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Tuesday, 5 October 2021

उन्होंने मेरे जीवन को कीर्तन से भर दिया--चरणजीत सिंह हीरा

Sunday 3rd October 2021 10:17 PM

स्मृतियों के झरोखों से झांकते हुए जोधपुरी जी के अंर्तमन की झलक

सोशल मीडिया: 5 अक्टूबर 2021 (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::


जिन दिनों कॉलर टयून, हैलो टयून, रिंग टोन जैसे रिवाज नए नए चले थे उन दिनों गीतों का बोलबाला था। फिर धीरे धीरे भजन भी आए। गुरुबाणी शब्दों सेट हुआ था भाई सुरिंदर सिंह जोधपुरी जी के शब्दों से। सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हुआ था उनका गया शब्द "हरि जीउ निमाणिआ तू माणु---" जब कठिन वक्त अत है। मुसीबतें आती हैं तब सबसे पहले वही लोग छोड़ जाते हैं जिन पर सबसे से ज़्यादा गहरा विश्वास और प्रेम होता है। दुनिया जब नकार देती है तन मन की पीड़ा और बढ़ जाती है---उस समय यह शब्द भी बहुत हौंसला देता है और भगवन के साथ जोड़ता है। गुरु के कीर्तन को घर घर पहुँचाने वाले भाई सुरिंदर सिंह जोधपुरी जी ने अपने परिवार सहित खुद भी बहुत सी मुसीबतों का सामना किया। अफ़सोस उन की कुर्बानियों की कभी चर्चा नहीं हुई। वह स्वयं भी भगवन के रंग में मगन रहने वाले थे। बहुत कुछ था जो उनके साथ चला गया लेकिन कीर्तन का अनमोल खज़ाना, अपने गायन की अनमोल निधि वह चरणजीत सिंह हीरा जी को दे गए। उन्होंने एक आलेख फेसबुक पर भी पोस्ट किया तीन अक्टूबर 2021 की रात्रि को 10:17 पर। यह आलेख जोधपुरी जी के उस अंतर्मन की थोड़ी सी झलक देता है जिसकी चमक उनके चेहरे पर सदैव रही। स्वार्थों भरी दुनिया में उनकी मासुमियत भी बरकरार रही। एक दिव्यता उनकी शख्सियत में थी। पढ़िए आप स्वयं ही पढ़िए चरणजीत सिंह हीरा जी की वह पोस्ट। जिनमें कीर्तन की बात के साथ साथ इस रूहानी मिलन की बातें भी हैं। जो बताती हैं कि आजकल भी ऐसे मिलन होते हैं। --रेक्टर कथूरिया

इस वीडियो में है अंतिम संस्कार के कार्यक्रम की कुछ यादें, कुछ तस्वीरें, कुछ वीडियो क्लिप। यही है आजकल यादों को संभालने का सिलसिला। 

अगर किसी ने जोधपुरी जी का कीर्तन सुनने के रस लिया हैं। तो मैंने उस कीर्तन करने का स्वाद चखा है।
मैंने उनका ज़हन पिया है। उनकी चेतना की गहराइयों को जाना है जिससे कीर्तन उत्पन्न होता है। वो गहराई जहां भीतर का अनंत आकाश शुरू होता है।
इसलिए मुझे किसी और का कीर्तन बहुत पसंद नहीं है।
उन्होंने मेरे जीवन को कीर्तन से भर दिया। कीर्तन-मय कर दिया।
चरणजीत सिंह हीरा 
जो भी राजनीति या सांसारिक कारण से उनके साथ रहे हैं। भले वह बाहर बाहर ही रहे पाए लेकिन मुझे खुशी है कि मैं उनके साथ उनके अंदर की इतनी गहराई से जुड़ा।
1995-96 के आसपास जब हम उन्हें फ़ोन करते थे। जब कभी भी वह दिल्ली में मॉडल टाउन के पास किसी एक भारी शरीर वाले गुरसिख के घर पर ठहरते थे।
फोन पर वे मुझे मज़ाक में चिढ़ाते थे, "की हाल है Mr. हीरा आंनद गुणी गहिरा ?" शायद मजाक में ही सही मुझे वह कीर्तन का वरदान दे गए।
उन दिनों में ही मैंने कीर्तन करना थोड़ा थोड़ा इज़ात कर लिया था। रकाब गंज गुरुद्वारा में मेरे पिता जी ने उनसे कहा कि यह भी कीर्तन भी लेता है। ओर आपके शब्द गाता है।
और उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, तुम्हें बहुत मेहनत करनी है, बहुत मेहनत करनी है।"
और एक बार रेलवे कॉलोनी रानी बाग में उनका कीर्तन हुआ। और कीर्तन के बाद, उनसे बात करते हुए, सहज में अपने हाथ को बातों बातों में ऊपर कर रहे थे और मैं अपना हाथ नीचे कर रहा था । मेरे हाथ में जेल पेन था । जो उनके हाथ में ज़ोर से लगा।
एक बार जब हम जगाद्री कीर्तन दरबार में मिले, तो मैं उनके पैर छूने लगा तो उन्होंने मेरे कंधे पकड़ लिए और कहा, "चलो, अच्छा है, कोई तो मुझे गाने वाला हुआ।"
उनके साथ मेरा रिश्ता इतना गहरा है कि या तो वे जानते थे या मैं। इस कीर्तन दात के लिए मुझे चुनने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। अंदर ही अंदर सारा हस्तांतरण कर दिया।
मुझे इतना अपना बनाने के लिए धन्यवाद। इतना अपना जो दूसरों को कभी नहीं पता नही चल पाएगा।
बिछड़ी रूह को कोट कोट नमन एवं श्रद्धांजलि।
चरणजीत सिंह "हीरा"


Friday, 21 August 2020

नास्तिक कौन? बता रहे हैं ओशो

 लेकिन नास्तिक के पीछे एक ग्रंथि है.... 
नास्तिक मेरे लिए वही आदमी है, जिसको कोई बहुत गहन पीड़ा का अनुभव किसी जन्म में हो गया। 
यह तस्वीर नास्तिक भारत से साभार ली गई है 
वह पीड़ा इतनी भयंकर थी कि वह दोबारा उसको पुनरुक्त नहीं करना चाहता। वह अपने को समझाता है, परमात्मा है ही नहीं। वह अपने को तर्क देता है। वह अपने चारों तरफ तर्क का एक जाल निर्मित करता है। वह अपने ही खिलाफ षड्यंत्र रचता है। वह किसी दूसरे का धर्म बिगाड़ने को नहीं है, न तुमसे उसे कुछ मतलब है।
अन्यथा तुम सोचो, ऐसे नास्तिक हैं जो जीवनभर, ईश्वर नहीं है, यह सिद्ध करने में समय व्यतीत करते हैं। है ही नहीं जो, उसके लिए तुम अपना जीवन क्यों खराब कर रहे हो? तुम कुछ और कर लो। ईश्वर तो है ही नहीं, बात खत्म हो गई। लेकिन जीवनभर व्यतीत करते हैं!
मेरी अपनी प्रतीति यह है कि कभी—कभी भक्तों को भी वे मात कर देते हैं। भक्त भी इतनी संलग्नता से जीवन व्यतीत नहीं करता परमात्मा के लिए, जितना नास्तिक करते हैं। लिखते हैं, सोचते हैं, तर्क जुटाते हैं, समझाते हैं, शास्त्र लिखते हैं बड़े—बड़े कि ईश्वर नहीं है।
इस सब के पीछे कुछ मनोविज्ञान होना चाहिए। जो है ही नहीं, उसकी कौन फिक्र करता है? कोई तो सिद्ध नहीं करता कि आकाश—कुसुम नहीं होते। कोई तो सिद्ध नहीं करता कि गधे को सींग नहीं होते। इसको क्या सिद्ध करना है! और जो सिद्ध करे, वह गधा। क्योंकि इसको क्या प्रयोजन है? गधे को सींग नहीं होते, यह जाहिर बात है, खत्म हो गई। इसको कोई भी सिद्ध करने की जरूरत नहीं है।
लेकिन ईश्वर नहीं है, अगर ईश्वर भी ऐसा है जैसे कि गधे के सींग नहीं हैं, तो क्या पागलपन कर रहे हो! किसको सिद्ध कर रहे हो? किसके लिए लड़ रहे हो? क्या प्रयोजन है? सिद्ध भी कर लोगे, तो क्या सार है? जो था ही नहीं, उसको तुमने सिद्ध कर लिया कि वह नहीं है, क्या पाया? कहीं और जीवन ऊर्जा को लगाते, कहीं और खोजते।
लेकिन नास्तिक के पीछे एक ग्रंथि है। वह ग्रंथि यह है कि अगर वह सिद्ध न करे कि ईश्वर नहीं है, तो डर है कि कहीं फिर कदम उसी तरफ न उठने लगें। यह बड़ी अचेतन प्रक्रिया है। यह उसके अनकांशस में है। उसे भी पता नहीं है। --संजीव वर्मा 
गीता दर्शन, प्रवचन -179, ओशो

Thursday, 26 March 2020

इच्छापूर्ति वॄक्ष आपके पास भी है

चाहो तो आज ही पा लो--लेकिन साधना तो करनी ही होगी 
चर्चा-विचार चर्चा और नए पहलू: 26 मार्च 2020: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::
आप ने इच्छापूर्ति वृक्ष की कहानी सुनी है? जीवन की विकट स्थितियों पर नियन्त्रण पाने के बहुत ही गहरे रहस्य हैं उसमें। सुना है एक घने जंगल में एक इच्छापूर्ति वृक्ष था, उसके नीचे बैठ कर कोई भी इच्छा करने से वह तुरंत पूरी हो जाती थी। किसी को भी इसका एतबार न होता लेकिन थी यह एक हकीकत। 
यह बात बहुत कम लोग जानते थे..क्योंकि उस घने जंगल में जाने की कोई हिम्मत ही नहीं करता था। इसलिए इस लिए इस हकीकत को बहुत ही कम लोग जानते थे लेकिन बिना जानने इसे मानने वालों की संख्या भी कम न थी। इस तरह यह एक किवदन्ती भी बन गयी। 
इन्हीं कहानियों के बीच एक बार संयोग से एक थका हुआ व्यापारी उस वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए बैठ गया उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी नींद लग गई। उस पेड़ के नीचे सपने भी बहुत सुंदर आये। उस दिन नींद भी बहुत अच्छी आई। जाग खुली तो आत्मविश्वास भी पहले से ज्यादा था और मूड भी बहुत अच्छा। लेकिन भूख कहाँ टिकने देती है यह सब? जागते ही उसे बहुत भूख लगी,उसने आस पास देखकर सोचा- 'काश !
कुछ खाने को मिल जाए ! तत्काल स्वादिष्ट पकवानों से भरी थाली हवा में तैरती हुई उसके सामने आ गई।
व्यापारी ने भरपेट खाना खाया और भूख शांत होने के बाद सोचने लगा..काश कुछ पीने को मिल जाए..तत्काल उसके सामने हवा में तैरते हुए अनेक शरबत आ गए। यह तो कमाल हो गया था।  यकीन ही नहीं हो रहा था। कभी कभी सुख का भी यकीन नहीं होता। आनन्द भी हो तो भी सपना ही लगने लगता है। 
इस तरह का मीठा शरबत पहले कभी न पिया था। शरबत पीने के बाद वह आराम से बैठ कर सोचने लगा-कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूं। दिल में आशंका अपना घर बनाने लगी। शक उठने शुरू हो गए। शक के साथ ही मनोस्थिति भी बदलने लगी। 
वह हैरान था।  बेहद हैरान। हवा में से खाना पानी प्रकट होते पहले कभी नहीं देखा था-न ही सुना था।  उसे लगा जरूर इस पेड़ पर कोई भूत रहता है जो मुझे खिला पिला कर मोटा ताज़ा कर रहा है और बाद में मुझे खा लेगा। मन में उठी आशंका विकराल रूप लेने लगी। हम से बहुतों के साथ यही तो होता है। बस ऐसा सोचना ही था कि तत्काल उसके सामने एक भूत आया और उसे खा गया। उसे हैरान होने और सवाल पूछने का भी मौका नहीं मिला। देखते ही देखते वह वर्तमान से अतीत बन गया। अक्सर हममें से अधिकांश की जिंदगी के साथ यही तो होता है। सारी उम्र खत्म हो जाती है लेकिन हम ज़िंदगी को पहचान ही नहीं पाते। नकारत्मक विचरों की भीड़ में हम अपना हर सकारत्मक गुण गंवा बैठते हैं। सब कुछ लुटा के होश में आते हैं लेकिन उस समय कुछ सम्भव ही नहीं होता। 
इच्छापूर्ति वृक्ष और भूत के इस प्रसंग से भी आप यह सीख सकते है कि हमारा मस्तिष्क ही इच्छापूर्ति वृक्ष है आप जिस चीज की प्रबल कामना करेंगे वह आपको अवश्य मिलेगी। यह बात शत प्रतिशत सही है। इसलिए कोई इच्छा भी करना तो बहुत ही सोच समझ कर ही करना वरना खुद के जाल में ही उलझ कर रह जाओगे। 
यही वजह है कि अधिकांश लोगों को जीवन में बुरी चीजें इसी लिए मिलती हैं क्योंकि वे बुरी चीजों की ही कामना करते हैं। जाने या अनजाने वे इन नैगेटिव विचारों से ही घिरे रहते हैं। इन नैगेटिव विचारों से उनके कर्म हबी भी नैगेटिव ही होते चले जाते हैं। इस पर वे खुद को नहीं सुधारते बस किस्मत को कोसते हैं जिसका कोई कसूर ही नहीं होता। किस्मत तो उनको भी बहुत कुछ दे रही थी लेकिन उन्होंने बुरा ही चुना। 
ऍम इन्सान की रोज़ की ज़िंदगी पर ज़रा एक नजर तो डालो। इंसान ज्यादातर समय सोचता है-कहीं बारिश में भीगने से मै बीमार न हों जाँऊ..और वह बीमार हो जाता हैं..! यह सब तकरीबन हर रोज़ होता है। इसी तरह बार बार इंसान सोचता है - मेरी किस्मत ही खराब है .. और उसकी किस्मत सचमुच खराब हो जाती हैं ..! उसके हाथ में आये बहुत से सुनहरी अवसर झट से निकल जाते हैं। इस तरह आप देखेंगे कि आपका अवचेतन मन इच्छापूर्ति वृक्ष की तरह आपकी इच्छाओं को ईमानदारी से पूर्ण करता है..! आप क्या पाना चाहते हैं यह आप ने ही फैसला करना है। इसलिए आपको अपने मस्तिष्क में विचारों को सावधानी से प्रवेश करने की अनुमति देनी चाहिए। यदि गलत विचार अंदर आ जाएगे तो गलत परिणाम मिलेंगे। विचारों पर काबू रखना ही अपने जीवन पर काबू करने का रहस्य है..! इसके बाद ही शुरू होता है विजय या पराजय का सिलसिला। आपके विचारों से ही आपका जीवन या तो.. स्वर्ग बनता है या नरक..उनकी बदौलत ही आपका जीवन सुखमय या दुख:मय बनता है...।
यह बहुत बड़ा सत्य है कि वास्तव में विचार जादूगर की तरह होते है जिन्हें बदलकर आप सचमुच अपना जीवन बदल सकते है।  इसलिये सदा सकारात्मक सोच रखें। यदि आप अच्छा सोचने लगते है तो पूरी कायनात आपको और अच्छा देने में लग जाती है। इसलिए देरी मत कीजिये। आज ही कीजिये विचारों में परिवर्तन और पाईये मन चाही मुराद। 

Sunday, 15 March 2020

पूरी तरह वैज्ञानिक हैं हवन के फायदे

Saturday: 14th March 2020 at 09:52 PM  
अब विज्ञान ने भी पूरी बारीकी से परख कर देख लिया 
हवन के लिए तैयारी की यह तस्वीर सेंट्रल बैंक आफ इंडिया की एक शाखा में हुई पूजा के दौरान आराधना टाईम्ज़ द्धारा ली गयी थी
कुछ लोग विदेश में रह कर भी स्वदेश से प्रेम बनाये रखते हैं। अपने धर्म और संस्कृति को दिल और दिमाग में संजोये रखते हैं।  मधु गजाधर भी ऐसे अनमोल लोगों में से एक हैं। हवन पर उनका एक खोजपूर्ण आलेख हम यहां आराधना टाईम्ज़ के पाठकों के लिए भी दे रफ़हे हैं। आशा है आपको अच्छा लगेगा। इस पर आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही। -रेक्टर कथूरिया 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 14 मार्च 2020: (*मधु गजाधर//आराधना टाईम्ज़)::
फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमे उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है जो की खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओ को मारती है तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।
(२) टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।
(३) हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है अथवा नही. उन्होंने ग्रंथो. में वर्णित हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया की ये विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा की सिर्फ आम की लकड़ी १ किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बॅक्टेरिया का स्तर ९४ % कम हो गया। यही नही. उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया की कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओ का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। बार बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ की इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था। 
यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर २००७ में छप चुकी है।
रिपोर्ट में लिखा गया की हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।
क्या हो हवन की समिधा (जलने वाली लकड़ी):-👇
समिधा के रूप में आम की लकड़ी सर्वमान्य है परन्तु अन्य समिधाएँ भी विभिन्न कार्यों हेतु प्रयुक्त होती हैं। सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मङ्गल की खैर की, बुध की चिड़चिडा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु दूर्वा की और केतु की कुशा की समिधा कही गई है।
मदार की समिधा रोग को नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है।
हव्य (आहुति देने योग्य द्रव्यों) के प्रकार
प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वायुमण्डल रहते हैं। सर्दी, गर्मी, नमी, वायु का भारीपन, हलकापन, धूल, धुँआ, बर्फ आदि का भरा होना। विभिन्न प्रकार के कीटणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है। इसलिए कई बार वायुमण्डल स्वास्थ्यकर होता है। कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इस प्रकार की विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं, जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं।
होम द्रव्य-
होम-द्रव्य अथवा हवन सामग्री वह जल सकने वाला पदार्थ है जिसे यज्ञ (हवन/होम) की अग्नि में मन्त्रों के साथ डाला जाता है।
(१) सुगन्धित : केशर, अगर, तगर, चन्दन, इलायची, जायफल, जावित्री छड़ीला कपूर कचरी बालछड़ पानड़ी आदि
(२) पुष्टिकारक : घृत, गुग्गुल ,सूखे फल, जौ, तिल, चावल शहद नारियल आदि
(३) मिष्ट - शक्कर, छूहारा, दाख आदि
(४) रोग नाशक -गिलोय, जायफल, सोमवल्ली ब्राह्मी तुलसी अगर तगर तिल इंद्रा जव आमला मालकांगनी हरताल तेजपत्र प्रियंगु केसर सफ़ेद चन्दन जटामांसी आदि

उपरोक्त चारों प्रकार की वस्तुएँ हवन में प्रयोग होनी चाहिए। अन्नों के हवन से मेघ-मालाएँ अधिक अन्न उपजाने वाली वर्षा करती हैं। सुगन्धित द्रव्यों से विचारों शुद्ध होते हैं, मिष्ट पदार्थ स्वास्थ्य को पुष्ट एवं शरीर को आरोग्य प्रदान करते हैं, इसलिए चारों प्रकार के पदार्थों को समान महत्व दिया जाना चाहिए। यदि अन्य वस्तुएँ उपलब्ध न हों, तो जो मिले उसी से अथवा केवल तिल, जौ, चावल से भी काम चल सकता है।
सामान्य हवन सामग्री-
तिल, जौं, सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , पानड़ी , लौंग , बड़ी इलायची , गोला , छुहारे नागर मौथा , इन्द्र जौ , कपूर कचरी , आँवला ,गिलोय, जायफल, ब्राह्मी.
मधु गजाधर मॉरिशियस ब्राडकास्टिंग कार्पोरेशन में मीडिया प्रेसेंटर हैं। लम्बे समय से अपने विचार बहुत बेबाकी से रखती ा रही हैं। हवन पर उनका यह आलेख हम उनके फेसबुक प्रोफाईल से साभार दे रहे हैं। 

Sunday, 9 February 2020

मुझे गर्व है कि मुझे आज भी हनुमान चालीसा कंठस्त है

 7th February 2020 at 12:01 AM 
कम से कम मेरे लिए तो हिन्दू होना कोई शर्म की बात नहीं 
मैं जब भी 18 के आसपास के हौसलामंद नौजवानों को नास्तिक होते देखता हूँ तो मुझे बुरा नहीं लगता।
प्रमोद शुक्ला 
पर मैं जब इन्हें नमाज़, कुरान, वुज़ू, इस्लाम और मुसलमानों की इज़्ज़त करते देखता हूँ तो अच्छा लगता है।

लेकिन जब यही YOUNG GUNS मंदिर में होती आरती का या भगवान की मूरत और उसकी पूजा का मज़ाक बनाते हैं तो दुःख होता है लेकिन टोकना फ़िज़ूल लगता है क्योंकि मुझे इनकी कोई ग़लती नज़र नहीं आती।

वहीं जब मैं किसी मुस्लिम परिवार के पांच साल के बच्चे को भी बाक़ायदा नमाज़ पढ़ते देखता हूँ तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। मुस्लिम परिवारों की ये अच्छी चीज़ है कि वो अपना धर्म और अपने संस्कार अपनी अगली पीढ़ी में ज़रूर देते हैं। कुछ पुचकारकर तो कुछ डराकर, लेकिन उनकी नींव में अपने बेसिक संस्कार गहरे घुसे होते हैं।

यही ख़ूबसूरती सिखों में भी है। एक बार छुटपन में मैंने एक सरदार का जूड़ा पकड़ लिया था। उसने मुझे उसी वक़्त तेज़ आवाज़ में सिर्फ समझाया ही नहीं, धमकाया भी था। तब बुरा लगा था, लेकिन आज याद करता हूँ तो अच्छा लगता है।

हिन्दू धर्म चाहें कितना ही अपने पुराने होने का दावा कर ले, पर इसका प्रभाव अब सिर्फ सरनेम तक सीमित होता जा रहा है। मैं अक्सर देखता हूँ कि मज़ाक में लोग किसी ब्राह्मण की चुटिया खींच देते हैं। वो हँस देता है।

एक माँ आरती कर रही होती है, उसका बेटा जल्दी में प्रसाद छोड़ जाता है, लड़का कूल-डूड है, उसे इतना ज्ञान है कि प्रसाद गैरज़रूरी है।

बेटी इसलिए प्रसाद नहीं खाती कि उसमें कैलोरीज़ ज़्यादा हैं, उसे अपनी फिगर की चिंता है।

छत पर खड़े अंकल जब सूर्य को जल चढ़ाते हैं तो लौंडे हँसते हैं, 'बुड्ढा कब नीचे जायेगा और कब इसकी बेटी ऊपर आयेगी?'

दो वक़्त पूजा करने वाले को हम सहज ही मान लेते हैं कि साला दो नंबर का पैसा कमाता होगा, इसीलिए इतना अंधविश्वास करता है। 'राम-राम जपना, पराया माल अपना' ये तो फिल्मों में भी सुना है।

इसपर माँ टालती हैं 'अरे आज की जेनरेशन है जी, क्या कह सकते हैं, मॉडर्न बन रहे हैं।'

पिताजी खीज के बचते हैं 'ये तो हैं ही ऐसे, इनके मुँह कौन लगे'

नतीजतन बच्चों का पूजा के वक़्त हाज़िर होना मात्र दीपावली तक सीमित रह जाता है।

यही बच्चे जब अपने हमउम्रों को हर शनिवार गुरुद्वारे में मत्था टेकते या हर शुक्रवार विधिवत नमाज़ पढ़ते या हर सन्डे चर्च में मोमबत्ती जलाते देखते हैं तो बहुत फेसिनेट होते हैं। सोचते हैं ये है असली गॉड, मम्मी तो यूंही थाली घुमाती रहती थी। अब क्योंकि धर्म बदलना तो पॉसिबल नहीं, इसलिए मन ही मन खुद को नास्तिक मान लेते हैं।

शायद हिन्दू अच्छे से प्रोमोट नहीं कर पाए। शायद उन्हें कभी ज़रूरत नहीं महसूस हुई। शायद आपसी वर्णों की मारामारी में रीतिरिवाज और पूजा पाठ 'झेलना' सौदा बन गया

वर्ना...

सूरज को जल चढ़ाना सुबह जल्दी उठने की वजह ले आता है। सुबह पूजा करना नहाने का बहाना बन जाता है और मंदिर घर में रखा हो तो घर साफ सुथरा रखने का कारण बना रहता है। घण्टी बजने से जो ध्वनि होती है वो मन शांत करने में मदद करती है तो आरती गाने से कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ता है। हनुमान चालीसा तो डर को भगाने और शक्ती संचार करने के लिए सर्वोत्तम है।

 सुबह टीका लगा लो तो ललाट चमक उठता है। प्रसाद में मीठा खाना तो शुभ होता है भई, टीवी में एड नहीं देखते?

संस्कार घर से शुरु होते हैं। जब घर के बड़े ही आपको अपने संस्कारों के बारे में नहीं समझाते तो आप इधर-उधर भटकते ही हैं जो की बुरा नहीं, भटकना भी ज़रूरी है। लेकिन इस भटकन में जब आपको कोई कुछ ग़लत समझा जाता हैं तो आप भूल जाते हो कि आप उस शिवलिंग का मज़ाक बना रहे हो जिसपर आपकी माँ हर सोमवार जल चढ़ाती है।

लेकिन मैं किसी को बदल नहीं सकता। मैं किसी के ऊपर कुछ थोपना नहीं चाहता। मैं सिर्फ अपना घर देख सकता हूँ।

मुझे गर्व है कि मुझे आज भी हनुमान चालीसा कंठस्त है। शिव स्तुति मैं रोज़ करता हूँ। सूरज को जल चढ़ाना मेरे लिए ओल्ड फैशन नहीं हुआ है। दुनिया मॉडर्न है इसलिए भजन यू-ट्यूब पर सुन लेते हैं। *श्रीकृष्ण को अपना आइडल मानता हूँ।*  मुझे यकीन है कि ये सब मेरी आने वाली जेनेरेशन मुझसे ज़रूर सीखेगी।

मैं गुरुद्वारे भी जाता हूँ। चर्च भी गया हूँ। कभी किसी धर्म का मज़ाक नहीं उड़ाया है, हर धर्म के रीति-रिवाज़ पर मैं तार्किक बहस कर सकता हूँ लेकिन किसी को भी इतनी छूट नहीं देता हूँ कि मेरे सामने मूर्तियों का मज़ाक बनायें।

कम से कम मेरे लिए तो हिन्दू होना कोई शर्म की बात नहीं रही। आपके लिए हो भी तो मज़ाक न बनाएं, चाहें जिसकी आराधना करें, लेकिन मूर्तियों को उपहासित न करें।

  *🌹यत्र धर्मस्य ततो जयः🌹*
-एम पी अग्रवाल
*प्रमोद शुक्ल पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं और ज्योतिष का भी विशेष ज्ञान रखते हैं। धर्म के मामले में वह बहुत सैद्धांतिक हैं। किसी को बुरा नहीं कहते। अन्य लोगों से भी यही अपेक्षा।  उनका यह आलेख उनके फेसबुक प्रोफ़ाइल से साभार लिया गया है।  

Friday, 15 July 2016

वह आदमी अकेला था और डर गया और भागने लगा//Osho

Priti Bhardwaj ने मंगलवार 14 जुलाई 2016 को पोस्ट किया 
!! छाया !!
मैंने सुना है कि एक गांव में एक बार 
एक आदमी को एक बड़ा पागलपन सवार हो गया। 
वह एक रास्ते से गुजर रहा था। 
भरी दोपहरी थी, अकेला रास्ता था, निर्जन था। 
तेजी से चल रहा था कि निर्जन में कोई डर न हो जाए।
हालाकि डर वहां हो भी सकता है,
जहां कोई और हो, जहां कोई भी नहीं है,
वहां डर का क्या उपाय हो सकता है!
लेकिन हम वहां बहुत डरते हैं,
जहां कोई भी नहीं होता है।
असल में हम अपने से ही डरते हैं।
और जब हम अकेले रह जाते हैं,
तो बहुत डर लगने लगता है।
हम अपने से जितना डरते हैं,
उतना किसी से भी नहीं डरते।
इसलिए कोई साथ हों
—कोई भी साथ हो
—तो भी डर कम लगता है।
और बिलकुल अकेले रह जाएं,
तो बहुत डर लगने लगता है।
वह आदमी अकेला था और
डर गया और भागने लगा।
और सन्नाटा था, सुनसान था,
दोपहर थी, कोई भी न था।
जब वह तेजी से भागा,
तो उसे अपने ही पैरों की आवाज पीछे
से आती हुई मालूम पड़ी।
और वह डरा कि शायद कोई पीछे है।
फिर उसने डरे हुए,
चोरी की आख से पीछे झांककर देखा,
तो एक लंबी छाया उसका पीछा कर रही थी।
वह उसकी अपनी ही छाया थी।
लेकिन यह देखकर कि
कोई लंबी छाया पीछे पड़ी हुई है,
वह और भी तेजी से भागा।
फिर वह आदमी कभी रुक नहीं
सका मरने के पहले।
क्योंकि वह जितनी तेजी से भागा,
छाया उतनी ही तेजी से उसके पीछे भागी।
फिर वह आदमी पागल हो गया।
लेकिन पागलों को पूजनेवाले भी मिल जाते हैं।
जब वह गांव से भागता हुआ निकलता और
लोग देखते कि वह भागा जा रहा है,
तो लोग समझते कि वह बड़ी तपश्चर्या में रत है।
वह कभी रुकता नहीं था।
वह सिर्फ रात के अंधेरे में रुकता था,
जब छाया खो जाती थी।
तब वह सोचता था कि अब कोई पीछे नहीं है।
सुबह हुई और वह भागना शुरू कर देता था।
फिर तो बाद में उसने रात में भी रुकना बंद कर दिया।
उसे ऐसा समझ में आया कि
जब तक मैं विश्राम करता हूं?
मालूम होता है,
जितना दूर भागकर दिन भर में
मैं दूर निकलता हूं,
उतनी देर में छाया फिर वापस आ जाती है,
सुबह फिर मेरे पीछे हो जाती है।
तब उसने रात में भी रुकना बंद कर दिया।
फिर वह पूरा पागल हो गया।
फिर वह खाता भी नहीं, पीता भी नहीं।
भागते हुए लाखों की भीड़ उसको देखती,
फूल फेंकती।
कोई राह चलते उसके हाथ में रोटी पकड़ा देता,
कोई पानी पकड़ा देता।
उसकी पूजा बढ़ती चली गई।
लाखों लोग उसका आदर करने लगे।
लेकिन वह आदमी पागल होता चला गया।
और अंततः वह आदमी एक दिन गिरा और मर गया।
गांव के लोगों ने, जिस गांव में वह मरा था,
उसकी कब्र बना दी एक वृक्ष के नीचे छाया में।
और उस गांव के एक बूढ़े फकीर से उन्होंने पूछा कि
हम इसकी कब्र पर क्या लिखें?
तो उस फकीर ने एक लाइन उसकी कब पर लिख दी।
किसी गांव में, किसी जगह, वह कब्र अब भी है।
हो सकता है, कभी आपका उस जगह से निकलना हो,
तो पढ़ लेना।
उस कब्र पर उस फकीर ने लिख दिया है कि
यहां एक ऐसा आदमी सोता है,
जो जिंदगी भर अपनी छाया से भागता रहा है,
जिसने जिंदगी छाया से भागने में गंवा दी।
और उस आदमी को इतना भी पता नहीं था,
जितना उसकी कब को पता है।
क्यौंकि कब्र छाया में है और भागती नहीं,
इसलिए कब्र की कोई छाया ही नहीं बनती है।
इसके भीतर जो सोया है
उसे इतना भी पता नहीं था,
जितना उसकी कब को पता है।
हम भी भागते हैं। 
हमें आश्चर्य होगा कि
कोई आदमी छाया से भागता था।
हम सब भी छायाओं से ही भागते रहते हैं। 
और जिससे हम भागते हैं, 
वही हमारे पीछे पड़ जाता है।
और जितनी तेजी से हम भागते हैं, 
उसकी दौड़ भी उतनी ही तेज हो जाती है, 
क्योंकि वह हमारी ही छाया है।
मृत्यु हमारी ही छाया है। 
और अगर हम उससे भागते रहे तो हम 
उसके सामने कभी खड़े होकर 
पहचान न पाएंगे कि वह क्या है। 
काश, वह आदमी रुक जाता और 
पीछे लौटकर देख लेता, 
तो शायद अपने पर हंसता और कहता,
कैसा पागल हूं, छाया से भागता हूं।
-मैं-मृत्‍यु-सिखाता-हूं

(प्रीति सभरवाल के प्रोफाईल से साभार)