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Saturday, 1 July 2023

दोराहा में पत्रकार हरमिंदर सेठ को गहरा सदमा

2 जुलाई को पत्नी की अंतिम अरदास निरंकारी भवन में होगी 

दोराहा: 1 जुलाई 2023: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::

दिवंगत सुश्री सुरिंदर कौर जो30 जून
को हमेशां के लिए बिछड़ गए 
पति पत्नी का रिश्ता सात जन्मों का रिश्ता गिना जाता है। पत्नी को अर्धांगिनी का सम्मानजनक दर्जा भी  हासिल है। ज़िंदगी की कठिनाइयों का सफर हो या फिर सुख और आनंद का सागर दोनों को दोनों का साथ ही सफल बनता है। जब जीवन रूपी इस रथ का एक पहिया टूट जाता है तो सफर  बेहद कठिन हो जाता है। कुछ इसी तरह का सदमा पहुंचा है दोराहा के पत्रकार हरमिंदर सेठ को। 

दैनिक नवां ज़माना के लिए दोराहा से रिपोर्टिंग करने वाले हरमिंदर सेठ को उस समय गहरा सदमा लगा जब उनकी जीवन साथी सुरिंदर कौर अचानक उनसे अलग हो गईं। साँसों की पूँजी का समापन होते ही भगवान्उ ने उन्हें अपने पास बुला लिया। उनका अंतिम संस्कार दोराहा में ही कर दिया गया था। अंतिम अरदास, भोग और श्रद्धांजलि समारोह 2 जुलाई को दोराहा में आयोजित किया जाना है। 

अंतिम संस्कार के मौके पर पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की तरफ से तरूण आनंद, प्रोफेसर लवली बैंस, जोगिंदर सिंह ओबेरॉय, जसवीर झज, मंजीत सिंह गिल, मनप्रीत मांगट, रोहित गुप्ता, नरेंद्र कुमार आनंद, रविंदर सिंह ढिल्लों, विपन भारद्वाज, सुखवीर सिंह चंकोया, शिव. विनायक, मैडम गुरमीत कौर, जोगिंदर सिंह कीर्ति , मुदित महिंद्रा, पंकज सूद, विकास सूद, प्रकाश सेह, मनप्रीत सिंह रणदिओ  और कई अन्य भी शामिल हुए। 

लुधियाना से एमएस भाटिया, प्रदीप शर्मा, रेक्टर कथूरिया, डीपी मोड़, रमेश रतन, चमकौर सिंह, विजय कुमार और कई अन्य लोगों ने भी शोक संदेश भेजे। भाई साहिब गुरमेल सिंह जी ने भी अंतिम अरदास  की सुचना को लेकर संत निरंकारी मंडल दोराहा के कार्यक्रम के अनुसार निश्चित प्रोग्राम बताया। 

यह समारोह 2 जुलाई को किया जाना है। दोराहा शाखा के प्रधान भाई साहिब भाई गुरमेल सिंह,  शाखा दोराहा के प्रबंधक-हरमिंदर सेठ, शाखा दोराहा के शिक्षक-भाई साहिब जीत सिंह  द्वारा जारी एक बयान में कहा गया कि अंतिम प्रार्थना की यह रस्म रविवार, 2 जुलाई को आयोजित की जाएगी. और समय रहेगा दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक। ज़ेह सारा आयोजन निरंकारी सत्संग भवन दोराहा में होगा जो कि नहर के किनारे है। । इस मौके पर कई अन्य संगठनों और लोगों ने भी गहरा दुख व्यक्त किया। 

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Friday, 25 September 2020

मौत घटित होने से पहले सम्भव है मौत की तस्वीर खींचना

रूसी वैज्ञानिक किरलियान ने विकसित की 'हाई फ्रिकेंसी फोटोग्राफी'

एक दूसरे रूसी वैज्ञानिक किरलियान ने 'हाई फ्रिकेंसी फोटोग्राफी' विकसित की है। वह शायद आने वाले भविष्य में सबसे अनूठा प्रयोग सिद्ध होगा। अगर मेरे हाथ का चित्र लिया जाए, 'हाईफ्रिकेंसी फोटोग्राफी' से, जो कि बहुत संवेदनशील प्लेट्स पर होती है, तो मेरे हाथ का चित्र सिर्फ नहीं आता, मेरे हाथ के आसपास जो किरणें मेरे हाथ से निकल रही हैं, उनका चित्र भी आता है। और आश्रर्य की बात तो यह है कि अगर मैं निषेधात्मक विचारों से भरा हुआ हूं तो मेरे हाथ के आसपास जो विद्युत—पैटर्न, जो विद्युत के जाल का चित्र आता है, वह रुग्ण, बीमार, अस्वस्थ और 'केआटिक', अराजक होता है — विक्षिप्त होता है। जैसे किसी पागल आदमी ने लकीरें खींची हों। अगर मैं शुभ भावनाओं से, मंगल—भावनाओं से भरा हुआ हूं आनंदित हूं 'पाजिटिव'हूं प्रफुल्लित हूं प्रभु के प्रति अनुग्रह से भरा हुआ हूं तो मेरे हाथ के आसपास जो किरणों का चित्र आता है, किरलियान की फोटोग्राफी से,वह 'रिद्मिमक', लयबब्द, सुन्दरल, 'सिमिट्रिकल ', सानुपातिक, और एक और ही व्यवस्था में निर्मित होता है।

किरलियान का कहना है — और किरलियान का प्रयोग तीस वर्षों की मेहनत है — किरलियान का कहना है कि बीमारी के आने के छह महीने पहले शीघ्र ही हम बताने में समर्थ हो जायेंगे कि यह आदमी बीमार होनेवाला है। क्योंकि इसके पहले कि शरीर पर बीमारी उतरे, वह जो विद्युत का वर्तुल है उस पर बीमारी उतर जाती है। मरने के पहले,इसके पहले कि आदमी मरे, वह विद्युत का वर्तुल सिकुड़ना शुरू हो जाता है और मरना शुरू हो जाता है। इसके पहले कि कोई आदमी हत्या करे किसी की, उस विद्युत के वर्तुल में हत्या के लक्षण शुरू हो जाते हैं। इसके पहले कि कोई आदमी किसी के प्रति करुणा से भरे, उस विद्युत के वर्तुल में करुणा प्रवाहित होने के लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं।

किरलियान का कहना है कि केंसर पर हम तभी विजय पा सकेंगे जब शरीर को पकड़ने के पहले हम केंसर को पकड़ लें। और यह पकड़ा जा सकेगा। इसमें कोई विधि की भूल अब नहीं रह गयी है। सिर्फ प्रयोगों के और फैलाव की जरूरत है। प्रत्येक मनुष्य अपने आसपास एक आभामंडल लेकर, एक अति लेकर चलता है। आप अकेले ही नहीं चलते, आपके आसपास एक विद्युत—वर्तुल, एक 'इलेक्ट्रो—डायनेमिक—फील्ड ' प्रत्येक व्यक्ति के आसपास चलता है। व्य क्ति के आसपास ही नहीं, पशुओं के आसपास भी, पौधों के आसपास भी। असल में रूसी वैज्ञानिकों का कहना है कि जीव और अजीव में एक ही फर्क किया जा सकता है, जिसके ' आसपास आभामंडल है वह जीवित है और जिसके पास आभामंडल नहीं है, वह मृत है।

जब आदमी मरता है तो मरने के साथ ही आभामंडल क्षीण होना शुरू हो जाता है। बहुत चकित करनेवाली और संयोग की बात है कि जब कोई आदमी मरता है तो तीन दिन लगते हैं उसके आभामंडल के विसर्जित होने में। हजारों साल से सारी दुनिया में मरने के बाद तीसरे दिन का बड़ा मूल्य रहा है। जिन लोगों ने उस तीसरे दिन को — तीसरे को इतना मूल्य दिया था, उन्हें किसी न किसी तरह इस बात का अनुभव होना ही चाहिए, क्योंकि वास्तविक मृत्यु तीसरे दिन घटित होती है। इन तीन दिनों के बीच, किसी भी दिन वैज्ञानिक उपाय खोज लेंगे, तो आदमी को पुनरुज्जीवित किया जा सकता है। जब तक आभामंडल नहीं खो गया, तब तक जीवन अभी शेष है। हृदय की धड़कन बन्द हो जाने से जीवन समाप्त नहीं होता। इसलिए पिछले महायुद्ध में रूस में छह व्यक्तियों को हृदय की धड़कन बंद हो जाने के बाद पुनरुज्जीवित किया जा सका। जब तक आभामंडल चारों तरफ है, तब तक व्यक्ति सूक्ष्म तल पर अभी भी जीवन में वापस लौट सकता है। अभी सेतु कायम है। अभी रास्ता बना है वापस लौटने का।

जो व्यक्ति जितना जीवंत होता है, उसके आसपास उतना बड़ा आभामंडल होता है। हम महावीर की मूर्ति के आसपास एक आभामंडल निर्मित करते हैं — या कृष्ण, या राम, क्राइस्ट के आसपास — तो वह सिर्फ कल्पना नहीं है। वह आभामंडल देखा जा सकता है। और अब तक तो केवल वे ही देख सकते थे जिनके पास थोड़ी गहरी और सूक्ष्म—दृष्टि हो — मिस्टिक्स, संत, लेकिन 193० में एक अंग्रेज वैज्ञानिक ने अब तो केमिकल, रासायनिक प्रक्रिया निर्मित कर दी है जिससे प्रत्येक व्यक्ति — कोई भी — उस माध्यम से, उस यंत्र के माध्यम से दूसरे के आभामंडल को देख सकता है।

आप सब यहां बैठे है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी आभामंडल है। जैसे आपके अंगूठे की छाप निजी—निजी है वैसे ही आपका आभामंडल भी निजी है। और आपका आभामंडल आपके संबंध में वह सब कुछ कहता है जो आप भी नहीं जानते। आपका आभामंडल आपके संबंध में बातें भी कहता है जो भविष्य में घटित होंगी। आपका आभामंडल वे बातें भी कहता है जो अभी आपके गहन अचेतन में निर्मित हो रही हैं, बीज की भांति, कल खिलेगी और प्रगट होंगी।

मंत्र आभामंडल को बदलने की आमूल प्रक्रिया है। आपके आसपास की स्पेस, और आपके आसपास का 'इलेक्ट्रो—डायनेमिक—फील्ड ' बदलने की प्रक्रिया है। और प्रत्येक धर्म के पास एक महामंत्र है। जैन परम्परा के पास नमोकार है — आश्रर्यकारक घोषणा — एसो पंचनमुकारो, सब्बपावप्पणासणो। सब पाप का नाश कर दे, ऐसा महामंत्र हैनमोकार। ठीक नहीं लगता। नमोकार से कैसे पाप नष्ट हो जाएगा?नमोकार से सीधा पाप नष्ट नहीं होता, लेकिन नमोकार से आपके आसपास 'इलेक्ट्रो— डायनेमिक—फील्ड ' रूपांतरित होता है और पाप करना असंभव हो जाता है। क्योंकि पाप करने के लिए आपके पास एक खास तरह का आभामंडल चाहिए। अगर इस मंत्र को सीधा ही सुनेंगे तो लगेगा कैसे हो सकता है? एक चोर यह मंत्र पढ लेगा तो क्या होगा? एक हत्यारा यह मंत्र पढ लेगा तो क्या होगा? कैसे पाप नष्ट हो जाएगा? पाप नष्ट होता है इसलिए, कि जब आप पाप करते हैं, उसके पहले आपके पास एक विशेष तरह का, पाप का आभामंडल चाहिए — उसके बिना आप पाप नहीं कर सकते — वह आभामंडल अगर रूपांतरित हो जाए तो असंभव हो जाएगी बात, पाप करना असंभव हो जाएगा।

यह नमोकार कैसे उस आभामंडल को बदलता होगा? यह नमस्कार है, यह नमन का भाव है। नमन का अर्थ है समर्पण। यह शाब्दिक नहीं है। यह नमो अरिहंताणं, यह अरिहंतों को नमस्कार करता हूं यह शाब्दिक नहीं है, ये शब्द नहीं हैं, यह भाव है। अगर प्राणों में यह भाव सघन हो जाए कि अरिहंतों को नमस्कार करता हूं तो इसका अर्थ क्या होता है? इसका अर्थ होता है, जो जानते हैं उनके चरणों में सिर रखता हूं। जो पहुंच गए हैं, उनके चरणों में समर्पित करता हूं। जो पा गए हैं, उनके द्वार पर मैं भिखारी बनकर खड़ा होने को तैयार हूं।

किरलियान की फोटोग्राफी ने यह भी बताने की कोशिश की है कि आपके भीतर जब भाव बदलते हैं तो आपके आसपास का विद्युत—मंडल बदलता है। और अब तो ये फोटोग्राफ उपलब्ध हैं। अगर आप अपने भीतर विचार कर रहे हैं चोरी करने का, तो आपका आभामंडल और तरह का हो जाता है — उदास, रुग्ण, खूनी रंगों से भर जाता है। आप किसी को, गिर गये को उठाने जा रहे हैं — आपके आभामंडल के रंग तत्काल बदल जाते हैं।
                                   --ओशो

Friday, 15 July 2016

वह आदमी अकेला था और डर गया और भागने लगा//Osho

Priti Bhardwaj ने मंगलवार 14 जुलाई 2016 को पोस्ट किया 
!! छाया !!
मैंने सुना है कि एक गांव में एक बार 
एक आदमी को एक बड़ा पागलपन सवार हो गया। 
वह एक रास्ते से गुजर रहा था। 
भरी दोपहरी थी, अकेला रास्ता था, निर्जन था। 
तेजी से चल रहा था कि निर्जन में कोई डर न हो जाए।
हालाकि डर वहां हो भी सकता है,
जहां कोई और हो, जहां कोई भी नहीं है,
वहां डर का क्या उपाय हो सकता है!
लेकिन हम वहां बहुत डरते हैं,
जहां कोई भी नहीं होता है।
असल में हम अपने से ही डरते हैं।
और जब हम अकेले रह जाते हैं,
तो बहुत डर लगने लगता है।
हम अपने से जितना डरते हैं,
उतना किसी से भी नहीं डरते।
इसलिए कोई साथ हों
—कोई भी साथ हो
—तो भी डर कम लगता है।
और बिलकुल अकेले रह जाएं,
तो बहुत डर लगने लगता है।
वह आदमी अकेला था और
डर गया और भागने लगा।
और सन्नाटा था, सुनसान था,
दोपहर थी, कोई भी न था।
जब वह तेजी से भागा,
तो उसे अपने ही पैरों की आवाज पीछे
से आती हुई मालूम पड़ी।
और वह डरा कि शायद कोई पीछे है।
फिर उसने डरे हुए,
चोरी की आख से पीछे झांककर देखा,
तो एक लंबी छाया उसका पीछा कर रही थी।
वह उसकी अपनी ही छाया थी।
लेकिन यह देखकर कि
कोई लंबी छाया पीछे पड़ी हुई है,
वह और भी तेजी से भागा।
फिर वह आदमी कभी रुक नहीं
सका मरने के पहले।
क्योंकि वह जितनी तेजी से भागा,
छाया उतनी ही तेजी से उसके पीछे भागी।
फिर वह आदमी पागल हो गया।
लेकिन पागलों को पूजनेवाले भी मिल जाते हैं।
जब वह गांव से भागता हुआ निकलता और
लोग देखते कि वह भागा जा रहा है,
तो लोग समझते कि वह बड़ी तपश्चर्या में रत है।
वह कभी रुकता नहीं था।
वह सिर्फ रात के अंधेरे में रुकता था,
जब छाया खो जाती थी।
तब वह सोचता था कि अब कोई पीछे नहीं है।
सुबह हुई और वह भागना शुरू कर देता था।
फिर तो बाद में उसने रात में भी रुकना बंद कर दिया।
उसे ऐसा समझ में आया कि
जब तक मैं विश्राम करता हूं?
मालूम होता है,
जितना दूर भागकर दिन भर में
मैं दूर निकलता हूं,
उतनी देर में छाया फिर वापस आ जाती है,
सुबह फिर मेरे पीछे हो जाती है।
तब उसने रात में भी रुकना बंद कर दिया।
फिर वह पूरा पागल हो गया।
फिर वह खाता भी नहीं, पीता भी नहीं।
भागते हुए लाखों की भीड़ उसको देखती,
फूल फेंकती।
कोई राह चलते उसके हाथ में रोटी पकड़ा देता,
कोई पानी पकड़ा देता।
उसकी पूजा बढ़ती चली गई।
लाखों लोग उसका आदर करने लगे।
लेकिन वह आदमी पागल होता चला गया।
और अंततः वह आदमी एक दिन गिरा और मर गया।
गांव के लोगों ने, जिस गांव में वह मरा था,
उसकी कब्र बना दी एक वृक्ष के नीचे छाया में।
और उस गांव के एक बूढ़े फकीर से उन्होंने पूछा कि
हम इसकी कब्र पर क्या लिखें?
तो उस फकीर ने एक लाइन उसकी कब पर लिख दी।
किसी गांव में, किसी जगह, वह कब्र अब भी है।
हो सकता है, कभी आपका उस जगह से निकलना हो,
तो पढ़ लेना।
उस कब्र पर उस फकीर ने लिख दिया है कि
यहां एक ऐसा आदमी सोता है,
जो जिंदगी भर अपनी छाया से भागता रहा है,
जिसने जिंदगी छाया से भागने में गंवा दी।
और उस आदमी को इतना भी पता नहीं था,
जितना उसकी कब को पता है।
क्यौंकि कब्र छाया में है और भागती नहीं,
इसलिए कब्र की कोई छाया ही नहीं बनती है।
इसके भीतर जो सोया है
उसे इतना भी पता नहीं था,
जितना उसकी कब को पता है।
हम भी भागते हैं। 
हमें आश्चर्य होगा कि
कोई आदमी छाया से भागता था।
हम सब भी छायाओं से ही भागते रहते हैं। 
और जिससे हम भागते हैं, 
वही हमारे पीछे पड़ जाता है।
और जितनी तेजी से हम भागते हैं, 
उसकी दौड़ भी उतनी ही तेज हो जाती है, 
क्योंकि वह हमारी ही छाया है।
मृत्यु हमारी ही छाया है। 
और अगर हम उससे भागते रहे तो हम 
उसके सामने कभी खड़े होकर 
पहचान न पाएंगे कि वह क्या है। 
काश, वह आदमी रुक जाता और 
पीछे लौटकर देख लेता, 
तो शायद अपने पर हंसता और कहता,
कैसा पागल हूं, छाया से भागता हूं।
-मैं-मृत्‍यु-सिखाता-हूं

(प्रीति सभरवाल के प्रोफाईल से साभार)

Monday, 15 February 2016

श्री मति कांता रानी जी की रसम किरया मंगलवार को

पत्रकार अशोक भारती के सभी मित्रों में शोक की लहर 
लुधियाना: 15 फ़रवरी 2016: (आराधना टाइम्ज़ ब्यूरो):
इन्सान इन्सान बनाने में मां का बहुत बड़ा योगदान होता है। ज़िन्दगी सभी दुखद हालात की आँधियों में से निकाल कर सुरक्षित विकास देने वाली मां जब नहीं रहती तभी अहसास होता उसकी महानता का। दुःख का यह समय असहनीय होता है। अपने जीवन स्रोत से टूट जाने का अहसास बार बार होता है लेकिन इंसान बेबस  हो जाता है। कुछ यही घटित हुआ है अशोक भारती जी के साथ। दैनिक जागरण के पत्रकार, लुधियाना प्रेस क्लब के कोषाध्यश व महानगर से संचालित श्री प्रेम धाम, श्री दुर्गा सेवक संघ, श्री बाला जी सेवा परिवार, श्री इच्छापूर्ण बाला जी ट्रस्ट, इस्कॉन लुधियाना, लाइव ज़िन्दगी फाउंडेशन आदि संस्थाओ से जुड़े अशोक भारती की पूजनीय माता श्री मति कांता रानी जी का 5 फरवरी को निधन हो गया था। उनकी श्रद्धांजलि सभा व रसम किरया आज 16 फरवरी को डिवीजन नंबर 3 के नजदीक स्थित प्राचीन गौशाला के अभिषेक हाल में दोपहर 2 से 3 बजे तक होगी।
मां की कमी तो कोई भी पूरी नहीं कर सकता लेकिन बेबसी और दुःख के इस समय में हम भी अशोक भारती जी के साथ हैं। उनके इस दुःख में हम सभी भी शामिल हैं।