Wednesday, 29 July 2026

प्रधानमंत्रीगुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर

प्रधानमंत्री कार्यालय//Azadi Ka Amrit Mahotsav//प्रविष्टि तिथि: 29 July 2026 at 8:20AM by PIB Delhi//गुरु पूर्णिमा

 शिक्षकों की भूमिका को रेखांकित करते हुए एक संस्कृत सुभाषित साझा किया

नई दिल्ली: 29 जुलाई 2026: (PIB Delhi//आराधना टाईम्ज़ डेस्क):: 


कोई ज़माना था जब गुरुकुल प्रथा समाज का नव निर्माण किया करती थी।
उस दौर में उपनयन संस्कार हुआ करता था जिसके अंतर्गत प्राचीन काल में शिक्षा की शुरुआत उपनयन (जनेऊ) संस्कार से होती थी। इस संस्कार के बाद बालक का 'द्विज' (दूसरा जन्म) माना जाता था। इस दुसरे जन्म से ही एक नए इंसान का निर्माण होता था। 

यह सब गुरुकुल पद्धति के तहत होता था। इसके अंतर्गत शिष्य अपने परिवार को छोड़कर गुरु के आश्रम (गुरुकुल) में रहते थे। बालपन से युवा अवस्था के आरंभ तक होता था उन्हें मंज़बून बनाने के सिलसिला।  दिलचस्प बात है की वहाँ राजा और निर्धन के बच्चे एक साथ समान रूप से शिक्षा पाते थे। बड़े छोटे का कोई अंतरनाहीं होता था। 

इसी दौर में मौखिक परंपरा अर्थात श्रुति वाला सिस्टम होता था। सुनना और याद रखना उन दिनोना बहुत आम बात थी। इसकी निपुणता अधिक से अधिक हुआ करती थी। प्राचीन काल में ज्ञान को लिखकर नहीं, बल्कि बोलकर और सुनकर (श्रुति परंपरा द्वारा) पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा जाता था। 

इसके साथ ही मुफ़्त शिक्षा का ही चलन हुआ करता था। शिक्षा का व्यापार नहीं होता था। बड़े बड़े बोर्ड लगा कर शिक्षा का बाजार तब नहीं बना था। गुरु कभी भी शिक्षा की कोई तय फीस नहीं लेते थे। शिक्षा को दुकानों की तरह बेचा नहीं जाता था। यह एक जीवन निर्माण की प्रक्रिया हुआ करती थी। 

शिक्षा पूरी होने पर शिष्य अपनी स्वेच्छा और सामर्थ्य के अनुसार 'गुरु दक्षिणा' देते थे। इसकी कई कहानियां भी प्रचलित हैं। स्कूल की तरह गुरुकुल में शिष्यों की प्रसिद्ध प्राचीन जोड़ियाँ हुआ करती थी। उनकी प्रसिद्धि भी चरम पर थी। इस परंपरा के महान उदाहरणों में भगवान कृष्ण और सांदीपनि मुनि, श्रीराम और महर्षि वशिष्ठ, तथा चंद्रगुप्त मौर्य और आचार्य चाणक्य शामिल हैं।

यह हैं उस दौर की कुछ झलकियां जिनकी एक झलक गुरुपूर्णिमा का ध्यान आते ही मन और ज़हन में आ जाती है। एक बिजली सी कौंध जाती है उस समय की शिक्षा प्रणाली की जो सचमुच महान थी। आज के इस अत्याधुनिक कहे जाने वाले युग में भी गुरुपूर्णिमा बहुत से समुदायों में बहुत श्रद्धा और आस्था से मनाई जाती है। 

इस शुभावसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि गुरु ज्ञान देने के साथ-साथ अपने शिष्यों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और उन्हें सुविचारों एवं सुसंस्कारों से गढ़ते हैं। प्रधानमंत्री ने सभी लोगों से अपने गुरुजनों के आदर्शों को जीवन में मार्गदर्शक बनाने का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए कहा—

“प्रेरकः सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तथा।

शिक्षकः बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥”

इस सुभाषित में यह भाव व्यक्त किया गया है कि जो सही दिशा प्रदान करते हैं, ज्ञान एवं सत्य का बोध कराते हैं, सही मार्ग दिखाते हैं, शिक्षा प्रदान करते हैं तथा जीवन में सत्य की समझ विकसित कर आत्म-विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं, उन्हें ही गुरु के छह रूप माना गया है।

प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा;

“गुरु पूर्णिमा की सभी देशवासियों को बहुत-बहुत बधाई। गुरु ज्ञान के साथ ही अपने शिष्यों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर उन्हें सुविचार और सुसंस्कारों से सुशिक्षित करते हैं। आइए, उनके आदर्शों को अपने जीवन का संबल बनाएं।

प्रेरकः सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तथा।

शिक्षकः बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥”

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