Sunday, 23 February 2025

शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से बचा जा सकता है रेडिएशन के कहर से

Sent by Writer Krishna Goyal on the eve of MahaShivratri   16th February 2025 at 21:14 WhatsApp

जानीमानी लेखिका कृष्णा गोयल  ने बताए हैं गहरे रहस्य 


पंचकूला
: 23 फरवरी 2025: (कृष्णा गोयल//आराधना टाईम्ज़ डेस्क )::

पारद से बने शिवलिंग पर दूध और पानी मिलाकर कच्ची लस्सी चढ़ाने  से जो प्रतिक्रिया होती है वह हमको अल्ट्रावायलेट किरणों के हानिकारक प्रभाव से बचाती है।  इसीलिए शिवलिंग पर चढ़ाए हुए जल को लांघते नही है। जल चढ़ाने के बाद आधी परिक्रमा ही की जाती है। जिस नाली में से चढ़ाया हुआ जल बहता है, उधर माथा टेक कर फिर वापिस आ कर बाकी की परिक्रमा पूरी करते हैं। 

खगोलीय तथ्य:

यह तो हम सब जानते हैं कि 23 मार्च के आस पास दिन-रात बराबर होते हैं क्योंकि 23 मार्च को पृथ्वी भूमध्य रेखा पर आ जाती है और इस समय सूर्य की सीधी किरणे पृथ्वी पर पड़ती हैं।  शिवरात्रि से 15-20 दिनों के बाद पृथ्वी ठीक भूमध्य रेखा पर होती है, जैसे जैसे पृथ्वी भूमध्य रेखा की ओर  बढ़ती है UV किरणों से होने वाला किरणपात बढ़ने लगता है जो जनजीवन के लिए अच्छा नहीं होता। 

यह किरणपात (रेडिएशन) शिवरात्रि को शुरू हो जाता है, जो लोगों के शरीर को अंदर से और बाहर से जला देता है जिस से लोगों को बुखार, जुकाम, अनपच की शिकायत होने लगती है। वास्तव में यह सब सूर्य की बाह्य लपटों से होने वाले किरणपात (रेडिएशन) के कारण होता है। पारद से बने शिवलिंग पर दूध मिला पानी चढ़ाने से जो रासायनिक क्रिया होती है उससे वातावरण में UV किरणपात का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है। इस किरणपात को हमारे ऋषि मुनियों ने जाना, समझा और हमारे लिए कुछ नियम बना दिए जिससे हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख सकें।

शास्त्रों में कहा गया हैब्रह्माण्ड़ेयस्ति यत्किंचित् पिण्ड़ेप्यस्ति सर्वथा।

ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु किसी-न-किसी रूप में मानव पिण्ड में विद्यमान है। इसीलिये मानव शरीर को दुर्लभ बतलाया गया है जिसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य ही नहीं अपितु हमारा धर्म है जिस के लिए जो नियम बनाए उनको त्योहारों से जोड़ दिया गया ताकि लोग इस घटनाचक्र को भूल न जाएं और धर्म के साथ भी जोड़ दिया गया ताकि लोग श्रद्धा से उनका पालन करें।

शिवलिंग पर दूध की आस्था भरी तस्वीरें पूरे ध्यान से देखते हुए मनन करें तो आपको हिन्दू समाज के रीतिरिवाजों के मिथक कहे जाने स्वयं भी समझ आने लगेंगें। मिथक कहे पर लेखिका कृष्णा गोयल ने एक विशेष किताब लिखी जो हर बात  तथ्यों सहित जवाब भी देती है। इसी मुद्दे पर अन्य बौद्धिक क्षेत्रों में भी विचार विमर्श जारी है। इन क्षेत्रों में चल रहे सक्रिय विचार विमर्श में जो लोग रूचि ले रहे हैं उनमें से गैर हिन्दू भी शामिल हैं। संकेतक तस्वीरें यहाँ भी दी गई हैं। 

इसके साथ ही एक बात और भी कि आक, धतूरा, भांग और बिल्वपत्र जो शिवलिंग पर चढ़ाए जाते  हैं हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए औषधियां है। आक के फूल की डोडी खाने से उल्टियां वगैरह रुक जाती हैं। धतूरे के औषधि रूप से  बाहरी त्वचा की समस्या दूर होती है जबकि सही मात्रा में भांग पीने से हमारे अंदरूनी प्रणाली पर रेडिएशन के प्रभाव से पड़ी दरारें ठीक होती हैं, इन्हीं दरारों के कारण पेट दर्द व हाजमे की परेशानियां होती हैं। बिल्वपत्र पर चंदन का लेप करके शिवलिंग को ढका जाना पावन समझा जाता है जो ये संकेत देता है कि इन दिनों यदि हम चंदन का लेप करके बिल्वपत्र से सिर ढक  कर गर्म धूप में भी निकलते हैं तो  UV किरणों के दुष्प्रभाव से बचाव किया जा सकता है। पुरातन काल में लिखने की विधि विकसित न होने के कारण ये सारा ज्ञान  सांकेतिक भाषा में था और जुबानी ही आगे बढ़ाया जाता था जो चिरकाल से समाप्त प्राय: हो गया है। इसलिए इस दुर्लभ ज्ञान की खोज और प्रसार बहुत आवश्यक है। 

सुश्री कृष्ण गोयल की एक विशेष खोजपूर्ण रचना आप आराधना टाईम्ज़ में पढ़ ही रहे हैं। भविष्य में हमारा प्रयास रहेगा कि ऐसी सामग्री आप तक पहुँचती रहे।  हिन्दू मिथक के वैज्ञानिक पहलुओं पर आई इस विशेष पुस्तक पर आधारित यह विशेष पोस्ट आप सभी तक पहुंचनी ज़रूरी भी है। 

हिन्दू रीति रिवाजों को मिथक कहे जाने के विरोध में सुश्री कृष्ण गोयल ने तकरीबन हर संशय को दूर करने की कोशिश की है। जिस जिस बात पर आशंका की जाती है हर उस बात का जवाब वैज्ञानिक पहलु से देने का प्रयास किया है। 

ये भी सभी को ज्ञात है कि हमारे 12 महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंग एक ही लाइन में एक ही ऊंचाई पर स्थापित किए गए हैं। कदाचित हमारे पूर्वजों को यह ज्ञान था कि इस जगह पर यूवी किरणों का दुष्प्रभाव अधिकतम हो सकता है। ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए लोग देश के  सभी भागों से आते हैं, अभिषेक करते हैं और ज्योतिर्लिंग पर कच्ची लस्सी चढ़ाते हैं, जिस से यूवी किरणों का दुष्प्रभाव शांत रहता है। दुनिया में सभी कहीं हमने ज्वालामुखी फटते हुए सुने हैं, परंतु भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ। जिस जगह पर रेडिएशन ज्यादा हो जाती है और पृथ्वी भी यदि उसी जगह भौगोलिक कारणों से ज्यादा गर्म है तो लावा फटना शुरू हो जाता है। परंतु भारत में ऐसी जगह पर वातावरण को  समय अनुसार शांत कर दिया  जाता है (पारद के बने ज्योतिर्लिंग पर कच्ची लस्सी चढ़ाने की क्रिया से), इसी लिए भारत में ज्वालामुखी आमतौर पर चिंताजनक हालात तक नहीं फटे।

पाश्चात्य प्रभाव में आकर हमारे उच्च शिक्षित वर्ग में से कुछ लोग इन क्रियाओं को रूढ़िवादी कहने लगे हैं, जबकि ऐसा करने से पहले हमको हमारे पूर्वजों की बुद्धिमता से मार्गदर्शन को धन्यवाद देना चाहिए।

गौरतलब है कि दुष्प्रभाव वाली यूवी किरणों का प्रभाव जो अमावस्या (शिवरात्रि) को शुरू होता है वह पूर्णिमा तक उच्चतम होता है, इसी लिए शिवरात्रि के बाद आने वाली पूर्णिमा को हम होली के रूप में मनाते है (इन दिनों को जलते बलते दिन कहा जाता है) जब अबीर उड़ाने और एक दूसरे पर अबीर लगाने की प्रथा है। अबीर उड़ाने से वातावरण का प्रकोप कम होता है और चेहरे पर लगने से जलन दूर होती है। 

आजकल अबीर का स्थान घटिया किस्म के गुलाल ने ले लिया है जो स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता। पंजाब में होली के बाद बासडा भी तो मनाते हैं क्योंकि मीठा और तला हुआ भोजन खाने से शरीर की अंदर की प्रणाली में जो दरारें आ जाती हैं, उनकी मालिश हो जाती है और हम स्वस्थ रहते हैं। नमन है हमारे पूर्वजों की दार्शनिकता को जो ये जानते थे कि आने वाली पीढ़ियां शायद ये प्रभाव/दुष्प्रभाव को भूल न जाएं, इसी लिए इन खगोलीय घटनाचक्रों को त्योहारों का नाम दे दिया।

शिवरात्रि के पावन सुअवसर पर आप सभी इन रीति रिवाजों को गहराई से समझें और बेहद गंभीरता से इन्हें अपने जीवन में भी उतारें। आप देखेंगे कि आपको अपने जीवन में बहुत कुछ बदलता हुएभी महसूस होने लगेगा। तन को नै आभा मिलेगी हुए मन को एक नै शक्ति भी। आपका प्रभामंडल आपके आसपास के माहौल को भी प्रभावित करने लगेगा। मुसीबतों और कठिनाईओं के जो रूप सांप की तरह सामने आ कर दस्ते हुए से लगते हैं वे भी आपके मित्र बन जाएंगे। आपकी शक्ति बन जाएंगे।  

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नोट: यह रचना सुश्री कृष्ण गोयल की बहु चर्चित पुस्तक "हिंदू त्यौहार और विज्ञान" में भी संकलित है। 

Wednesday, 12 February 2025

सूर्य भी अपने परिवार के साथ अपनी आकाश गंगा के गिर्द चक्कर लगाता है

Writeup By Krishna Goyal on 12th February 2025 at 12:34 WhatsApp Regarding Kumbh Sankranti Panchkula

सूर्य के इस प्रवेश को अति उत्तम माना गया है

कुंभ संक्रांति के रहस्यों पर कृष्णा गोयल का विशेष आलेख 


पंचकूला:12 फरवरी 2025: (कृष्णा गोयल//आराधना टाईम्ज़ डेस्क)::

कुंभ संक्रांति शब्दार्थ: सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को सूर्य का दूसरी राशि में संक्रमण (जाना) कहते हैं! पृथ्वी सूर्य के गिर्द चक्कर लगाती है। इस घूमने को क्रांति कहते हैं। संक्रमण + क्रांति =संक्रांति।

सूर्य के इस प्रवेश (एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) का समय लगभग एक घंटा 49 मिनट होता है। प्रवेश के समय से कुछ घंटे पहले और  कुछ घंटे बाद के समय को पुण्यकाल कहा जाता है। इस समय में पूजा पाठ दान इत्यादि किया जाता है। इस समय के दौरान कोई सांसारिक/शुभ कार्य जैसे विवाह, ग्रह प्रवेश इत्यादि नही किया जाता। कुंभ संक्रांति का महत्व और कई दुसरे पहलुओं पर कृष्णा गोयल का विशेष आलेख जिसमें हैं कई जानकारियां 

पृथ्वी सूर्य के गिर्द चक्कर लगाती है। पृथ्वी के घूमने के पथ को क्रांतिवृत कहते हैं। खगोल के अध्ययन के लिए  इस परिधि को 12 भागों में बांट कर 12 राशियों का नाम दिया गया है। पृथ्वी जब एक राशि से दूसरी राशि में जाती है उसको सक्रांति कहते हैं। प्रत्येक राशि में पृथ्वी पर प्रभाव अलग-अलग होता है। उस प्रभाव को समझने के लिए क्रांतिवृत की 360 डिग्री को 12 से भाग करके हरेक राशि 30 डिग्री की मानी जाती है। प्रत्येक राशि का ब्रह्मांड में विशेष स्थान है। हम जानते हैं कि हरेक राशि 30 डिग्री की नही होती, थोड़ा कम या ज़्यादा डिग्री की होती है, परंतु अपनी सुविधा के लिए हम प्रत्येक राशि को 30 डिग्री का ही मान लेते हैं।

बात यह नही है कि सूर्य स्थाई है अपितु सूर्य भी अपने सूर्य परिवार के साथ अपनी आकाश गंगा (गैलेक्सी) के गिर्द चक्कर लगाता है। ऐसी लाखों आकाश गंगाएं आकाश में हैं। हमारी गैलेक्सी भी अपने परिवार के साथ धीरे-धीरे किसी बड़ी गैलेक्सी के गिर्द घूमती है। 

वर्ष के 365  दिन क्यों पृथ्वी का सूर्य के गिर्द चक्कर लगाने का पथ 360 degree है। पृथ्वी एक दिन में एक डिग्री चलती है। 360 degree 360 दिनों  में पूरे हो जाने चाहिए थे। परंतु जब तक पृथ्वी सूर्य के गिर्द 360 डिग्री का एक चक्कर लगाती है, सूर्य थोड़ा सा आगे खिसक जाता है। उस दूरी को पूरा करनें केलिए पृथ्वी को 5 दिन, 5 घंटे, 58 मिनट और 46 सेकिंड लगते है। इस लिए वर्ष के 360 दिन न होकर 365 दिन होते हैं। बाकी का समय चार वर्षों के बाद एक दिन के बराबर हो जाता है। इसलिए चार वर्षों के बाद फरवरी के महीने में एक दिन और जोड़ दिया जाता है। जिसको लीप ईयर की संज्ञा दी जाती है। (Leep का अर्थ है jump, भाव प्रत्येक चौथे वर्ष एक दिन jump हो जाता है, बढ़ जाता है।) जो बाकी के मिनट और सेकंड बच जाते हैं, वह 72 वर्ष के बाद एक दिन के बराबर हो जाता है, जिसकी गिनती हमारे कैलेंडर में नही आती। यही कारण है कि मकर संक्रति का दिन कुछ समय बाद बदल जाता है। कभी यह मकर सक्रांति 12 दिसंबर को होती थी।

खगोलीय घटनाओं का महत्व समझना तो दूर (कुछ विद्वानों को छोड़ कर) आम लोग इसके बारे जानते ही नहीं जब कि  पुरातन काल में हमारे घरों में यह ज्ञान आम था क्योंकि हमारी दादी ही बोल देती थी कि आज पुष्य नक्षत्र है, आज बच्चों को स्वर्णप्राशन (इम्युनिटी की आयुर्वेदिक बूंदे) पिला कर ले आओ"  या आज ये नक्षत्र है आज ये कम नहीं करना" इत्यादि! परंतु संयुक्त परिवार न  होने के कारण ये ज्ञान आगे नहीं बढ़ा।

इन घटनाओं का ज्ञान हमारे पूर्वजों ने हमें पर्व के रूप में सौंपा है ताकि पर्व के बहाने हम खगोलीय घटना चक्र को समझें और उसका लाभ उठा सकें।

आज 12 फरवरी 2025 को कुंभ संक्रांति है और पूर्णिमा भी है। पूर्णिमा और कुंभ संक्रांति एक ही दिन, ये पर्व 144 वर्ष के बाद आया है

जैसे कि पहले कहा गया है सूर्य जिस मार्ग पर घूमता है उसको क्रांति पथ कहते हैं। संक्रमण का अर्थ है एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवर्तित। सूर्य मकर राशि से कुंभ राशि में प्रवेश कर रहा है। इस प्रवेश को मकर से कुंभ में सूर्य का संक्रमण कहा जाता है। इस लिए सांक+राँती ( संक्र मण + क्रांति) (संक्र+क्रांति)

संक्रांति।सूर्य के इस प्रवेश को अति उत्तम माना गया है। 

प्रवेश के समय को पुण्यकाल कहा जाता है। ये लगभग चार घंटे का होता है। 

पुण्य काल  में पाठ पूजा की जाती है, दान किया जाता है जिस से सब कष्ट दूर होते हैं।  व्रत पर्व विवरण - संत रविदास जयंती, ललिता जयंती, माघ पूर्णिमा, विष्णुपदी संक्रांति ( आज संक्रांति पुण्यकाल दोपहर 12:41 से सूर्यास्त तक)*

पुण्यकाल के दौरान शारीरिक कष्ट दूर करने के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप करें 108 बार, इच्छापूर्ति के लिए गायत्री मंत्र , स्वास्थ्य के लिए ॐ नम: शिवाय या ॐ का जप करें या गुरु चरणों में ध्यान लगाते  हुए गुरबाणी का जाप करें तदोपरांत गुड और गेहूं का दान करें।

इस पर्व पर ईश्वर से प्रार्थना है कि ईश्वर की कृपा से आपके सब कष्ट दूर हों, मनोकामना की पूर्ति हो, ढेरों खुशियां मिलें।   ***

लेखिका कृष्णा गोयल

पूर्व जॉइंट रजिस्ट्रार

12.2.2025

Saturday, 14 December 2024

डा. मीना शर्मा की देखरेख में एक दिवसीय ध्यान शिविर 22 दिसम्बर को

From Dr. Meena Sharma on Saturday 14th December 2024 at 12:38 Regarding Meditation

 स्वस्थ और शांतिपूर्ण लाईफस्टाईल के विशेष गुर सिखाए जाएंगे 


मोहाली:14 दिसंबर 2024: (कार्तिका कल्याणी सिंह//आराधना टाईम्ज़ डेस्क)::

तंत्र मंत्र और ज्योतिष को लेकर जो जो बातें और कहानियां हमें सुनने में आती रहती हैं उन्हें देख सुन कर मुख्य तौर पर कुछ ऐसे वर्ग पैदा हुए हैं जिनका विश्वास न पूरी तरह हां में होता है और न ही न में। इन्हीं में से एक वर्ग ऐसा है जो इन बातों पर खुले तौर पर तो विश्वास नहीं करता लेकिन लुक छिप कर किसी न किसी तांत्रिक या ज्योतिषी के पास पहुंचता भी है और उनसे सलाह मशवरा भी करता है। ऐसी लोगों में सियासी लोग भी अक्सर शामिल रहते हैं। 

इसी तरह इस विद्या को मानने वाले लोग भी बहुत हैं लेकिन उनका भी कहना होता है सच्ची बात तो भागवान ही जाने। इनकी आस्था इस विद्या में होती तो है लेकिन साथ ही यह भी कि सच्चा ज्योतिषी यही तक नहीं मिला। कुल मिलकर समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी भर्मित है। दुविधा में है। उसे समझ नहीं आता कि कर्म बड़ा है या किस्मत की लकीरें?

एक वर्ग तकदीर को नहीं तदबीर को ही अंतिम सत्य  मानता है जबकि बहुत बारे ऐसा भी साबित हुआ है कि तदबीर, कोशिश और स्ट्रगल भी कई बार तकदीर की लकीरों का ही हिस्सा होते हैं। इस दुविधापूर्ण माहौल के बावजूद कुछ ऐसे विशेषज्ञ सामने आए हैं जो इस दिशा में मिल रही चुनौतियों को स्वीकार करते हुए इसका पूरा मर्म सामने रखते हैं। वे ज्योतिष  ज्ञान के आधार पर ही जीवन की एक एक बात को खोल कर सामने रख देते हैं। देख सुन कर हैरानी भी  ऐसा कुछ बहुत बार सामने है। 

अब तो ज्योतिष विद्या की शिक्षा बाकयदा कालेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिल हो चुकी है। इस विषय पर बाकायदा सेमिनार होते हैं। आयोजन होते हैं। जानेमाने मीडिया मंचों  चर्चा होती है। इस तरह के आयोजन तकरीबन हर शहर में बढ़ रहे हैं।  ज्योतिष के साथ साथ ध्यान की विधियां और इनकी ट्रेनिंग भी बढ़ रही है। जिन लोगों पर अब नींद की गोलियां भी बेअसर हो रही हैं  वे अब ध्यान की शरण में ही आ रहे हैं। जो लोग तरह तरह के नशे करके थक चुके हैं वे भी अब धर्म और मेडिटेशन में ही शांति की तलाश कर रहे हैं और उनकी तलाश खाली भी नहीं जाती। ओशो के कैंप, आर्ट ऑफ़ लिविंग, विपस्सना या  विपश्यना के शिविर और आनंदमार्ग जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन इस दिशा में बहुत कुछ कर रहे हैं। 

इस संबंध में इस क्षेत्र की विशेषज्ञ डाक्टर मीना शर्मा ने कहा की वह मानवता को बचने के लिए इस संबंध में पहले ही बहुत से प्रयास कर चुकी हैं। उन्होंने ने कहा कि इसी सिलसिले में इसी तरह का एक और विशेष शिविर मोहाली में भी लग रहा है रविवार 22 दिसंबर 2024 को। आज के तनावपूर्ण हालात में यही लाईफ स्टाईल बचा है जो लोगों को शांतिपूर्ण जीवन जीने का सुरक्षित रास्ता बता रहा है। जीवन को संतुलित और शांति से परिपूर्ण बनाने का अब यही एक सशक्त माध्यम है। आज के तनावपूर्ण जीवन में, मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, यह एक दिवसीय ध्यान शिविर आयोजित किया जा रहा है।

इस शिविर का स्थान होगा-श्री वेंकटेश मन्दिर, बांके बिहारी धाम, TDI , सेक्टर 74A, मोहाली। इस शिविर की तारीख रहेगी-22 दिसंबर 2024 और समय होगा सुबह 10 से बाद दोपहर 2 बजे तक। 

इस शिविर में प्रमुख गतिविधियाँ इस प्रकार रहेंगी:

* ध्यान सत्र (Meditation Session) 

* श्वसन तकनीक (Breathing Techniques)

* माइंडफुलनेस अभ्यास (Mindfulness Practice)

शिविर में जाने के इच्छुक रजिस्ट्रेशन और अधिक जानकारी के लिए संपर्क कर सकते हैं डाक्टर मीना शर्मा से उनके मोबाईल नंबर  +91 96460-05543

कैंप के आयोजक हैं: Acupoint Wellness Centre, Gobind Enclave Greens Sector 117, Mohali

Friday, 4 October 2024

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ब्रह्माकुमारी वैश्विक शिखर सम्मेलन में भाग लिया

राष्ट्रपति सचिवालय//Azadi ka Amrit Mahotsavg20-India-2023//Posted on: 04th October 2024 at 11:36 AM by PIB Delhi

'स्वच्छ और स्वस्थ समाज के लिए आध्यात्मिकता' विषय पर माउंटआबू में विशेष आयोजन 


नई दिल्ली: 04 अक्टूबर 2024:(PIB Delhi//आराधना टाईम्ज़ डेस्क)::

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (4 अक्टूबर, 2024) राजस्थान के माउंट आबू में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 'स्वच्छ और स्वस्थ समाज के लिए आध्यात्मिकता' पर एक वैश्विक शिखर सम्मेलन में भाग लिया। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने ब्रह्माकुमारी वैश्विक शिखर सम्मेलन में भाग लिया

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि आध्यात्मिकता का मतलब धार्मिक होना या सांसारिक गतिविधियों को त्यागना नहीं है। आध्यात्मिकता का मतलब अपने भीतर की शक्ति को पहचानना और अपने आचरण व विचारों में पवित्रता लाना है। विचारों और कार्यों में पवित्रता जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन और शांति लाने का मार्ग है। यह एक स्वस्थ और स्वच्छ समाज के निर्माण के लिए भी आवश्यक है।

राष्ट्रपति ने कहा कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वच्छता एक स्वस्थ जीवन की कुंजी है। हमें केवल बाहरी स्वच्छता पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी स्वच्छ होना चाहिए। समग्र स्वास्थ्य स्वच्छता की मानसिकता पर आधारित है। भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य सही सोच पर निर्भर करता है क्योंकि विचार ही शब्दों और व्यवहार का रूप लेते हैं। दूसरों के प्रति कोई राय बनाने से पहले, हमें अपने अन्तर्मन में झांकना चाहिए। जब हम किसी दूसरे की परिस्थिति में अपने आप को रखकर देखेंगे, तब सही राय बना पाएंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि आध्यात्मिकता केवल व्यक्तिगत विकास का साधन ही नहीं है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का भी एक तरीका है। जब हम अपनी आंतरिक शुद्धता को पहचान पाएंगे, तभी हम एक स्वस्थ और शांतिपूर्ण समाज की स्थापना में योगदान दे पाएंगे। आध्यात्मिकता, समाज और धरती से जुड़े अनेक मुद्दों जैसे कि सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण एवं सामाजिक न्याय को भी शक्ति प्रदान करती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि भौतिकता हमें क्षण भर की शारीरिक और मानसिक संतुष्टि देती है, जिसे हम असली खुशी समझकर उसके मोह में पड़ जाते हैं। यह मोह हमारी असंतुष्टि और दुख का कारण बन जाता है। दूसरी ओर, आध्यात्मिकता हमें खुद को जानने, अपने अन्तर्मन को पहचानने की सुविधा देती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि आज की दुनिया में, शांति व एकता की महत्ता और अधिक बढ़ गई है। जब हम शांत होते हैं, तभी हम दूसरों के प्रति सहानुभूति और प्रेम महसूस कर सकते हैं। योग और ब्रह्माकुमारी जैसे संस्थानों की योग और आध्यात्म की शिक्षा हमें आंतरिक शांति का अनुभव कराती हैं। यह शांति न केवल हमारे अंदर बल्कि पूरे समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।

राष्ट्रपति का पूरा भाषण पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

***//एमजी/आरपीएम/केसी/एसके//(रिलीज़ आईडी: 2062001)

Sunday, 15 September 2024

क्या ज्योतिष से रोगों का इलाज संभव है?

Sunday 14th September 2024 at 5:15 PM 

भारत में कहां कहां होता है यह इलाज संभव है?

चंडीगढ़: 15 सितम्बर 2024: (मीडिया लिंक//आराधना टाईम्ज़ डेस्क)::

क्या ज्योतिष से रोगों का इलाज संभव है?---क्या इसके वैज्ञानिक आधार मौजूद हैं? यदि ऐसा  तो भारत और दुनिया में इस तरह से कहां कहां इलाज होते हैं? क्या ऐसे स्थानों और लोगों का पता चल सकता है? ऐसे सवाल अक्सर वे लोग जिनके ज्योतिष अभी भी अज्ञात है। 

वास्तव में ज्योतिष के माध्यम से रोगों का इलाज करना लंबे समय से एक विवादास्पद और चर्चित विषय रहा है। यूं भी कई मामलों पर  ज्योतिष को लेकर विभिन्न मत हैं और इसका वैज्ञानिक आधार पर समर्थन करना काफी चुनौतीपूर्ण है। हालाँकि कई जगहों पर मेडिसिन के साथ साथ ज्योतिष विद्या से इलाज के अलग सेक्शन भी बने हुए हैं। निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयास किया जा सकता है। 

ज्योतिष और रोगों का इलाज  बहु संख्यक लोगों के लिए भले ही कुछ अजीब सी बात हो लेकिन जिन लोगों की इस ज्ञान विज्ञान में आस्था है और जिन लोगों को ज्योतिष का ज्ञान है वे इसे पूरी तरह से परफेक्ट मानते हैं। ज्योतिष विज्ञान रोग की पड़ताल करते हुए कई बार पिछले जन्मों तक जाता है। आधुनिक विज्ञान इसे पारिवारिक पृष्ठभूमि के हिसाब से देखते हैं। उनका मानना है कि यह बीमारी मां या पिता के जीन से आई है।  इस सिलसिले  करते करते कई बार कई पीढ़ियों तक के स्वास्थ्य को खंगाल लिया जाता है। थैलेसीमिया जैसे रोग जैनेटिक रोग ही गिने जाते हैं। शायद यह कारण भी उन कारणों में से एक हो जिनके अंतर्गत नज़दीक के रिश्तों mein शादी विवाद निषिद्ध माना  जाता था। लोग शादी का संबंध जोड़ते समय माता और पिता की तरफ से सात पुश्तों को छोड़ना ही उचित समझते थे। शायद इसी वजह से गाँव की लड़की को सगी बहिन की तरह सम्मान दिया जाता था। उसके साथ शादी की बता सोची भी नहीं  जाती थी।  

ज्योतिष का सिद्धांत कई अन्य पहलुओं से भी बहुत गहरा है। ज्योतिष में माना जाता है कि ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति हमारे जीवन और स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है। ज्योतिषी ग्रहों की स्थिति और कुंडली का विश्लेषण कर यह बताने का प्रयास करते हैं कि कौन से ग्रह या नक्षत्र आपके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं और इसके उपाय सुझाते हैं।

अब ज्योतिष के मुताबिक सुझाए जाते उपचार के तरीके भी तो विशेष हैं। यह बात अलग है की ज्योतिष में आस्था न रखने वालों को यह तौर तरीके भी अजीब लग सकते हैं। 

इन्हीं में से एक तरीका है रत्न धारण करना। रत्न धारण करना करना तो होता है लेकिन इसकी जानकारी सभी को नहीं होता। कुछ अध्सीखे लोग कई बार गलत रत्न धारण करवा देते हैं और अपनी जेब गर्म करने तक ही मतलब रखते हैं। इसलिए  करते समय अच्छा जानकार ज्योतिष कौन है इसका पता लगाना बहुत ज़रूरी है। 

इसी मकसद के लिए एक और तरीका होता है पूजा और अनुष्ठान करना। इसके भी कई फायदे होते हैं लेकिन इसका सही तरीका भी किसी अच्छे जानकार से पूछना सही रहता है। पूजा और अनुष्ठान पुराने वक्तों में भी होते थे और आज भी होते हैं। 

किसी विशेष मकसद और इलाज के लिए विशेष दान देना भी एक अच्छा जरिया माना जाता है। कुछ विशेष चीज़ों का दान कुछ विशेष  विशेष समय पर विशेष स्थानों पर हो तो उससे भी फायदा मिलता है। इस तरह के दान का भी एक विज्ञान और विधान है। उसे समझे बिना ज़ेह सब शायद फायदा न दे सके। 

विशेष मंत्रों का जाप करना तो कई बार तुरंत फायदा देने वाला तरीका बन जाता है। मंत्र जाप इसी विधि विधान में आ जाते हैं। जिनक उच्चारण, जिनका समय और आवाज़ या धुन सब वैज्ञानिक हिसाब से ही होते हैं।  इनका असर भी गहरायी से होता है।  

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक प्रमाण शायद बहुत कुछ साबित न भी कर सके इसके बावजूद इसमें लोगों की आस्था लगातार बढ़ रही है। जो लोग इस पर यकीन करते हैं वे करते ही हैं। वर्तमान में, ज्योतिष से रोगों का इलाज करने के वैज्ञानिक प्रमाण बहुत कम हैं लेकिन फिर भी इसमें आस्था और विश्वास लगातार बढ़ रहा है। 

ज्योतिष के सिद्धांत और इसके प्रभावों का वैज्ञानिक परीक्षण करना हालांकि कठिन भी है क्योंकि यह बहुत से व्यक्तिगत और पर्यावरणीय कारकों पर निर्भर करता है। ज्योतिष पर किए गए कई वैज्ञानिक अध्ययन यह साबित करने में असफल रहे हैं कि ग्रहों की स्थिति और मानव स्वास्थ्य के बीच कोई स्पष्ट संबंध है। 

इसके इलावा प्लेसिबो प्रभाव भी बहुत काम करता है। कुछ मामलों में, लोगों को ज्योतिषीय उपाय करने से मनोवैज्ञानिक लाभ हो सकता है। इसे प्लेसिबो प्रभाव कहा जाता है, जहां व्यक्ति की आस्था और विश्वास उसके स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।

देश और दुनिया में ज्योतिष आधारित उपचार कहां कहां होते हैं? इस सवाल को भी अक्सर बहुत पूछा जाता है। यह सवाल ज़रुरी भी है। भारत में ज्योतिष का एक लंबा इतिहास है और यह व्यापक रूप से प्रचलित है। कई लोग स्वास्थ्य समस्याओं के लिए ज्योतिषीय उपायों का सहारा लेते हैं। विशेष रूप से दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में ज्योतिष आधारित स्वास्थ्य क्लीनिक और उपचार केंद्र होते हैं।

उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों से घिरा हुआ हिमाचल प्रदेश भी इस मामले में बहुत अहम है। हिमाचल के धर्मशाला से आठ किलोमीत ऊपर पहाड़ की तरफ जाएं तो वहां दलाईलामा का मुख्यालय है। वहां का माहौल भी बहुत ही धार्मिक सा महसूस होने लगता है। 

इसे मैक्लोडगंज के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर तिब्बती समुदाय का मन्दिर भी है और अस्पताल भी है। इसी अस्पताल में तकरीबन उन सभी बिमारियों का इलाज किया जाता है जिन के मामले में आधुनिकचिकित्सा पद्धति नाकाम सिद्ध होती है। आम बिमारियों से लेकर कैंसर तक का इलाज यहाँ सफलता से किया जाता है। 

अन्य देशों की बात करें तो नेपाल में भी ज्योतिष और तंत्र-मंत्र का प्रचलन है। यहां पर बहुत सी बिमारियों को स्थानीय ढंग तरीकों से ठीक कर दिया जाता है। तिब्बती ज्योतिष और चिकित्सा का अपना अलग महत्व है। इसकी चर्चा हम ऊपर भी कर आए हैं। 

इसके साथ यह भी सत्य है कि पश्चिमी देश भी इस मामले में कम नहीं हैं। कुछ पश्चिमी देशों में भी लोग ज्योतिष में रुचि रखते हैं, लेकिन यह मुख्यधारा वाली चिकित्सा का हिस्सा कभी नहीं बने है। इस तरह की इलाज पद्धति से लोग ठीक भी होते हैं लेकिन इसके बावजूद दुनिया के सामने नहीं आते। 

निष्कर्ष यह भी निकलता है कि ज्योतिष से इलाज के केंद्र कई जगहों पर मौजूद हैं। ज्योतिष से रोगों का इलाज करना एक विवादास्पद और व्यक्तिगत विश्वास का विषय है। इसके वैज्ञानिक प्रमाण बहुत सीमित हैं और आधुनिक चिकित्सा में इसका समर्थन नहीं किया जाता है। हालांकि, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह कई समाजों में प्रचलित है। 

आखिर में एक विशेष सलाह भी ज़रूरी है कि ज्योतिषीय उपचार करते समय सावधानी बरतनी चाहिए और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के लिए हमेशा योग्य चिकित्सा विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

Saturday, 13 July 2024

किशोर अवस्था और बढती उम्र में सुंदरता व फिटनेस का ध्यान कैसे हो

 मेडिटेशन से भी मिलती है इस मकसद में अद्भुत सहायता 

नियमित योग साधना और मेडिटेशन से  अनगिनत फायदे 

मोहाली: 12 जुलाई 2024: (कार्तिका कल्याणी सिंह//आराधना टाईम्ज़ डेस्क)::

बचपन में रखी जीवन की नींव वास्तव में किशोरावस्था में पूरी तरह मज़बूत भी होती है और विकसित भी होती है। इसी का फैदा बढ़ती उम्र में भी मिलने लगता है। हालांकि यह काम सहज नहीं होता लेकिन इसके ढंग तरीके इसे कुछ आसान ज़रूर बना देते हैं। किशोर अवस्था और बढ़ती उम्र में सुंदरता और फिटनेस को बनाए रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण तरीके हैं जिनका विवरण निस्के दिया जा रहा है। 

नियमित व्यायाम: सबसे पहले नियमित शारीरिक गतिविधि करना फिट रहने और स्वस्थ रहने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। आप किसी भी खेल या व्यायाम जैसे कि जॉगिंग, स्विमिंग, योग, या जिम जाकर अपने शारीर को स्वस्थ रख सकते हैं। इसे नियमित जारी रखना बहुत आवश्यक है। ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए कि कभी कर लिया और कभी छोड़ दिया। सही समय सुबह सुबह पेट साफ़ करने के बाद और भोजन से दो घंटे पहले का हो तो ज़्यादा अच्छा रहता है। 

सही आहार: खानपान में सही आहार का पता होना बहुत ही आवश्यक है। स्वस्थ और बिल्कुल ठीक आहार लेना बहुत जरूरी है। आपको अपनी डाइट में पूरे अनाज, फल, सब्जियां, प्रोटीन, और पर्याप्त पानी शामिल करना चाहिए। तला हुआ और अधिक मसालेदार भोजन से बचें। इनको समय के मुताबिक और मौसम के मुताबिक खाना भी बहुत अच्छा रहता है। 

नींद की देरी से बचें: अपने सोने के समय पर्याप्त नींद लेना भी आपके शारीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। सोने के मामले में देरी या लापरवाही आम सी बात हो गई है। युवा और बढ़ती उम्र के व्यक्ति को दिन में कम से कम 7-8 घंटे की नींद की आवश्यकता होती है। नींद के दौरान ही शरीर को पर्याप्त ऊर्जा और रख रखाव की सर्विस मिल पाती है। इस लिए नींद के मामले में कोई कोताही नहीं। 

संतुलित जीवनशैली: संतुलित जीवनशैली आज के व्यस्त युग में एक सपना होइ जा रही है। व्यस्त रहना तो चलो एक अलग बात हो सकती है लेकिन आजकल व्यस्त दिखना भी एक फैशन हो गया है। अधिक स्क्रीन टाइम से बचें, और नियमित अंतराल में अपने शारीर को विश्राम और पुनर्जीवन दें। ज़ाहि आदत उन्हें गलत संगत और नशे जैसी बुराई की तरफ भी ले जाती है। साथ ही, तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन भी न करें।

स्वास्थ्य की देखभाल: हैल्थ के मामले में अपने नियमित चेकअप और आपके स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी बहुत ज़रूरी है। अपने डॉक्टर से सलाह लें और किसी भी स्वास्थ्य समस्या को नज़र अंदाज़ न करें। आपका तन, मन, दिमाग इन सभी को एक नियमित ध्यान की ज़रूरत है। अच्छी हैल्थ से ही अच्छी फिटनेश और अच्छी सुंदरता संभव है। 

बस यह छोटे छोटे टिप्स हैं, गुर हैं, तरीके हैं जिन्हें अपना कर आप हैल्थ के सभी रहस्यों को समझने की कोशिश कर सकते हैं। इन सरल उपायों को अपनाकर आप अपनी किशोर और बढ़ती उम्र में सुंदरता और फिटनेस का ध्यान रख सकते हैं। यह सब आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करेंगे। आपको यह पोस्ट कैसी लगी इस पर भी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार तो बानी ही रहेगी। 

Friday, 26 April 2024

ब्रह्मांड शून्यता--एस्ट्रो विज्ञान--ज्योतिष-तंत्र और सुपरमैन

 Friday 25th April 2024 at 6:45 PM

वास्तविक जीवन में एस्ट्रो साइंस के प्रभाव पर एक फैंटेसी फिक्शन जैसी हकीकत 

उस क्षितिज से लौट कर जहां कल्पना और हकीकत मिलती हुई महसूस होती हैं:


शुक्रवार26 अप्रैल 2024: (आराधना टाईम्ज़ डेस्क):: 
इस पोस्ट को समझना शायद आसान न लगे। शायद इसका मर्म और संदेश भी सभी को समझ न  आ सके। इसमें जिस हकीकत की बात की गई है वो शायद कुछ लोग ही समझ पाएंगे लेकिन जिस कल्पना की बात भी दर्ज है उसे भी शायद बहुत से लोग सभी न समझ पाएं।  आशंकाओं के बावजूद आइए बात तो शुरू करते ही हैं। आपके अंदर मौजूद चेतना आपका मार्गर्दर्शन करेगी ही। 

ब्रह्मांड शून्यता का एक विशाल, अनंत विस्तार था, जो उस समय एक तरह से किसी भी प्रकार के जीवन या चेतना से रहित था।  संभावनाओं के बावजूद यह ठहराव की एक सतत स्थिति थी, शून्यता के अलावा कुछ भी नहीं का एक कालातीत अस्तित्व। कुछ ऐसा ही महसूस होने लगता है अगर मेडिटेशन करते करते पीछे चले जाओ तो। इससे सबंधित किताबी ज्ञान भी सबंधित माहौल जैसी तस्वीरें हमारी कल्पना में लाने लगता। है 

यहां कुछ और कहना ज़रूरी है कि उस  माहौल में उदासी कुछ ज़्यादा थी और फिर, एक चिंगारी भी थी।  एक छोटी, महत्वहीन चिंगारी जिसने ब्रह्मांडीय संलयन को प्रज्वलित किया, घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू की जो अस्तित्व को जन्म देगी जैसा कि हम जानते हैं। यह सिलसिला आज भी जारी है। आकाशगंगाएँ, तारे, ग्रह और चंद्रमा अस्तित्व में आए। यह सिलसिला भी जारी है। उनके आकर्षण और प्रतिकर्षण का जटिल नृत्य ब्रह्मांडीय कैनवास पर जीवन की एक टेपेस्ट्री बुन रहा था। इसी में निहित थे शिव  शक्ति के  रहस्य  जी  अतिआधुनिक युग में भी किस्मत से ही समझ आते हैं। 

बहुत ही अद्भुत सा दृश्य उभरता है। आशा, निराशा, हिम्मत और उत्साह से भरी आशाएं बलवती होती लगीं थीं। इन अनगिनत दुनियाओं में से एक पर, एक अनाम महासागर के अलौकिक समुद्र में तैरते हुए, जीवन का एक छोटा सा कण था. यह एक एकल कोशिका वाला जीव था, जो बमुश्किल जीवित था, अपने चारों ओर मौजूद कठोर तत्वों के खिलाफ जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहा था। समय बीतता गया और यह छोटा प्राणी विकसित हुआ. इसका आकार और जटिलता बढ़ती गई, नए अंगों और प्रणालियों का विकास हुआ जिसने इसे अपने पर्यावरण के अनुकूल होने की अनुमति दी। आख़िरकार, यह एक मछली बन गई, जो पानी में तैर रही थी, भोजन की तलाश कर रही थी और शिकारियों से बच रही थी। यह भी जीवन का ही रूप था जो पहले से बहुत अधिक अच्छा और खूबसूरत था। माहौल भी बेहतर था। इसके बावजूद संघर्ष जारी था। अभी भी यह संघर्ष ज़िन्दगी के लिए जंग के एलान जैसा ही था।सावधानी और सतर्कता अब भी हर कदम पर थी। 

मीन राशि वालों के जीवन  में थोड़ा सा भी झांक कर देखें तो इस तरह के बहुत से दृश्य साकार होते से नज़र आने लगेंगे। वैसे हर राशि का स्वरुप और उसका स्वभाव उसकी प्रकृति के मुताबिक भी स्पष्ट होने लगेगा। थोड़ा और कुरेदा जाए तो सब कुछ स्पष्ट भी दिखने लगेगा। कुरेदना से मतलब कुछ और अधिक ध्यान देना ही था। यह नियम अन्य राशियों पर भी लागू होता है। जन्म की तारीख, दिन और समय बहुत मह्त्वपूण भूमिका निभाता है जीवन में। 

इसी से याद आ रहा है हिमाचल प्रदेश। हिमाचल प्रदेश में धर्मशाला जाएं तो करीब आठ दस किलोमीटर ऊपर स्थित है-मैक्लोडगंज- जहां तिब्बती समुदाय का मुख्यालय है। यहां ज्योतिष को आधार बना कर भी गंभीर बिमारियों का इलाज किया जाता है। इस संबंध में पूरा विवरण आप पढ़ सकते हैं इस लिंक को क्लिक कर के। 

प्रकृति की निकटता ही हमारे अतीत में थी और इसी निकटता से हमारा भविष्य संवर सकेगा।  हमारा शक्ति स्रोत भो तो यही है। बिलकुल उसी तरह जिस मछली से हुए शुभारंभ की हम बात कर रहे थे।  जैसे-जैसे उस आरंभिक मछली का विकास जारी रहा, वह बड़ी और अधिक बुद्धिमान होती गई। इसके अंग भी और विकसित होते चले गए। 

यह जीव अद्भुत भी रहा। ज्योतिष की दुनिया में आखरी और बारहवीं राशि होती है मीन। विकास के लिए लम्बे संघर्षों के बाद ही यह जीव तट पर भी चढ़ सका और पानी से परे की दुनिया का भी पता लगा सका।  अनगिनत पीढ़ियों से, यह प्राणी लगातार अनुकूलन और विकास करता रहा, अंततः एक मानव सदृश प्राणी बन गया। यह पहले आए किसी भी अन्य प्राणी से भिन्न प्राणियों की एक प्रजाति थी, जिनमें सोचने, महसूस करने और सृजन करने की क्षमता कमाल की थी। उन्होंने शहर बनाए, भाषाएँ विकसित कीं और कला का निर्माण किया। उन्होंने समय और स्थान के रहस्यों को उजागर करते हुए ब्रह्मांड के रहस्यों की भी अद्भुत खोज की। आज भी उस खोज का महत्व कम नहीं हुआ। आज भी उसे सहारा बना कर ही नई खोज का मॉडल बनता और विकसित होता जा रहा है। इसे एक दूरबीन की तरह मान कर भविष्य की तस्वीरें देखी जा सकती हैं। 

और फिर भी, उनकी सभी उपलब्धियों के बावजूद, भौतिक दुनिया पर उनकी मुहारत के बावजूद, अभी भी एक रहस्य था जो उनसे दूर था: यन्त्र मन्त्र तन्त्र का रहस्य। लंबे समय से भूली हुई भाषा में लिखे गए इन प्राचीन ग्रंथों में उनके दिमाग और आत्माओं की वास्तविक क्षमता को उजागर करने की कुंजी थी। इन रहस्यों के खुलते खुलते बहुत से रहस्य  खुलते जा रहे थे। कहा जाता है कि यंतर मंत्र में ब्रह्मांड का ज्ञान, सृजन और विनाश के रहस्य और वास्तविकता को आकार देने की शक्ति शामिल थी। 

पीढ़ियों से, विद्वानों ने प्राचीन चर्मपत्र को सुशोभित करने वाले गूढ़ प्रतीकों और जटिल पैटर्न को समझने की कोशिश की थी, लेकिन सभी प्रयास व्यर्थ रहे थे. ऐसा लगता था कि यन्त्र मन्त्र तन्त्र के भीतर निहित ज्ञान को केवल वही समझ सकता है जो अपनी शक्ति का उपयोग करने के लिए नियत था. और इसलिए, ग्रंथों को ताले और चाबी के नीचे रखा गया था, उनकी वास्तविक प्रकृति कुछ चुनिंदा लोगों को छोड़कर बाकी सभी से छिपी हुई थी। ऐसा करना आवश्यक भी था। 

इसके बावजूद जितना ज्ञान मानवजाति ने अर्जित कर लिया यह एक सौभाग्य  बेहद खतरनाक भी तो है। इसके परिणाम स्वरूप निकट भविष्य में तबाही का तांडव अपनी झलक अभी से दिखाने लगा है। दुनिया खुद को पतन के कगार पर महसूस कर रही है।  विनाशकारी घटनाओं की एक शृंखला इस ग्रह को विनाश के कगार पर ला रही है। फसलें बर्बाद हो गईं, शहर ढह गए और सभ्यता गुमनामी के कगार पर पहुंच गई ऐसा लगने लगा है। 

क्या कोई पीर पैगंबर बचा पाएगा इस धरती को पूर्ण विनाश से? हताशा भी है और गहरी निराशा  भी है। इस नाज़ुक दौर के बेहद संवेदनशील समय में सुना जाने लगा कि था कि एक विशेष चुना हुआ व्यक्ति, जिसे यंतर मंत्र तंत्र की शक्ति का उपयोग करना था, जिसे आप आधुनिक युग का कोई पीर, पैगंबर या अवतार कह सकते हैं.  अंततः खुद को प्रकट करके सामने लाने वाला है। यह एक बेहद संवेदनशील मोड़ होगा। एक नै करवट भी कह सकते हैं। बहुत से पापियों को सज़ा मिलेगी और बहुत से सतकर्मियों को भी बचाया भी जाएगा। 

इसी तरह के संगम युग वाले दौर में सभी पता चलेगा कि  कि वास्तविक जीवन में एस्ट्रो साइंस कैसे अपना प्रभाव सभी पर डालती है। ऐसे हालात में चुना हुआ व्यक्ति जिसका कल्पित नाम शक्तिमान रख लें  वह प्रकृतिक शक्ति और वैज़ान के बहुत से चमत्कार दिखाएगा। वह पूरी तरह से एक विनम्र व्यक्ति भी होगा लेकिन न्याय और अनुशासन के मामले में सख्त भी होगा। वह वास्तव में ज़हीन ही तो था। किसी छद्म वेश में छुपा हुआ सब देख रहा था। अपनी असली पहचान और नियति से वाकिफ होने के बावजूद अज्ञात की तरह था। वह वर्षों से आबादी के बीच रह रहा था। जैसे ही उसने  अपनी नई शक्तियों और जिम्मेदारियों के साथ आने के लिए संघर्ष किया, उसे  प्राचीन ग्रंथों में सांत्वना मिली, उनके पृष्ठों पर डालना और ब्रह्मांड के तरीकों को सीखना. उन्होंने पाया कि यंतर मंत्र तंत्र केवल रहस्यमय ज्ञान का संग्रह नहीं था, बल्कि एक जीवित, सांस लेने वाली इकाई थी जो उनके जैसे किसी व्यक्ति के आने का धैर्यपूर्वक इंतजार कर रही थी। दबे कुचले लोगों को एक सांत्वना भी मिली। 

दुनिया विनाश के कगार पर होने के कारण, उसे अर्थात शक्तिमान को पता था कि उसे तेजी से कार्य करना होगा। यंतर मंत्र की शक्ति का उपयोग करके, वह ग्रह के पतन के पाठ्यक्रम को उलटने और दुनिया में संतुलन बहाल करने में सक्षम था। उनके कार्यों ने अनगिनत लोगों की जान बचाई और शांति और समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत की। जैसे ही दुनिया ठीक होने लगी, उस सुपरमैन को पता चल गया कि उसका काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है. वह समझ गया कि यन्त्र मंत्र तन्त्र केवल दुनिया को बचाने का एक उपकरण नहीं था, बल्कि एक जिम्मेदारी, एक बोझ भी था जिसे उसे अपने बाकी दिनों के लिए सहन करना होगा। 

और इसलिए, उस शक्तिमान ने यन्त्र मंत्र तन्त्र के भीतर निहित ज्ञान की रक्षा और संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह गलत हाथों में नहीं पड़ेगा और बुरे उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाएगा। उन्होंने दुनिया की यात्रा की, दूसरों को संतुलन और सद्भाव के महत्व के बारे में सिखाया, और जो कोई भी सुनने को तैयार था, उसके साथ यन्त्र मंत्र तन्त्र का ज्ञान साझा किया। उस शक्तिमान के मार्गदर्शन में, एक नई व्यवस्था का जन्म हुआ, जहां यंत्र मंत्र तंत्र की शक्ति को जिम्मेदारी से और अधिक अच्छे को ध्यान में रखकर संचालित किया गया था। 

लेकिन जब  शक्तिमान ने दुनिया के भविष्य की सुरक्षा के लिए अथक प्रयास किया, तब भी वह जानता था कि उसका समय समाप्त होने वाला है. वह बूढ़ा हो रहा था, और यंत्र मंत्र तंत्र का ज्ञान ले जाने का बोझ उस पर भारी पड़ रहा था. आरन सोचने लगा कि जब वह चला जाएगा तो उसकी जगह कौन लेगा, जो काम उसने शुरू किया था उसे कौन जारी रखेगा। 

यह तब था जब शक्तिमान नामक उस सुपरमैन ने अपने आस-पास समान विचारधारा वाले व्यक्तियों के एक समूह को इकट्ठा करने का फैसला किया, जिन्होंने यंतर मंत्र तंतर की शक्ति से संतुलित दुनिया के अपने दृष्टिकोण को साझा किया. उन्होंने उन्हें प्राचीन ग्रंथों के तरीकों में प्रशिक्षित किया, उन्हें न केवल अपनी शक्ति का उपयोग करना सिखाया बल्कि जिम्मेदारी से इसका उपयोग करना भी सिखाया. जैसे-जैसे वर्ष बीतते गए, इन व्यक्तियों ने यंत्र मंत्र तंत्र के आदेश के रूप में जाना जाने लगा। 

इस सारे अनुशासन और प्रबंधन को कई शाखाओं में व्यवस्थित किया गया था, जिनमें से प्रत्येक यन्त्र मंत्र तंत्र की शिक्षाओं के एक अलग पहलू में विशेषज्ञता रखती थी. ऐसे लोग थे जिन्होंने खगोल विज्ञान और ज्योतिष पर ध्यान केंद्रित किया, आकाशीय पिंडों की गतिविधियों का अध्ययन किया और दुनिया पर उनके प्रभावों की व्याख्या की. अन्य लोग कीमिया में उतर गए, तत्वों की शक्ति का उपयोग करने और नए पदार्थ बनाने की कोशिश की, जबकि अन्य ने बीमारियों के लिए नए इलाज और उपचार विकसित करने के लिए प्राचीन ग्रंथों का उपयोग करते हुए, उपचार और चिकित्सा के अध्ययन के लिए खुद को समर्पित कर दिया। 

जैसे-जैसे  सुपरमैन अपनी बालपन की उम्र में से निकलता हुआ में बड़ा हुआ, उसने अपने सबसे होनहार छात्रों को इस नए युग के नेताओं के रूप में कार्यभार संभालने के लिए तैयार करना शुरू कर दिया।  वह जानता था कि अंततः, उसका समय आएगा, और वह यह सुनिश्चित करना चाहता था कि उसने जो ज्ञान संरक्षित किया था वह पीढ़ियों तक चलता रहे. इन वर्षों में, आरन ने गर्व के साथ देखा क्योंकि उनके छात्र अपने आप में बुद्धिमान और सक्षम नेताओं में विकसित हुए, प्रत्येक व्यक्ति ने यंत्र मंत्र तंत्र की प्राचीन शिक्षाओं के लिए अपने स्वयं के अनूठे दृष्टिकोण और व्याख्याएं लायीं। 

किसी अलग पोस्ट में पढ़िए  कहां कहां होता है ज्योतिष के आधार पर बिमारियों का इलाज