूट जाने के लिए पल भर। इसलिए भक्त भी गुरु चरणों में सदैव विश्वास के सहारे अपनी प्रीत जोडक़र रखता है और ऐसी प्रीत की एक उदाहरण है भक्त प्रलाहद जी। उनका पिता उनके ऊपर कितने अत्याचार करता था, परन्तु भक्त प्रलाहद जी सदैव अपने श्री हरि पर विश्वास और प्रेम होने के कारण हर संकट से बच जाते और एक दिन जब प्रलाहद जी ने कहा कि मेरा प्रभु इस स्तंभ में भी है तो प्रभु को अपने भक्त की रक्षा और विश्वास को जीतने के लिए प्रकट होना पड़ता है। इसीलिए विश्वास सदैव जीतता है, हार कभी नहीं होती।
     अंत में साध्वी जी ने कहा कि हमें भी अपने ईष्ट पर पूर्ण विश्वास व श्रद्धा रखनी चाहिए। कार्यक्रम के अंत में सभी ने विश्व शांति की मंगलमयी कामना को धारण करते हुए सामूहिक ध्यान साधना भी की और साध्वी रवनीत भारती द्धारा समधुर भजनों का गायन किया गया।

Monday, 7 August 2017

हम चिंतन में कम और चिंता में अधिक समय लगाते हैं

Mon, Aug 7, 2017 at 1:19 PM
चिंता है, चिता तक लेकर जाती है और चिंतन परम मोक्ष की ओर
लुधियाना: दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा मेहरबान राहों रोड पर एक दिवसीय अध्यात्मिक विचारों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ साध्वी मनजीत भारती जी द्वारा समुधर वाणी के द्वारा संतों की रचना-मानत नहीं मन मोरा रे अनिक बार में इसे समझाऊं, जग में जीवन थोरा रे, के गायन से किया गया। इस अवसर पर श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या साध्वी सुश्री सोमप्रभा भारती जी ने कहा कि हमारे संतों ने इस संसार को कभी रैन बसेरा, किराये का घर आदि अनेकों तरह की संज्ञा दी और समझाया कि जीवन तेरा कोई पक्का टिकाना नहीं, कहते हैं यह बात यदि कोई नहीं समझता वो हमारा मन है, जो यदि किसी को इस संसार में विदा होते हुए दिखता है, तो कहता है हमने भी एक न एक दिन इस संसार को छोडक़र जाना है, परन्तु जैसे ही कुछ दिन व्यतीत होते हैं, फिर से माया का प्रभाव पड़ जाता है और इंसान मौत को भूल जाता है। मन विकारों का संग कर भ्रमित करता है, परन्तु हमारे संतों ने अपनी अनेकों रचनाओं द्वारा समझाया है कि यदि मृत्यु पर विजय प्राप्त करना चाहते हो तो अपने जीवन में दो बातों को हमेशा याद रखें। पहला मौत व दूसरा ईश्वर को, जो जीवन में इसे ध्यान रखते हैं। वह अपने मन को समझाते हैं कि जन में जीवन में बहुत थोरा है, इसके समाप्त होने से पहले-पहले जीवन के उद्देश्य को जान लें। संत कबीर दास जी ने अपनी रचना में कहा हमारा एक-एक श्वास प्रभु की बंदगी के बिना व्यर्थ है। हमें एक-एक श्वास को ईश्वर के चिंतन में लगाना चाहिए, परन्तु हमारी आदत क्या है? हम चिंतन में कम और चिंता में अधिक समय लगाते हैं। चिंता है, चिता तक लेकर जाती है और चिंतन परम मोक्ष की ओर तो क्यों न जीवन में ईश्वर का चिंतन किया जाये, परन्तु एक प्रश्न है कि चिंतन तो उसी का हो सकता है, जिसे देखा है, क्या हमने जीवन में कभी ईश्वर को देखा है? यदि पूर्ण गुरु की कृपा से गुरु ने आपके अंतकरण में ईश्वर के प्रकाश रूप के दर्शन करवाए हैं तो उस प्रभु चिंतन करना कठिन नहीं। यदि अभी तक ब्रह्मज्ञान का आगमन जीवन में नहीं हुआ तो हमें सर्वप्रथम ऐसे गुरु की खोज करनी चाहिए जो आपके घट में दर्शन करवाए तो उसका ध्यान लगाया जा सकता है। कार्यक्रम के अंत में सभी ने प्रभु ध्यान में रत होकर विश्व शांति की मंगल कामना के लिए ध्यान साधना की। इस अवसर पर साध्वी मनजीत भारती जी ने समुधर भजनों का गायन किया। इस मौके विशेष रूप से शंकर गुप्ता, धर्मपाल, करनैल सिंह, गुलजार सिंह, बहादुर सिंह, जग्गा सिंह, योगेश शर्मा, बिट्टू शर्मा, कोमल कुमार, अंतरप्रीत सिंह, परमिंदर सिंह, रमेश कुमार, संदीप, सतनाम सिंह, विकास कुमार, प्रदीप कुमार आदि ने अपनी हाजरी लगाई।

Wednesday, 21 September 2016

हमें अपने संस्कारों तथा रीति-रिवाजों को महत्व देना चाहिए

सभ्यता तथा संस्कृति के प्रति स्वाभिमान सिखाते ठाकुर दलीप सिंह 
हमारा देश भारत महान है।इसकी सभ्यता और संस्कृति भी महान है इसलिए हमें अपने देश के प्रति स्वाभिमान होना चाहिए। सबसे पहले तो हमारे देश का नाम इंडिया या हिंदुस्तान नहीं बल्कि भारत है जो कि भरत नाम के प्रतापी और महान राजे के नाम पर रखा गया है। अन्य नाम तो विदेशियों द्वारा रखे हुए नाम है इसलिए हमें अपने देश के नाम भारत पर गर्व होना चाहिए कि हमारे देश जैसा कोई और देश हो ही नहीं सकता।
        इसी तरह सभी को अपनी-अपनी मातृभाषा का प्रयोग ही ज्यादा करना चाहिए। हमारी मातृभाषा हमारी अपनी माँ है। इसलिए हमें अपनी भाषा पर स्वाभिमान होना चाहिए। हमारी भाषा की विशेषता यह भी है की इसमें अंग्रेजी से ज्यादा अक्षर व शब्दावली हैं, अतः हमारी भाषा ज्यादा अमीर है। इसलिए अपनी भाषा पर गर्व करते हुए हमें दैनिक जीवन में, आपस में वार्तालाप करते समय Father , Mother , Brother, Sister , Uncle ,or Aunt की जगह; माता जी, पिता जी, वीर जी, बहन जी, चाचा जी, चाची जी, मामा जी, मामी जी, इत्यादि शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए जो कि ज्यादा प्यार व स्नेह के सूचक हैं। इसके अलावा आपस में एक दूसरे को मिलने पर नमस्ते, सत श्री अकाल या फतहि आदि बुलानी चाहिए। जो हमें हाथ जोड़ना ,एक दूसरे के चरण स्पर्श करना तथा सत्कार करना सिखाती है।हाथ मिलाना  हमारे संस्कारों में नहीं आता। वैसे भी एक दूसरे से हाथ मिलाने से शरीर में कीटाणु फैल सकते हैं। 
         शिक्षा की नींव भी हमारे देश में ही सबसे पहले रखी गई। गणित की शिक्षा ,योगा , आयुर्वेद जैसी शिक्षाएं भारत की ही देन है.
       अपनी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व करते हुए हमें स्वदेशी प्रथा अर्थात अपने ही रीति -रिवाजों को अपनाना चाहिए। जैसे यदि हम अपने जन्म दिन मनाते हैं,तो उस अवसर पर हमें एक दूसरे को शुभ कामना हैप्पी बर्थडे तो यू कह कर नहीं," जन्म दिन की बधाई हो" कह कर देनी चाहिए।इसके अलावा हैप्पी बर्थडे टू यू गाने के बजाय गुरबाणी का शबद पुता माता की आसीश पढ़ना चाहिए,जिससे सतगुरु जी की खुशियां तथा कृपा प्राप्त होगी। इसी तरह जो हम केक काटने की परम्परा को अपना चुके हैं उसकी जगह कड़ाह प्रसाद बनाकर प्रसाद के रूप में दिया जा सकता है। यदि हमें काटकर ही कहना है है तो करद या चाकू की जगह किरपान का प्रयोग कर सकते हैं ,जो कम से कम हमारे संस्कारों में तो शामिल है। विशेष बात यह है कि क से केक, क से कड़ाह प्रसाद, क से करद और के से ही किरपान होती है। 
       अतः हमें अपने ही संस्कारों तथा रीति-रिवाजों को ही महत्व देना चाहिए तथा इन सब के प्रति हमारे अंदर स्वाभिमान की भावना होनी चाहिए।            (श्री ठाकुर दलीप सिंह जी के प्रवचनों में से)
द्वारा: प्रिंसिपल राजपाल कौर : 90231-50008,  ईमेल: rajpal16773@gmail.com