Showing posts with label Osho. Show all posts
Showing posts with label Osho. Show all posts

Tuesday, 16 December 2025

ओशो का जन्मोत्सव श्रद्धा और उल्लास से मनाया गया

 WhatsApp Ashok Bharti Ludhiana Tuesday16th December 2025 at 16:44 Osho  Birthday Event  

ओशो उत्सव और उत्साह का संदेश देते हैं 


लुधियाना
: 16 दिसंबर 2025: (मीडिया लिंक टीम//आराधना टाईम्ज़ डेस्क)::

ओशो उत्सव लुधियाना में भी छाया रहा। ओशो उत्सव लुधियाना द्वारा आचार्य रजनीश ओशो का जन्म दिवस बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया गया। ओशो का ध्यान आते ही अब मन में उत्सव का ही ख्याल आता है। इस मौके पर ओशो प्रेमी बढ़चढ़ कर एकत्र हुए। 

स्वामी मनोज प्रीत ने बताया कि भजन कीर्तन ओशो के प्रवचन और ओम के ध्यान द्वारा सभी श्रद्धालु आनंदित हुए ओशो द्वारा दी गई ध्यान विधियां मानव मन को एकाग्र व शांत करती है क्योंकि आज के अवसाद भरे जीवन में तनाव रहित होने के लिए ध्यान अत्यंत आवश्यक है।  

स्वामी अशोक भारती ने कहा कि ओशो ने हमें जीने का सलीका बताया है ओशो जीवन उदेशना का एक परिपक्व स्तंभ है जिसकी आज हमारे समाज को अति आवश्यकता है। 

इस यादगारी आयोजन में पहुंचे सभी सन्यासी ध्यान बरखा से आनंदित हुए और उन्होंने एक दूसरे का हार्दिक धन्यवाद भी किया।  

कनाडा से पहुंची मां चन्नी ने कहा ध्यान कक्षा हमें आत्मिक सुख प्रदान करती है।  

स्वामी आरिफ ने बताया कि ओशो उत्सव लुधियाना सदैव समाज में प्रेम और ध्यान प्रति अग्रसर कक्षाएं आयोजित करने का प्रयास करती है इस अवसर पर स्वामी सतनाम सिंह, स्वामी मनोज प्रीत, स्वामी अशोक भारती, स्वामी रमेश चौहान, स्वामी गोपाल बत्रा, स्वामी महेश्वरी इत्यादि मित्रों ने उत्सव का आनंद उठाया। 

जन्मदिवस पर हुए आयोजन के बाद ज़िंदगी सभी समस्यायों का सामना हंसी और उत्सव वाले मूड में करते हुए सभी ओशो प्रेमी विदा हुए।  

Thursday, 11 December 2025

नियमित ध्यान से संभव है समस्त रोगों का निवारण:स्वामी आनंद सिद्धार्थ

WhatsApp On  Thursday 11th December 2025 at 10:13 From Ashok Bharti 

ओशो के जन्मदिवस पर हुआ विशेष आयोजन 


लुधियाना: 11 दिसंबर २०२५:  (मीडिया लिंक 32/ /आराधना टाईम्ज़ डेस्क)::

ओशो मेडिटेशन लवर परिवार द्वारा एक दिवसीय ध्यान शिवर आयोजन  बहुत ही धूमधाम के साथ ओशो के विशेष दूत स्वामी  आनंद सिद्धार्थ (डॉक्टर रवींद्र सेठ) की  अध्यक्षता में बहुत ही धूमधाम से महानगर के एक रिजॉर्ट्स में  किया गया। जिसमें पंजाब के दूर-दूर मोहाली,चंडीगढ़ लुधियाना ब राजपुरा इत्यादि से आए  मित्रों ने शिविर का आनंद लिया। स्वामी सिद्धार्थ ने विशेष रूप से ओशो द्वारा रचित ध्यान विधियां वार्डो, ज़िबारिश, नादब्रह्म,लाफ्टर ध्यान,विपासना,गोल्डन फ्लावर नाइट ध्यान इत्यादि विस्तार पूर्वक समझाते हुए बताया कि इन ध्यान वीडियो को करने से हमें क्या-क्या लाभ हो सकता है। 

उन्होंने स्पष्ट किया कि नियमित ध्यान करने से हम सभी प्रकार के रोगों से बच सकते हैं।इस शिविर में स्वामी जगदीश सदाना,स्वामी गुरचरण नारंग,स्वामी मनजीत सिंह,स्वामी अशोक भारती,योग गुरु स्वामी राजिंदर धरवाल,अतुल जैन,स्वामी आकाश वर्मा,स्वामी विजय जिंदल,सतनाम सिंह,मनजीत कौर,संभव जैन,स्वामी मनु समयाल,स्वामी शाम शर्मा,स्वामी प्रदीप इत्यादि ने शिविर का आनंद लिया।

तस्वीरें,  समाचार और अन्य विवरण अशोक भारतीय के सौंजन्य से। 

Wednesday, 30 April 2025

सही खानपान सीख लो तो जान सकते हो खुद में छुपी क्षमताओं को

Science and Spiritualty Desk  posted on 30th April 2025 at 5:45 PM Aradhana Times

जो इशारा फिल्म लूसी करती है उसे ओशो ने बहुत पहले  बताया था 


चंडीगढ़
: 30 अप्रैल 2025: (मीडिया लिंक रविंदर//आराधनात टाईम्स)::

सन 2014 में एक फिल्म आई थी लुसी Lucy जो अब भी गज़ब की फिल्म है। अब उसका दूसरा भाग भी तैयार है लेकिन उसे 2026 में रिलीज़ किया जाएगा। वास्तव में लूसी 2014 की अंग्रेजी भाषा की फ्रेंच साइंस फिक्शन एक्शन फिल्म है। जिसने शरीर और दिमाग के संबंधों पर बहुत दिलचस्प ढंग से रौशनी डाली है। शरीर का शक्ति और दिमाग की शक्तिं के प्रभाव और तीव्रता को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। 

इसे ल्यूक बेसन ने अपनी कंपनी यूरोपाकॉर्प के लिए लिखा और निर्देशित किया है, और उनकी पत्नी वर्जिनी बेसन-सिला ने इसका निर्माण किया है। इसे ताइपे , पेरिस और न्यूयॉर्क शहर में शूट किया गया था। इसमें स्कारलेट जोहानसन , मॉर्गन फ़्रीमैन , चोई मिन-सिक और अमर वेकेड ने अभिनय किया है। जोहानसन ने लूसी का किरदार निभाया है, जो एक ऐसी महिला है जो एक नॉट्रोपिक , साइकेडेलिक दवा के उसके रक्तप्रवाह में अवशोषित होने पर मनोविश्लेषणात्मक क्षमताएँ प्राप्त करती है। इस फिल्म को देखते हुए उन पौराणिक कथाओं की भी याद आती है जिनके मुताबिक मानव के मन, मस्तष्क और शरीर में अनंत शक्तिया छुपी होती हैं। पुराने समय में योगी और साधक अलग अलग तरह की साधनाओं के द्वारा रैप्ट और जागृत करते थे।  

लूसी नाम की यह फिल्म 25 जुलाई 2014 को रिलीज़ हुई और बॉक्स ऑफिस पर इसने बहुत बड़ी सफलता हासिल की। दुनिया भर में तहलका मचा देने वाली इस फिल्म ने मानवीय क्षमताओं पर एक नै चर्चा शुरू की। बहुत सी नै उम्मीदें जगाई। एटम बमों जैसे हथियारों का निर्माण करके तबाही की स्क्रिप्ट लिख रही सरकारों के सामने  उठाया कि मानवीय क्षमता बढ़ाने की तरफ भी तो काम होना चाहिए थे। 

दिलचस्प तथ्य है कि अब भी दुनिया भर में इसकी डिमांड बढ़ती ही जा रही है। इस फिल्म ने दुनिया भर में $469 मिलियन से अधिक की कमाई की, जो $40 मिलियन के बजट से ग्यारह गुना अधिक है। इसे आम तौर पर सकारात्मक, लेकिन साथ ही ध्रुवीकृत, आलोचनात्मक समीक्षा मिली। हालाँकि इसके विषयों, दृश्यों और जोहानसन के प्रदर्शन की प्रशंसा की गई, लेकिन कई आलोचकों ने कथानक को निरर्थक पाया, विशेष रूप से मस्तिष्क के दस प्रतिशत मिथक और परिणामी क्षमताओं पर इसका ध्यान केंद्रित करना बहुत नई किस्म की उपलब्धि है। बहुत से लोगों ने इसके कथानक और कहानी को निरथर्क भी कहा और नकारने की कोशिश भी की। यह फिल्म जिस बात का संदेश देती है उसे बहुत विस्तार और स्पष्ट तरीके से ओशो बहुत पहले ही बता  चुके हैं। 

ओशो ने भोजन और खानपान के लाईफ स्टाईल की चर्चा के ज़रिए इस बात को पूरे तथ्यात्मक ढंग से सामने रखा है कि अगर जिस्म में गए भोजन को पचाने की ऊर्जा को  बचाया जा सके तो सारी ऊर्जा मस्तिष्क को उपलब्ध हो जाती है। इसके बाद शुरू होता है अलौकिक किस्म की शक्तियों  चमत्कारों  के महसूस होने का सिलसिला। 

सोशल मीडिया पर भोजन का एक नशा है  पोस्ट सामने आई है। इसे पोस्ट किया है 29 अप्रैल 2025 की रात को 8:14 बजे लगातार जाग्रति लाने सक्रिय एक जागरूक कंट्रीब्यूटर संजीव मिश्रा ने। 

ओशो बहुत ही रहस्य खोलते हुए बताते हैं: अगर तुम जरूरत से ज्यादा भोजन कर लो, तो भोजन अल्कोहलिक है। वह मादक हो जाता है, उसमें शराब पैदा हो जाती है। उसमें शराब पैदा होने का कारण है ,जैसे ही तुम ज्यादा भोजन कर लेते हो, तुम्हारे पूरे शरीर की शक्ति निचुड़कर पेट में आ जाती है.. क्योंकि भोजन को पचाना जरूरी है। तुमने शरीर के लिए एक उपद्रव खड़ा कर दिया, एक अस्वाभाविक स्थिति पैदा कर दी। तुमने शरीर में विजातीय तत्व डाल दिए। अब शरीर की सारी शक्ति इसको किसी तरह पचाकर और बाहर फेंकने में लगेगी। तो तुम कुछ और न कर पाओगे; सिर्फ सो सकते हो। मस्तिष्क तभी काम करता है, जब पेट हलका हो। इसलिए भोजन के बाद तुम्हें नींद मालूम पड़ती है। और अगर कभी तुम्हें मस्तिष्क का कोई गहरा काम करना हो, तो तुम्हें भूख भूल जाती है।

इसलिए जिन लोगों ने मस्तिष्क के गहरे काम किए हैं, वे लोग हमेशा अल्पभोजी लोग रहे हैं। और धीरे— धीरे उन्हीं अल्पभोजियों को यह पता चला कि अगर मस्तिष्क बिना भोजन के इतना सक्रिय हो जाता है, तेजस्वी हो जाता है, तो शायद उपवास में तो और भी बड़ी घटना घट जाएगी। इसलिए उन्होंने उपवास के भी प्रयोग किए। और उन्होंने पाया कि उपवास की एक ऐसी घड़ी आती है, जब शरीर के पास पचाने को कुछ भी नहीं बचता, तो सारी ऊर्जा मस्तिष्क को उपलब्ध हो जाती है। उस ऊर्जा के द्वारा ध्यान में प्रवेश आसान हो जाता है।*

जैसे भोजन अतिशय हो, तो नींद में प्रवेश आसान हो जाता है। नींद ध्यान की दुश्मन है; मूर्च्छा है। भोजन बिलकुल न हो शरीर में, तो शरीर को पचाने को कुछ न बचने से सारी ऊर्जा मुक्त हो जाती है पेट से, सिर को उपलब्ध हो जाती है- ध्यान के लिए उपयोगी हो जाती है।

लेकिन उपवास की सीमा है, दो—चार दिन का उपवास सहयोगी हो सकता है। लेकिन कोई व्यक्ति अतिशय उपवास  में पड़ जाए तो फिर मस्तिष्क को ऊर्जा नहीं मिलती। क्योंकि ऊर्जा बचती ही नहीं।

इसलिए उपवास किसी ऐसे व्यक्ति के पास ही करने चाहिए जिसे उपवास की पूरी कला मालूम हो। क्योंकि उपवास पूरा शास्त्र है। कोई भी, कैसे भी उपवास कर ले तो नुकसान में पड़ेगा।

और प्रत्येक व्यक्ति के लिए गुरु ठीक से खोजेगा कि कितने दिन के उपवास में संतुलन होगा। किसी व्यक्ति को हो सकता है पंद्रह दिन या किसी को इक्कीस दिन का उपवास उपयोगी हो। 

अगर शरीर ने बहुत चर्बी इकट्ठी कर ली है, तो इक्कीस दिन के उपवास में भी उस व्यक्ति के मस्तिष्क को ऊर्जा का प्रवाह मिलता रहेगा। रोज—रोज बढ़ता जाएगा।

जैसे—जैसे चर्बी कम होगी शरीर पर, वैसे—वैसे शरीर हलका होगा, तेजस्वी होगा, ऊर्जावान होगा। क्योंकि बढ़ी हुई चर्बी भी शरीर के ऊपर बोझ है और मूर्च्छा लाती है।

लेकिन अगर कोई दुबला—पतला व्यक्ति इक्कीस दिन का उपवास कर ले, तो ऊर्जा क्षीण हो जाएगी। उसके पास रिजर्वायर था ही नहीं; उसके पास संरक्षित कुछ था ही नहीं। उनकी जेब खाली थी। दुबला—पतला आदमी बहुत से बहुत तीन—चार दिन के उपवास से फायदा ले सकता है।

बहुत चर्बी वाला आदमी इक्कीस दिन, बयालीस दिन के उपवास से भी फायदा ले सकता है। और अगर अतिशय चर्बी हो, तो तीन महीने का उपवास भी फायदे का हो सकता है, बहुत फायदे का हो सकता है। लेकिन उपवास के शास्त्र को समझना जरूरी है।

तुम तो अभी ठीक विपरीत जीते हो, दूसरे छोर पर, जहां खूब भोजन कर लिया, सो गए। जैसे जिंदगी सोने के लिए है। तो मरने में क्या बुराई है! मरने का मतलब, सदा के लिए सो गए।

तो तामसी व्यक्ति जीता नहीं है, बस मरता है। तामसी व्यक्ति जीने के नाम पर सिर्फ घिसटता है। जैसे सारा काम इतना है कि किसी तरह खा—पीकर सो गए। वह दिन को रात बनाने में लगा है; जीवन को मौत बनाने में लगा है। और उसको एक ही सुख मालूम पड़ता है कि कुछ न करना पड़े। कुल सुख इतना है कि जीने से बच जाए जीना न पड़े। जीने में अड़चन मालूम पड़ती है। जीने में उपद्रव मालूम पड़ता है। वह तो अपना चादर ओढ़कर सो जाना चाहता है।

ऐसा व्यक्ति अतिशय भोजन करेगा। अतिशय भोजन का अर्थ है, वह पेट को इतना भर लेगा कि मस्तिष्क को ध्यान की तो बात दूर, विचार करने तक के लिए ऊर्जा नहीं मिलती। और धीरे— धीरे उसका मस्तिष्क छोटा होता जाएगा; सिकुड़ जाएगा। उसका तंतु—जाल मस्तिष्क का निम्न तल का हो जाएगा.......

ओशो; *गीता दर्शन, भाग - 8, अध्‍याय—17

Friday, 25 September 2020

मौत घटित होने से पहले सम्भव है मौत की तस्वीर खींचना

रूसी वैज्ञानिक किरलियान ने विकसित की 'हाई फ्रिकेंसी फोटोग्राफी'

एक दूसरे रूसी वैज्ञानिक किरलियान ने 'हाई फ्रिकेंसी फोटोग्राफी' विकसित की है। वह शायद आने वाले भविष्य में सबसे अनूठा प्रयोग सिद्ध होगा। अगर मेरे हाथ का चित्र लिया जाए, 'हाईफ्रिकेंसी फोटोग्राफी' से, जो कि बहुत संवेदनशील प्लेट्स पर होती है, तो मेरे हाथ का चित्र सिर्फ नहीं आता, मेरे हाथ के आसपास जो किरणें मेरे हाथ से निकल रही हैं, उनका चित्र भी आता है। और आश्रर्य की बात तो यह है कि अगर मैं निषेधात्मक विचारों से भरा हुआ हूं तो मेरे हाथ के आसपास जो विद्युत—पैटर्न, जो विद्युत के जाल का चित्र आता है, वह रुग्ण, बीमार, अस्वस्थ और 'केआटिक', अराजक होता है — विक्षिप्त होता है। जैसे किसी पागल आदमी ने लकीरें खींची हों। अगर मैं शुभ भावनाओं से, मंगल—भावनाओं से भरा हुआ हूं आनंदित हूं 'पाजिटिव'हूं प्रफुल्लित हूं प्रभु के प्रति अनुग्रह से भरा हुआ हूं तो मेरे हाथ के आसपास जो किरणों का चित्र आता है, किरलियान की फोटोग्राफी से,वह 'रिद्मिमक', लयबब्द, सुन्दरल, 'सिमिट्रिकल ', सानुपातिक, और एक और ही व्यवस्था में निर्मित होता है।

किरलियान का कहना है — और किरलियान का प्रयोग तीस वर्षों की मेहनत है — किरलियान का कहना है कि बीमारी के आने के छह महीने पहले शीघ्र ही हम बताने में समर्थ हो जायेंगे कि यह आदमी बीमार होनेवाला है। क्योंकि इसके पहले कि शरीर पर बीमारी उतरे, वह जो विद्युत का वर्तुल है उस पर बीमारी उतर जाती है। मरने के पहले,इसके पहले कि आदमी मरे, वह विद्युत का वर्तुल सिकुड़ना शुरू हो जाता है और मरना शुरू हो जाता है। इसके पहले कि कोई आदमी हत्या करे किसी की, उस विद्युत के वर्तुल में हत्या के लक्षण शुरू हो जाते हैं। इसके पहले कि कोई आदमी किसी के प्रति करुणा से भरे, उस विद्युत के वर्तुल में करुणा प्रवाहित होने के लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं।

किरलियान का कहना है कि केंसर पर हम तभी विजय पा सकेंगे जब शरीर को पकड़ने के पहले हम केंसर को पकड़ लें। और यह पकड़ा जा सकेगा। इसमें कोई विधि की भूल अब नहीं रह गयी है। सिर्फ प्रयोगों के और फैलाव की जरूरत है। प्रत्येक मनुष्य अपने आसपास एक आभामंडल लेकर, एक अति लेकर चलता है। आप अकेले ही नहीं चलते, आपके आसपास एक विद्युत—वर्तुल, एक 'इलेक्ट्रो—डायनेमिक—फील्ड ' प्रत्येक व्यक्ति के आसपास चलता है। व्य क्ति के आसपास ही नहीं, पशुओं के आसपास भी, पौधों के आसपास भी। असल में रूसी वैज्ञानिकों का कहना है कि जीव और अजीव में एक ही फर्क किया जा सकता है, जिसके ' आसपास आभामंडल है वह जीवित है और जिसके पास आभामंडल नहीं है, वह मृत है।

जब आदमी मरता है तो मरने के साथ ही आभामंडल क्षीण होना शुरू हो जाता है। बहुत चकित करनेवाली और संयोग की बात है कि जब कोई आदमी मरता है तो तीन दिन लगते हैं उसके आभामंडल के विसर्जित होने में। हजारों साल से सारी दुनिया में मरने के बाद तीसरे दिन का बड़ा मूल्य रहा है। जिन लोगों ने उस तीसरे दिन को — तीसरे को इतना मूल्य दिया था, उन्हें किसी न किसी तरह इस बात का अनुभव होना ही चाहिए, क्योंकि वास्तविक मृत्यु तीसरे दिन घटित होती है। इन तीन दिनों के बीच, किसी भी दिन वैज्ञानिक उपाय खोज लेंगे, तो आदमी को पुनरुज्जीवित किया जा सकता है। जब तक आभामंडल नहीं खो गया, तब तक जीवन अभी शेष है। हृदय की धड़कन बन्द हो जाने से जीवन समाप्त नहीं होता। इसलिए पिछले महायुद्ध में रूस में छह व्यक्तियों को हृदय की धड़कन बंद हो जाने के बाद पुनरुज्जीवित किया जा सका। जब तक आभामंडल चारों तरफ है, तब तक व्यक्ति सूक्ष्म तल पर अभी भी जीवन में वापस लौट सकता है। अभी सेतु कायम है। अभी रास्ता बना है वापस लौटने का।

जो व्यक्ति जितना जीवंत होता है, उसके आसपास उतना बड़ा आभामंडल होता है। हम महावीर की मूर्ति के आसपास एक आभामंडल निर्मित करते हैं — या कृष्ण, या राम, क्राइस्ट के आसपास — तो वह सिर्फ कल्पना नहीं है। वह आभामंडल देखा जा सकता है। और अब तक तो केवल वे ही देख सकते थे जिनके पास थोड़ी गहरी और सूक्ष्म—दृष्टि हो — मिस्टिक्स, संत, लेकिन 193० में एक अंग्रेज वैज्ञानिक ने अब तो केमिकल, रासायनिक प्रक्रिया निर्मित कर दी है जिससे प्रत्येक व्यक्ति — कोई भी — उस माध्यम से, उस यंत्र के माध्यम से दूसरे के आभामंडल को देख सकता है।

आप सब यहां बैठे है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी आभामंडल है। जैसे आपके अंगूठे की छाप निजी—निजी है वैसे ही आपका आभामंडल भी निजी है। और आपका आभामंडल आपके संबंध में वह सब कुछ कहता है जो आप भी नहीं जानते। आपका आभामंडल आपके संबंध में बातें भी कहता है जो भविष्य में घटित होंगी। आपका आभामंडल वे बातें भी कहता है जो अभी आपके गहन अचेतन में निर्मित हो रही हैं, बीज की भांति, कल खिलेगी और प्रगट होंगी।

मंत्र आभामंडल को बदलने की आमूल प्रक्रिया है। आपके आसपास की स्पेस, और आपके आसपास का 'इलेक्ट्रो—डायनेमिक—फील्ड ' बदलने की प्रक्रिया है। और प्रत्येक धर्म के पास एक महामंत्र है। जैन परम्परा के पास नमोकार है — आश्रर्यकारक घोषणा — एसो पंचनमुकारो, सब्बपावप्पणासणो। सब पाप का नाश कर दे, ऐसा महामंत्र हैनमोकार। ठीक नहीं लगता। नमोकार से कैसे पाप नष्ट हो जाएगा?नमोकार से सीधा पाप नष्ट नहीं होता, लेकिन नमोकार से आपके आसपास 'इलेक्ट्रो— डायनेमिक—फील्ड ' रूपांतरित होता है और पाप करना असंभव हो जाता है। क्योंकि पाप करने के लिए आपके पास एक खास तरह का आभामंडल चाहिए। अगर इस मंत्र को सीधा ही सुनेंगे तो लगेगा कैसे हो सकता है? एक चोर यह मंत्र पढ लेगा तो क्या होगा? एक हत्यारा यह मंत्र पढ लेगा तो क्या होगा? कैसे पाप नष्ट हो जाएगा? पाप नष्ट होता है इसलिए, कि जब आप पाप करते हैं, उसके पहले आपके पास एक विशेष तरह का, पाप का आभामंडल चाहिए — उसके बिना आप पाप नहीं कर सकते — वह आभामंडल अगर रूपांतरित हो जाए तो असंभव हो जाएगी बात, पाप करना असंभव हो जाएगा।

यह नमोकार कैसे उस आभामंडल को बदलता होगा? यह नमस्कार है, यह नमन का भाव है। नमन का अर्थ है समर्पण। यह शाब्दिक नहीं है। यह नमो अरिहंताणं, यह अरिहंतों को नमस्कार करता हूं यह शाब्दिक नहीं है, ये शब्द नहीं हैं, यह भाव है। अगर प्राणों में यह भाव सघन हो जाए कि अरिहंतों को नमस्कार करता हूं तो इसका अर्थ क्या होता है? इसका अर्थ होता है, जो जानते हैं उनके चरणों में सिर रखता हूं। जो पहुंच गए हैं, उनके चरणों में समर्पित करता हूं। जो पा गए हैं, उनके द्वार पर मैं भिखारी बनकर खड़ा होने को तैयार हूं।

किरलियान की फोटोग्राफी ने यह भी बताने की कोशिश की है कि आपके भीतर जब भाव बदलते हैं तो आपके आसपास का विद्युत—मंडल बदलता है। और अब तो ये फोटोग्राफ उपलब्ध हैं। अगर आप अपने भीतर विचार कर रहे हैं चोरी करने का, तो आपका आभामंडल और तरह का हो जाता है — उदास, रुग्ण, खूनी रंगों से भर जाता है। आप किसी को, गिर गये को उठाने जा रहे हैं — आपके आभामंडल के रंग तत्काल बदल जाते हैं।
                                   --ओशो

Friday, 21 August 2020

नास्तिक कौन? बता रहे हैं ओशो

 लेकिन नास्तिक के पीछे एक ग्रंथि है.... 
नास्तिक मेरे लिए वही आदमी है, जिसको कोई बहुत गहन पीड़ा का अनुभव किसी जन्म में हो गया। 
यह तस्वीर नास्तिक भारत से साभार ली गई है 
वह पीड़ा इतनी भयंकर थी कि वह दोबारा उसको पुनरुक्त नहीं करना चाहता। वह अपने को समझाता है, परमात्मा है ही नहीं। वह अपने को तर्क देता है। वह अपने चारों तरफ तर्क का एक जाल निर्मित करता है। वह अपने ही खिलाफ षड्यंत्र रचता है। वह किसी दूसरे का धर्म बिगाड़ने को नहीं है, न तुमसे उसे कुछ मतलब है।
अन्यथा तुम सोचो, ऐसे नास्तिक हैं जो जीवनभर, ईश्वर नहीं है, यह सिद्ध करने में समय व्यतीत करते हैं। है ही नहीं जो, उसके लिए तुम अपना जीवन क्यों खराब कर रहे हो? तुम कुछ और कर लो। ईश्वर तो है ही नहीं, बात खत्म हो गई। लेकिन जीवनभर व्यतीत करते हैं!
मेरी अपनी प्रतीति यह है कि कभी—कभी भक्तों को भी वे मात कर देते हैं। भक्त भी इतनी संलग्नता से जीवन व्यतीत नहीं करता परमात्मा के लिए, जितना नास्तिक करते हैं। लिखते हैं, सोचते हैं, तर्क जुटाते हैं, समझाते हैं, शास्त्र लिखते हैं बड़े—बड़े कि ईश्वर नहीं है।
इस सब के पीछे कुछ मनोविज्ञान होना चाहिए। जो है ही नहीं, उसकी कौन फिक्र करता है? कोई तो सिद्ध नहीं करता कि आकाश—कुसुम नहीं होते। कोई तो सिद्ध नहीं करता कि गधे को सींग नहीं होते। इसको क्या सिद्ध करना है! और जो सिद्ध करे, वह गधा। क्योंकि इसको क्या प्रयोजन है? गधे को सींग नहीं होते, यह जाहिर बात है, खत्म हो गई। इसको कोई भी सिद्ध करने की जरूरत नहीं है।
लेकिन ईश्वर नहीं है, अगर ईश्वर भी ऐसा है जैसे कि गधे के सींग नहीं हैं, तो क्या पागलपन कर रहे हो! किसको सिद्ध कर रहे हो? किसके लिए लड़ रहे हो? क्या प्रयोजन है? सिद्ध भी कर लोगे, तो क्या सार है? जो था ही नहीं, उसको तुमने सिद्ध कर लिया कि वह नहीं है, क्या पाया? कहीं और जीवन ऊर्जा को लगाते, कहीं और खोजते।
लेकिन नास्तिक के पीछे एक ग्रंथि है। वह ग्रंथि यह है कि अगर वह सिद्ध न करे कि ईश्वर नहीं है, तो डर है कि कहीं फिर कदम उसी तरफ न उठने लगें। यह बड़ी अचेतन प्रक्रिया है। यह उसके अनकांशस में है। उसे भी पता नहीं है। --संजीव वर्मा 
गीता दर्शन, प्रवचन -179, ओशो

Sunday, 28 June 2020

रूस के लोग अंधविश्वासी नास्तिक हैं-ओशो

 हिंदुस्तान के लोग अंधविश्वासी आस्तिक हैं-ओशो 
सोशल मीडिया//Whats App//28 जून 2020:(आराधना टाईम्ज़ रिसर्च डेस्क)::
ईश्वर को मानने वाला भी अंधविश्वासी हो सकता है, ईश्वर को न मानने वाला भी उतना ही अंधविश्वासी, उतना ही सुपरस्टीशस हो सकता है। अंधविश्वास की परिभाषा समझ लेनी चाहिए। अंधविश्वास का मतलब है, बिना जाने अंधे की तरह जिसने मान लिया हो। रूस के लोग अंधविश्वासी नास्तिक हैं, हिंदुस्तान के लोग अंधविश्वासी आस्तिक हैं। दोनों अंधविश्वासी हैं। न तो रूस के लोगों ने पता लगा लिया है कि ईश्वर नहीं है और तब माना हो, और न हमने पता लगा लिया है कि ईश्वर है और तब माना हो। तो अंधविश्वास सिर्फ आस्तिक का होता है, इस भूल में मत पड़ना। नास्तिक के भी अंधविश्वास होते हैं। बड़ा मजा तो यह है कि साइंटिफिक सुपरस्टीशन जैसी चीज भी होती है, वैज्ञानिक अंधविश्वास जैसी चीज भी होती है। जो कि बड़ा उलटा मालूम पड़ता है कि वैज्ञानिक अंधविश्वास कैसे होगा! वैज्ञानिक अंधविश्वास भी होता है।

अगर आपने युक्लिड की ज्यामेट्री के बाबत कुछ पढ़ा है, तो आप पढ़ेंगे, बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं ज्यामेट्री तो युक्लिड कहता है रेखा उस चीज का नाम है जिसमें लंबाई हो, चौड़ाई नहीं। इससे ज्यादा अंधविश्वास की क्या बात हो सकती है? ऐसी कोई रेखा ही नहीं होती, जिसमें चौड़ाई न हो। बच्चे पढ़ते हैं कि बिंदु उसको कहते हैं जिसमें लंबाई चौड़ाई दोनों न हों। और बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी इसको मानकर चलता है कि बिंदु उसे कहते हैं जिसमें लंबाई  चौड़ाई न हो। जिसमें लंबाई चौड़ाई न हो, वह बिंदु हो सकता है?

हम सब जानते हैं कि एक से नौ तक की गिनती होती है, नौ डिजिट होते हैं, नौ अंक होते’ हैं गणित के। कोई पूछे कि यह अंधविश्वास से ज्यादा है? नौ ही क्यों? कोई वैज्ञानिक दुनिया में नहीं बता सकता कि नौ ही क्यों? सात क्यों नहीं? सात से क्या काम में अड़चन आती है? तीन क्यों नहीं? ऐसे गणितज्ञ हुए हैं। लिबनीत्स एक गणितज्ञ हुआ है जिसने तीन से ही काम चला लिया। है।, उसका ऐसा है कि एक, दो, तीन, फिर आता है दस, ग्‍यारह, बारह, तेरह, फिर आता है बीस, इक्कीस, बाईस, तेईस। बस, ऐसी उसकी संख्या चलती है। काम चल जाता है, कौन सी अड़चन होती है! वह भी गिनती कर लेगा यहां बैठे लोगों की। और वह कहता है कि मेरी गिनती गलत, तुम्हारी सही, कैसे तुम कहते हो २: हम तीन से ही काम चला लेते हैं। वह कहता है, नौ की जरूरत क्या है? नौ कौन कहता है? आइंस्टीन ने बाद में कहा कि तीन भी फिजूल है, दो ही से काम चल जाता है। सिर्फ एक से नहीं चल सकता, बहुत मुश्किल होगी। दो से भी चल सकता है। नाइन डिजिट, नौ आकड़े होने चाहिए गणित में, यह एक वैज्ञानिक अंधविश्वास है। लेकिन गणितज्ञ भी पकडे हुए बैठा है कि इतने ही हो सकते हैं आकड़े। उससे कहो कि सात से काम चलेगा, तो वह भी मुश्किल में पड़ जाएगा। यह भी मान्यता है, इसमें कुछ और ज्यादा मतलब नहीं है।

हजारों चीजें वैज्ञानिक रूप से हम मानते हैं कि ठीक हैं, वे अंधविश्वास ही होती हैं। तो वैज्ञानिक अंधविश्वास भी होते हैं। इस युग में तो धार्मिक अंधविश्वास क्षीण होते जा रहे हैं, वैज्ञानिक अंधविश्वास मजबूत होते चले जा रहे हैं। फर्क इतना होता है कि अगर धार्मिक आदमी से पूछो कि भगवान का तुम्हें कैसे पता चला? तो वह कहेगा कि गीता में लिखा है। और अगर उससे यह पूछो कि तुम यह कह रहे हो कि गणित में नौ आकड़े होते हैं, यह तुम्हें कैसे पता चला है? तो वह कहेगा कि फलां गणितज्ञ की किताब में लिखा हुआ है। फर्क क्या हुआ इन दोनों में? एक गीता बता देता है, एक कुरान बता देता है, एक गणित की किताब बता देता है। फर्क क्या है?

मैं अंधविश्वास के एकदम विरोध में हूं। सब तरह के अंधविश्वास टूटने चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं तोड्ने के लिए अंधविश्वासी हूं कि किसी भी चीज को तोडना चाहिए तो फिर बिना फिकिर उसको तोड्ने में लग जाने की जरूरत है। वह ठीक है या गलत, इसकी फिक्र छोड़ो, तोड़ो पहले, तोडना जरूरी है। फिर यह तोडना भी एक अंधविश्वास हो जाएगा।

इसका मतलब यह हुआ कि हमें समझ लेना चाहिए कि अंधविश्वास, सुपरस्टीशन का मतलब क्या है।

 सुपरस्टीशन का मतलब है कि जिसे हम बिना जाने मान लेते हैं। और हम बहुत सी चीजें मान लेते हैं। और बहुत सी चीजें बिना जाने इनकार कर देते हैं, यह भी अंधविश्वास है।

ओशो
मैं मृत्यु सिखाता हूँ

Monday, 30 July 2018

Ludhiana:नवनिर्मित ओशो मेडिटेशन सेंटर में ध्यान शिविर संपन्न

अमेरिका से आई माँ किम लॉरियल ने करवाई ध्यान विधियां
लुधियाना: 29 जुलाई 2018: (आराधना टाईम्ज़ टीम )::
पंजाब के हालात फिर नाज़ुक हैं। इस बार नशे की ओवर डोज़ आये दिन किसी न किसी घर में मातम ला रही है। पंजाब का शायद ही कोई गाँव बचा हो जहां नशे के आतंक ने मौत की दस्तक न दी हो। पंजाब की युवा पीढ़ी फिर मौत के मुँह में जा रही है। सियासी और समाजिक लोग इस मुद्दे पर कैंडल मार्च जैसे आयोजन करके अखबारी सुर्खियां बटोरने में लगे हैं। इस समस्या के हल की बात चलती है तो पता लगता है कि अफीम और भुक्की के ठेके खोल कर समस्या हल हो जाएगी। यानि एक नशा छुड़वा कर दूसरा नशा लगा दिया जायेगा। युवा वर्ग होश में आये यह बात शायद कोई नहीं चाहता। 
ऐसे माहौल में एक बार फिर पंजाब में जगा है ओशो का जादू। युवा वर्ग को नशे और जुर्म की दुनिया से दूर केवल मस्ती की दुनिया--एक ऐसी मस्ती जिसमें पूर्ण होश भी है। एक ऐसी मनोअवस्था जो ज़िंदगी और समाज की हर चुनौती का सामना करने में सक्षम बनने की क्षमता देती है। 
कैम्प में शामिल लोगों को एक नज़र देखा तो महसूस हुआ वे लोग बदल चुके थे। उनके चेहरों पर एक ऊर्जा की चमक थी। पूछने पर पता चला यह ऊर्जा और चमक उन्हें इसी कैम्प से मिली।  यह ध्यान शिविर तीन दिनों तक चला।  सादा सा सात्विक भोजन और संगीत की लहरियों में तन और मन को तनावमुक्त करती हुई साधना पद्धतियां।
यहां पुरुष भी थे-महिलाएं भी---पर किसी भी चेहरे पर वासना की कोई झलक तक न थी। सभी एक दिव्य रंग में रंगे हुए थे।फिर भी हमारी टीम का मन आशंकित था भला ऐसे कैसे हो सकता है। इतने में एक साधक ने किसी युवा और खूबसूरत साधिका को आवाज़ दी-मां ! ज़रा इधर आना। मीडिया वाले आये हैं।
बस यह मां शब्द सुनते ही हमारी सारी शंकाये दूर हो गयी। वास्तव में ओशो ने महिला को मां का दर्जा दे कर एक दैवी सम्मान दिया था। ओशो के पैरोकार अंध विश्वासी नहीं होते। उन्हें विश्वास नहीं शक करना सिखाया जाता है। यही शक उनको मार्ग दिखता है। हर रोज़ नए अनुभव कराता है।
ओशो लुधियाना मेडिटेशन सोसाइटी द्वारा गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में पहला तीन दिवसीय ओशो ध्यान शिविर करवाया गया। हंबड़ा रोड स्थित नवनिर्मित ओशो लुधियाना मेडिटेशन सेंटर में आयोजित इस ध्यान शिविर में अमेरिका से ओशो की विशेष दूत मा किम लॉरियल में ध्यान विधियों द्वारा सैंकड़ो मित्रों का मार्गदर्शन किया। विभिन ध्यान विधिया करवाते हुए किम लॉरियल ने सभी को ध्यान के द्वारा तनाव मुक्त जीवन जीने की कला से अवगत करवाया। साथ ही जीवन की सही राह के बारे में ओशो द्वारा रचित तंत्रा ध्यान विधियों को विस्तार पूर्वक समझाया गया। इस दौरान उत्तराखंड ऋषिकेश से पधारे संगीतज्ञ वायोलीन वादक शिवानंद शर्मा, बासुरी वादक  शिवरात्रि गिरि बाबाजी, तबला वादक सोमनाथ निर्मल ने संगीत यंत्रो के माध्यम से ध्यान विधिया करवाई। शिविर में 25 के करीब मित्रों ने सद्गुरु ओशो के नाम की दीक्षा ली। शिविर प्रबंधक स्वामी सुमित ने बताया मित्रों के उत्साह को देखते हुए अगले महीने इसी सेंटर में एक और ध्यान शिविर लगाया जाएगा, जिसकी तिथि की सूचना जल्द ही सभी को पहुंचा दी जाएगी। इस कैम्प को सफल बनाने में स्वामी सुमित, स्वामी रंजीत, स्वामी कुनाल धवन , स्वामी रिंकू , स्वामी अशोक भारती, स्वामी हितेश गुप्ता, स्वामी अमरजीत, स्वामी अजय, स्वामी रमन, स्वामी अतुल सहित सैंकड़ो मित्रों ने सहयोग दिया। (रेक्टर कथूरिया//एम एस भाटिया//सहयोग: अशोक भारती)

Friday, 15 July 2016

वह आदमी अकेला था और डर गया और भागने लगा//Osho

Priti Bhardwaj ने मंगलवार 14 जुलाई 2016 को पोस्ट किया 
!! छाया !!
मैंने सुना है कि एक गांव में एक बार 
एक आदमी को एक बड़ा पागलपन सवार हो गया। 
वह एक रास्ते से गुजर रहा था। 
भरी दोपहरी थी, अकेला रास्ता था, निर्जन था। 
तेजी से चल रहा था कि निर्जन में कोई डर न हो जाए।
हालाकि डर वहां हो भी सकता है,
जहां कोई और हो, जहां कोई भी नहीं है,
वहां डर का क्या उपाय हो सकता है!
लेकिन हम वहां बहुत डरते हैं,
जहां कोई भी नहीं होता है।
असल में हम अपने से ही डरते हैं।
और जब हम अकेले रह जाते हैं,
तो बहुत डर लगने लगता है।
हम अपने से जितना डरते हैं,
उतना किसी से भी नहीं डरते।
इसलिए कोई साथ हों
—कोई भी साथ हो
—तो भी डर कम लगता है।
और बिलकुल अकेले रह जाएं,
तो बहुत डर लगने लगता है।
वह आदमी अकेला था और
डर गया और भागने लगा।
और सन्नाटा था, सुनसान था,
दोपहर थी, कोई भी न था।
जब वह तेजी से भागा,
तो उसे अपने ही पैरों की आवाज पीछे
से आती हुई मालूम पड़ी।
और वह डरा कि शायद कोई पीछे है।
फिर उसने डरे हुए,
चोरी की आख से पीछे झांककर देखा,
तो एक लंबी छाया उसका पीछा कर रही थी।
वह उसकी अपनी ही छाया थी।
लेकिन यह देखकर कि
कोई लंबी छाया पीछे पड़ी हुई है,
वह और भी तेजी से भागा।
फिर वह आदमी कभी रुक नहीं
सका मरने के पहले।
क्योंकि वह जितनी तेजी से भागा,
छाया उतनी ही तेजी से उसके पीछे भागी।
फिर वह आदमी पागल हो गया।
लेकिन पागलों को पूजनेवाले भी मिल जाते हैं।
जब वह गांव से भागता हुआ निकलता और
लोग देखते कि वह भागा जा रहा है,
तो लोग समझते कि वह बड़ी तपश्चर्या में रत है।
वह कभी रुकता नहीं था।
वह सिर्फ रात के अंधेरे में रुकता था,
जब छाया खो जाती थी।
तब वह सोचता था कि अब कोई पीछे नहीं है।
सुबह हुई और वह भागना शुरू कर देता था।
फिर तो बाद में उसने रात में भी रुकना बंद कर दिया।
उसे ऐसा समझ में आया कि
जब तक मैं विश्राम करता हूं?
मालूम होता है,
जितना दूर भागकर दिन भर में
मैं दूर निकलता हूं,
उतनी देर में छाया फिर वापस आ जाती है,
सुबह फिर मेरे पीछे हो जाती है।
तब उसने रात में भी रुकना बंद कर दिया।
फिर वह पूरा पागल हो गया।
फिर वह खाता भी नहीं, पीता भी नहीं।
भागते हुए लाखों की भीड़ उसको देखती,
फूल फेंकती।
कोई राह चलते उसके हाथ में रोटी पकड़ा देता,
कोई पानी पकड़ा देता।
उसकी पूजा बढ़ती चली गई।
लाखों लोग उसका आदर करने लगे।
लेकिन वह आदमी पागल होता चला गया।
और अंततः वह आदमी एक दिन गिरा और मर गया।
गांव के लोगों ने, जिस गांव में वह मरा था,
उसकी कब्र बना दी एक वृक्ष के नीचे छाया में।
और उस गांव के एक बूढ़े फकीर से उन्होंने पूछा कि
हम इसकी कब्र पर क्या लिखें?
तो उस फकीर ने एक लाइन उसकी कब पर लिख दी।
किसी गांव में, किसी जगह, वह कब्र अब भी है।
हो सकता है, कभी आपका उस जगह से निकलना हो,
तो पढ़ लेना।
उस कब्र पर उस फकीर ने लिख दिया है कि
यहां एक ऐसा आदमी सोता है,
जो जिंदगी भर अपनी छाया से भागता रहा है,
जिसने जिंदगी छाया से भागने में गंवा दी।
और उस आदमी को इतना भी पता नहीं था,
जितना उसकी कब को पता है।
क्यौंकि कब्र छाया में है और भागती नहीं,
इसलिए कब्र की कोई छाया ही नहीं बनती है।
इसके भीतर जो सोया है
उसे इतना भी पता नहीं था,
जितना उसकी कब को पता है।
हम भी भागते हैं। 
हमें आश्चर्य होगा कि
कोई आदमी छाया से भागता था।
हम सब भी छायाओं से ही भागते रहते हैं। 
और जिससे हम भागते हैं, 
वही हमारे पीछे पड़ जाता है।
और जितनी तेजी से हम भागते हैं, 
उसकी दौड़ भी उतनी ही तेज हो जाती है, 
क्योंकि वह हमारी ही छाया है।
मृत्यु हमारी ही छाया है। 
और अगर हम उससे भागते रहे तो हम 
उसके सामने कभी खड़े होकर 
पहचान न पाएंगे कि वह क्या है। 
काश, वह आदमी रुक जाता और 
पीछे लौटकर देख लेता, 
तो शायद अपने पर हंसता और कहता,
कैसा पागल हूं, छाया से भागता हूं।
-मैं-मृत्‍यु-सिखाता-हूं

(प्रीति सभरवाल के प्रोफाईल से साभार)