Thursday, 26 March 2020

इच्छापूर्ति वॄक्ष आपके पास भी है

चाहो तो आज ही पा लो--लेकिन साधना तो करनी ही होगी 
चर्चा-विचार चर्चा और नए पहलू: 26 मार्च 2020: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::
आप ने इच्छापूर्ति वृक्ष की कहानी सुनी है? जीवन की विकट स्थितियों पर नियन्त्रण पाने के बहुत ही गहरे रहस्य हैं उसमें। सुना है एक घने जंगल में एक इच्छापूर्ति वृक्ष था, उसके नीचे बैठ कर कोई भी इच्छा करने से वह तुरंत पूरी हो जाती थी। किसी को भी इसका एतबार न होता लेकिन थी यह एक हकीकत। 
यह बात बहुत कम लोग जानते थे..क्योंकि उस घने जंगल में जाने की कोई हिम्मत ही नहीं करता था। इसलिए इस लिए इस हकीकत को बहुत ही कम लोग जानते थे लेकिन बिना जानने इसे मानने वालों की संख्या भी कम न थी। इस तरह यह एक किवदन्ती भी बन गयी। 
इन्हीं कहानियों के बीच एक बार संयोग से एक थका हुआ व्यापारी उस वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए बैठ गया उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी नींद लग गई। उस पेड़ के नीचे सपने भी बहुत सुंदर आये। उस दिन नींद भी बहुत अच्छी आई। जाग खुली तो आत्मविश्वास भी पहले से ज्यादा था और मूड भी बहुत अच्छा। लेकिन भूख कहाँ टिकने देती है यह सब? जागते ही उसे बहुत भूख लगी,उसने आस पास देखकर सोचा- 'काश !
कुछ खाने को मिल जाए ! तत्काल स्वादिष्ट पकवानों से भरी थाली हवा में तैरती हुई उसके सामने आ गई।
व्यापारी ने भरपेट खाना खाया और भूख शांत होने के बाद सोचने लगा..काश कुछ पीने को मिल जाए..तत्काल उसके सामने हवा में तैरते हुए अनेक शरबत आ गए। यह तो कमाल हो गया था।  यकीन ही नहीं हो रहा था। कभी कभी सुख का भी यकीन नहीं होता। आनन्द भी हो तो भी सपना ही लगने लगता है। 
इस तरह का मीठा शरबत पहले कभी न पिया था। शरबत पीने के बाद वह आराम से बैठ कर सोचने लगा-कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूं। दिल में आशंका अपना घर बनाने लगी। शक उठने शुरू हो गए। शक के साथ ही मनोस्थिति भी बदलने लगी। 
वह हैरान था।  बेहद हैरान। हवा में से खाना पानी प्रकट होते पहले कभी नहीं देखा था-न ही सुना था।  उसे लगा जरूर इस पेड़ पर कोई भूत रहता है जो मुझे खिला पिला कर मोटा ताज़ा कर रहा है और बाद में मुझे खा लेगा। मन में उठी आशंका विकराल रूप लेने लगी। हम से बहुतों के साथ यही तो होता है। बस ऐसा सोचना ही था कि तत्काल उसके सामने एक भूत आया और उसे खा गया। उसे हैरान होने और सवाल पूछने का भी मौका नहीं मिला। देखते ही देखते वह वर्तमान से अतीत बन गया। अक्सर हममें से अधिकांश की जिंदगी के साथ यही तो होता है। सारी उम्र खत्म हो जाती है लेकिन हम ज़िंदगी को पहचान ही नहीं पाते। नकारत्मक विचरों की भीड़ में हम अपना हर सकारत्मक गुण गंवा बैठते हैं। सब कुछ लुटा के होश में आते हैं लेकिन उस समय कुछ सम्भव ही नहीं होता। 
इच्छापूर्ति वृक्ष और भूत के इस प्रसंग से भी आप यह सीख सकते है कि हमारा मस्तिष्क ही इच्छापूर्ति वृक्ष है आप जिस चीज की प्रबल कामना करेंगे वह आपको अवश्य मिलेगी। यह बात शत प्रतिशत सही है। इसलिए कोई इच्छा भी करना तो बहुत ही सोच समझ कर ही करना वरना खुद के जाल में ही उलझ कर रह जाओगे। 
यही वजह है कि अधिकांश लोगों को जीवन में बुरी चीजें इसी लिए मिलती हैं क्योंकि वे बुरी चीजों की ही कामना करते हैं। जाने या अनजाने वे इन नैगेटिव विचारों से ही घिरे रहते हैं। इन नैगेटिव विचारों से उनके कर्म हबी भी नैगेटिव ही होते चले जाते हैं। इस पर वे खुद को नहीं सुधारते बस किस्मत को कोसते हैं जिसका कोई कसूर ही नहीं होता। किस्मत तो उनको भी बहुत कुछ दे रही थी लेकिन उन्होंने बुरा ही चुना। 
ऍम इन्सान की रोज़ की ज़िंदगी पर ज़रा एक नजर तो डालो। इंसान ज्यादातर समय सोचता है-कहीं बारिश में भीगने से मै बीमार न हों जाँऊ..और वह बीमार हो जाता हैं..! यह सब तकरीबन हर रोज़ होता है। इसी तरह बार बार इंसान सोचता है - मेरी किस्मत ही खराब है .. और उसकी किस्मत सचमुच खराब हो जाती हैं ..! उसके हाथ में आये बहुत से सुनहरी अवसर झट से निकल जाते हैं। इस तरह आप देखेंगे कि आपका अवचेतन मन इच्छापूर्ति वृक्ष की तरह आपकी इच्छाओं को ईमानदारी से पूर्ण करता है..! आप क्या पाना चाहते हैं यह आप ने ही फैसला करना है। इसलिए आपको अपने मस्तिष्क में विचारों को सावधानी से प्रवेश करने की अनुमति देनी चाहिए। यदि गलत विचार अंदर आ जाएगे तो गलत परिणाम मिलेंगे। विचारों पर काबू रखना ही अपने जीवन पर काबू करने का रहस्य है..! इसके बाद ही शुरू होता है विजय या पराजय का सिलसिला। आपके विचारों से ही आपका जीवन या तो.. स्वर्ग बनता है या नरक..उनकी बदौलत ही आपका जीवन सुखमय या दुख:मय बनता है...।
यह बहुत बड़ा सत्य है कि वास्तव में विचार जादूगर की तरह होते है जिन्हें बदलकर आप सचमुच अपना जीवन बदल सकते है।  इसलिये सदा सकारात्मक सोच रखें। यदि आप अच्छा सोचने लगते है तो पूरी कायनात आपको और अच्छा देने में लग जाती है। इसलिए देरी मत कीजिये। आज ही कीजिये विचारों में परिवर्तन और पाईये मन चाही मुराद। 

Monday, 23 March 2020

31 मार्च तक बंद रहेगी जामा मस्जिद दिल्ली में

Monday 23rd March 2020 at 18 :45 
कोरोना न फैले--इसलिए उठाया महत्वपूर्ण कदम 
नयी दिल्ली: 23 मार्च 2020: (आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::
कोरोना कहर का सामना करने के लिए अब धार्मिक संगठन भी खुल कर सामने आ रहे हैं। कोरोना से बचाव के लिए शुरू लॉक डाऊन को सफल बनाने के लिए धार्मिक स्थलों के प्रबंधन भी महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं। 
दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद कोरोना वायरस महामारी की वजह से नमाज़ियों के लिए 31 मार्च तक बंद रहेगी। लोगों को अपने अपने घरों में नमाज़ अदा करने को कहा गया है। जामा मस्जिद के इस कदम से कोरोना को हराने में काफी मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि ज़्यादा  कोरोना को नए शरीर मिलते हैं।
जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने सोमवार को कहा कि बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए एहतियाती उपाय के तहत इस बाबत फैसला लिया गया है, क्योंकि विदेश से लौटने वाले कई लोग मस्जिद में नमाज़ अदा करने आते हैं।  बुखारी ने कहा कि इस दौरान मस्जिद में अज़ान तो होगी लेकिन मस्जिद में लोगों को नमाज़ अदा करने की इजाजत नहीं होगी। ऐसा करने से बहुत बड़ी भीड़ जमा मस्जिद में नहीं पहुंचेगी। लोग एक जगह एकत्र नहीं होंगें। गौरतलब है कि यहाँ नमाज़ियों के एकत्र होने क्षमता बहुत बड़ी है। 
इमाम सैयद अहमद बुखारी ने कहा कि मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा बनवाई गई मस्जिद में रोजाना करीब दो हजार लोग नमाज पढ़ते हैं जबकि जुमे (शुक्रवार) को यह तादाद 10,000 के पार चली जाती है। इसलिए जमा मस्जिद के इस फैसले से बचाव अभियान को बाउट बड़ी सफलता मिलेगी। 
इस संबंध में विवरण देते हुए शाही इमाम बुखारी ने कहा कि एहतियाती उपाय के तहत हम नमाज़ अदा करने के लिए मस्जिद को 31 मार्च तक बंद कर रहे हैं। हमने लोगों से अपील की है कि वे इस दौरान अपने घरों में ही नमाज़ पढ़ें। इस फैसले से नमाज़ी लोग निश्चय ही भीड़ में नहीं जायेंगे और  घरों के एकांत माहौल में नमाज़ अदा करेंगे। लुधियाना में स्थित जमा मस्जिद के शाही इमाम (पंजाब) पहले ही इस संबंध में अहम एलान कर चुके हैं।
पंजाब स्क्रीन हिंदी में भी पढ़िए यही खबर
कर्फ्यू के दौरान छूट अब बुधवार 25 मार्च को ही मिलेगी

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Curfew Relaxation Starts From 25th March Wednesday

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ਕਰਫਿਊ ਦੌਰਾਨ ਖੁੱਲ੍ਹ 25 ਮਾਰਚ (ਬੁੱਧਵਾਰ) ਤੋਂ ਹੀ ਮਿਲੇਗੀ

Sunday, 15 March 2020

पूरी तरह वैज्ञानिक हैं हवन के फायदे

Saturday: 14th March 2020 at 09:52 PM  
अब विज्ञान ने भी पूरी बारीकी से परख कर देख लिया 
हवन के लिए तैयारी की यह तस्वीर सेंट्रल बैंक आफ इंडिया की एक शाखा में हुई पूजा के दौरान आराधना टाईम्ज़ द्धारा ली गयी थी
कुछ लोग विदेश में रह कर भी स्वदेश से प्रेम बनाये रखते हैं। अपने धर्म और संस्कृति को दिल और दिमाग में संजोये रखते हैं।  मधु गजाधर भी ऐसे अनमोल लोगों में से एक हैं। हवन पर उनका एक खोजपूर्ण आलेख हम यहां आराधना टाईम्ज़ के पाठकों के लिए भी दे रफ़हे हैं। आशा है आपको अच्छा लगेगा। इस पर आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही। -रेक्टर कथूरिया 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 14 मार्च 2020: (*मधु गजाधर//आराधना टाईम्ज़)::
फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमे उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है जो की खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओ को मारती है तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।
(२) टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।
(३) हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है अथवा नही. उन्होंने ग्रंथो. में वर्णित हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया की ये विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा की सिर्फ आम की लकड़ी १ किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बॅक्टेरिया का स्तर ९४ % कम हो गया। यही नही. उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया की कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओ का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। बार बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ की इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था। 
यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर २००७ में छप चुकी है।
रिपोर्ट में लिखा गया की हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।
क्या हो हवन की समिधा (जलने वाली लकड़ी):-👇
समिधा के रूप में आम की लकड़ी सर्वमान्य है परन्तु अन्य समिधाएँ भी विभिन्न कार्यों हेतु प्रयुक्त होती हैं। सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मङ्गल की खैर की, बुध की चिड़चिडा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु दूर्वा की और केतु की कुशा की समिधा कही गई है।
मदार की समिधा रोग को नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है।
हव्य (आहुति देने योग्य द्रव्यों) के प्रकार
प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वायुमण्डल रहते हैं। सर्दी, गर्मी, नमी, वायु का भारीपन, हलकापन, धूल, धुँआ, बर्फ आदि का भरा होना। विभिन्न प्रकार के कीटणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है। इसलिए कई बार वायुमण्डल स्वास्थ्यकर होता है। कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इस प्रकार की विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं, जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं।
होम द्रव्य-
होम-द्रव्य अथवा हवन सामग्री वह जल सकने वाला पदार्थ है जिसे यज्ञ (हवन/होम) की अग्नि में मन्त्रों के साथ डाला जाता है।
(१) सुगन्धित : केशर, अगर, तगर, चन्दन, इलायची, जायफल, जावित्री छड़ीला कपूर कचरी बालछड़ पानड़ी आदि
(२) पुष्टिकारक : घृत, गुग्गुल ,सूखे फल, जौ, तिल, चावल शहद नारियल आदि
(३) मिष्ट - शक्कर, छूहारा, दाख आदि
(४) रोग नाशक -गिलोय, जायफल, सोमवल्ली ब्राह्मी तुलसी अगर तगर तिल इंद्रा जव आमला मालकांगनी हरताल तेजपत्र प्रियंगु केसर सफ़ेद चन्दन जटामांसी आदि

उपरोक्त चारों प्रकार की वस्तुएँ हवन में प्रयोग होनी चाहिए। अन्नों के हवन से मेघ-मालाएँ अधिक अन्न उपजाने वाली वर्षा करती हैं। सुगन्धित द्रव्यों से विचारों शुद्ध होते हैं, मिष्ट पदार्थ स्वास्थ्य को पुष्ट एवं शरीर को आरोग्य प्रदान करते हैं, इसलिए चारों प्रकार के पदार्थों को समान महत्व दिया जाना चाहिए। यदि अन्य वस्तुएँ उपलब्ध न हों, तो जो मिले उसी से अथवा केवल तिल, जौ, चावल से भी काम चल सकता है।
सामान्य हवन सामग्री-
तिल, जौं, सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , पानड़ी , लौंग , बड़ी इलायची , गोला , छुहारे नागर मौथा , इन्द्र जौ , कपूर कचरी , आँवला ,गिलोय, जायफल, ब्राह्मी.
मधु गजाधर मॉरिशियस ब्राडकास्टिंग कार्पोरेशन में मीडिया प्रेसेंटर हैं। लम्बे समय से अपने विचार बहुत बेबाकी से रखती ा रही हैं। हवन पर उनका यह आलेख हम उनके फेसबुक प्रोफाईल से साभार दे रहे हैं। 

Saturday, 15 February 2020

संकीर्तन और साधना मन को सहजता से वश में करना सिखाते हैं

आनंदमार्ग की साधना ले जाती है प्रगति पथ पर 
लुधियाना: 15 फरवरी 2020: (रेक्टर कथूरिया//आराधना टाईम्ज़)::
मन बहुत चंचल है। जल से भी अधिक तरल है शायद। जैसे ही नीचे की तरफ ले जाने वाला ज़रा सा कोई ख्याल आया तो मन उसी तरफ चल निकलता है। शरीर तो उसका अनुचर है।  वफादार नौकर। तुरंत शरीर भी मन के पीछे पीछे चल निकलता है। इसका अहसास मुझे स्वयं भी कई कई बार हुआ है। विभिन्न धार्मिक संगठनों में कई कई तरह की विधियाँ हैं वे सभी इस मन के नियन्त्रण को बनाये रखने का ही काम करती हैं। आनंदमार्ग बहुत ही नया धर्म है। इसे धर्म के तौर पर मान्यता दिलाने के लिए बहुत संघर्ष भी हुआ है। दमन और विरोध के बावजूद आनन्दमार्ग ने दुनिया भर में अपनी जगह बनायी है। तीखे विरोधों के बावजूद आनन्दमार्ग ने न अपनी दिनचर्या बदली न ही मर्यादा और न ही पूजा पद्धति। शरीर से ले कर आत्मा तक खुद को उंचाईयों के शिखर तक पहुँचाने की विधा आनन्दमार्ग के साधकों को दीक्षा के समय ही सिखा दी जाती हैं जिनका क्रमिक विकास समय और साधना के साथ साथ चलता है लेकिन मन की चंचलता बहुत से साधकों को फिर दुनिया के चक्कर में फंसा कर साधना से विमुख कर देती है या फिर कमजोर कर देती है। आनन्द मार्ग के सेमिनार इस नाज़ुक स्थिति में भी साधक को साधना में भी परिपक्व बनाते हैं और जीवन की सफलता के गुर भी बताते हैं। आनन्दमार्ग दुनिया में रहते हुए अध्यात्मिक साधना से जोड़ने के रहस्य सिखाता है। दुनिया में रह कर भी आनन्द मार्ग का  सच्चा साधक परमपिता से जुड़ा रहता है। जैसे कमल का फूल कीचड़ में रह कर भी स्वच्छ बना रहता है उसी तरह आनन्द मार्ग  का साधक भी खुद पर दुनिया के घातक प्रभाव नहीं पड़ने देता। आनन्द मार्ग चुनौतियों से भागने का रास्ता नहीं दिखाता बल्कि उनका सामना करने का साहस देता है। यह साहस हर रोज़ सुबह पांच बजे उसे मिलता है निरंतर साधना के शुभारम्भ से। आनन्द मार्ग की साधना के दरम्यान अक्सर चमत्कारों का अहसास भी कई बार होता है लेकिन बाबा कहते हैं इस तरफ ध्यान भी मत दो वरना नुकसान होगा।  इसे देख ज़रूर लेता है लेकिन इन चमत्कारों की तरफ आकर्षित नहीं होता। उसका रास्ता वही है साधना का रास्ता। संघर्ष, हिम्मत और सही रास्ते पर कठिनाइयों के बावजूद आगे बढना सिखाता है आनंदमार्ग। 
लुधियाना के न्यू कुंदनपुरी स्थित जागृति और अन्य स्थानों पर होते ही रहते हैं ऐसे आयोजन।  पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ इत्यादि बहुत से स्थानों पर होते हैं आयोजन। कभी कहीं तो कभी कहीं। जो लोग जागृति से जुड़े रहते हैं उनको ऐसे आयोजनों का सारा कर्यक्रम समय पर पता लगता रहता है। मुझे याद है वर्ष 2018 मुझे भी  सेमिनार में शामिल होने का सौभाग्य मिला। इस अवसर पर आचार्य कल्याण मित्रानंद अवधूत मुख्य वक्त थे। उन्होंने साधना और ज़िंदगी की बहुत सी बरीकियां बहुत ही सादगी भरे शब्दों से समझायीं। "पंचजन्य" की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सुबह पांच बजे उठने के नियम का पालन आवश्यक है। उस समय "बाबा नाम केवलम" का कीर्तन किसी संगीत सिस्टम से सुनने की बजाये खुद गायन करना चाहिए।  ऐसा करने से ज़्यादा लाभ होगा।
उन्होंने और अन्य वक्ताओं ने ज़िंदगी की छोटी बड़ी मुश्किलों का ज़िक्र भी किया। कैसे सामना करना है इन चुनौतियों का इस गुर भी सिखाया। जब मन डगमगाने लगे, जी घबराने लगे तब कैसे संभालना है खुद को। इन सभी समस्याओं के बहुत  गुर हैं आनंदमार्ग के पास। 
सुबह सुबह पांच बजे उठना आनंदमार्ग के लाईफ स्टाईल में एक आवश्यक नियम है। दिलचस्प बात है कि उस समय नींद भी ज़ोरों से आती है। दिल करता है सब छोडो और थोड़ी देर और सो। आचार्य कल्याण मित्रानन्द ने नींद की  इन मीठी झपकियों में मस्त होने से भी सावधान किया और बताया कि हम आचार्य लोग मुश्किल से केवल तीन घंटे ही सो पाते हैं और इसी में हमारी नींद पूरी हो जाती है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर साधना से जुड़ोगे तो घड़ी का अलार्म तो बाद में बोलेगा लेकिन अपने शरीर में छुपा मन का अलार्म पहले बजेगा।  उसे सुनना सीखना आवश्यक है। उन्होंने याद दिलाया कि उस वक़्त बाबा आते हैं और साधक के पास होते हैं। इस तरह इस पद्धति से जहाँ तन मन अरोग रहते हुए वश में तेहते हैं वहीँ ज़िंदगी की अन्य बड़ी बड़ी समस्याएं भी सहजता से हल होती जाती हैं। 

Sunday, 9 February 2020

मुझे गर्व है कि मुझे आज भी हनुमान चालीसा कंठस्त है

 7th February 2020 at 12:01 AM 
कम से कम मेरे लिए तो हिन्दू होना कोई शर्म की बात नहीं 
मैं जब भी 18 के आसपास के हौसलामंद नौजवानों को नास्तिक होते देखता हूँ तो मुझे बुरा नहीं लगता।
प्रमोद शुक्ला 
पर मैं जब इन्हें नमाज़, कुरान, वुज़ू, इस्लाम और मुसलमानों की इज़्ज़त करते देखता हूँ तो अच्छा लगता है।

लेकिन जब यही YOUNG GUNS मंदिर में होती आरती का या भगवान की मूरत और उसकी पूजा का मज़ाक बनाते हैं तो दुःख होता है लेकिन टोकना फ़िज़ूल लगता है क्योंकि मुझे इनकी कोई ग़लती नज़र नहीं आती।

वहीं जब मैं किसी मुस्लिम परिवार के पांच साल के बच्चे को भी बाक़ायदा नमाज़ पढ़ते देखता हूँ तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। मुस्लिम परिवारों की ये अच्छी चीज़ है कि वो अपना धर्म और अपने संस्कार अपनी अगली पीढ़ी में ज़रूर देते हैं। कुछ पुचकारकर तो कुछ डराकर, लेकिन उनकी नींव में अपने बेसिक संस्कार गहरे घुसे होते हैं।

यही ख़ूबसूरती सिखों में भी है। एक बार छुटपन में मैंने एक सरदार का जूड़ा पकड़ लिया था। उसने मुझे उसी वक़्त तेज़ आवाज़ में सिर्फ समझाया ही नहीं, धमकाया भी था। तब बुरा लगा था, लेकिन आज याद करता हूँ तो अच्छा लगता है।

हिन्दू धर्म चाहें कितना ही अपने पुराने होने का दावा कर ले, पर इसका प्रभाव अब सिर्फ सरनेम तक सीमित होता जा रहा है। मैं अक्सर देखता हूँ कि मज़ाक में लोग किसी ब्राह्मण की चुटिया खींच देते हैं। वो हँस देता है।

एक माँ आरती कर रही होती है, उसका बेटा जल्दी में प्रसाद छोड़ जाता है, लड़का कूल-डूड है, उसे इतना ज्ञान है कि प्रसाद गैरज़रूरी है।

बेटी इसलिए प्रसाद नहीं खाती कि उसमें कैलोरीज़ ज़्यादा हैं, उसे अपनी फिगर की चिंता है।

छत पर खड़े अंकल जब सूर्य को जल चढ़ाते हैं तो लौंडे हँसते हैं, 'बुड्ढा कब नीचे जायेगा और कब इसकी बेटी ऊपर आयेगी?'

दो वक़्त पूजा करने वाले को हम सहज ही मान लेते हैं कि साला दो नंबर का पैसा कमाता होगा, इसीलिए इतना अंधविश्वास करता है। 'राम-राम जपना, पराया माल अपना' ये तो फिल्मों में भी सुना है।

इसपर माँ टालती हैं 'अरे आज की जेनरेशन है जी, क्या कह सकते हैं, मॉडर्न बन रहे हैं।'

पिताजी खीज के बचते हैं 'ये तो हैं ही ऐसे, इनके मुँह कौन लगे'

नतीजतन बच्चों का पूजा के वक़्त हाज़िर होना मात्र दीपावली तक सीमित रह जाता है।

यही बच्चे जब अपने हमउम्रों को हर शनिवार गुरुद्वारे में मत्था टेकते या हर शुक्रवार विधिवत नमाज़ पढ़ते या हर सन्डे चर्च में मोमबत्ती जलाते देखते हैं तो बहुत फेसिनेट होते हैं। सोचते हैं ये है असली गॉड, मम्मी तो यूंही थाली घुमाती रहती थी। अब क्योंकि धर्म बदलना तो पॉसिबल नहीं, इसलिए मन ही मन खुद को नास्तिक मान लेते हैं।

शायद हिन्दू अच्छे से प्रोमोट नहीं कर पाए। शायद उन्हें कभी ज़रूरत नहीं महसूस हुई। शायद आपसी वर्णों की मारामारी में रीतिरिवाज और पूजा पाठ 'झेलना' सौदा बन गया

वर्ना...

सूरज को जल चढ़ाना सुबह जल्दी उठने की वजह ले आता है। सुबह पूजा करना नहाने का बहाना बन जाता है और मंदिर घर में रखा हो तो घर साफ सुथरा रखने का कारण बना रहता है। घण्टी बजने से जो ध्वनि होती है वो मन शांत करने में मदद करती है तो आरती गाने से कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ता है। हनुमान चालीसा तो डर को भगाने और शक्ती संचार करने के लिए सर्वोत्तम है।

 सुबह टीका लगा लो तो ललाट चमक उठता है। प्रसाद में मीठा खाना तो शुभ होता है भई, टीवी में एड नहीं देखते?

संस्कार घर से शुरु होते हैं। जब घर के बड़े ही आपको अपने संस्कारों के बारे में नहीं समझाते तो आप इधर-उधर भटकते ही हैं जो की बुरा नहीं, भटकना भी ज़रूरी है। लेकिन इस भटकन में जब आपको कोई कुछ ग़लत समझा जाता हैं तो आप भूल जाते हो कि आप उस शिवलिंग का मज़ाक बना रहे हो जिसपर आपकी माँ हर सोमवार जल चढ़ाती है।

लेकिन मैं किसी को बदल नहीं सकता। मैं किसी के ऊपर कुछ थोपना नहीं चाहता। मैं सिर्फ अपना घर देख सकता हूँ।

मुझे गर्व है कि मुझे आज भी हनुमान चालीसा कंठस्त है। शिव स्तुति मैं रोज़ करता हूँ। सूरज को जल चढ़ाना मेरे लिए ओल्ड फैशन नहीं हुआ है। दुनिया मॉडर्न है इसलिए भजन यू-ट्यूब पर सुन लेते हैं। *श्रीकृष्ण को अपना आइडल मानता हूँ।*  मुझे यकीन है कि ये सब मेरी आने वाली जेनेरेशन मुझसे ज़रूर सीखेगी।

मैं गुरुद्वारे भी जाता हूँ। चर्च भी गया हूँ। कभी किसी धर्म का मज़ाक नहीं उड़ाया है, हर धर्म के रीति-रिवाज़ पर मैं तार्किक बहस कर सकता हूँ लेकिन किसी को भी इतनी छूट नहीं देता हूँ कि मेरे सामने मूर्तियों का मज़ाक बनायें।

कम से कम मेरे लिए तो हिन्दू होना कोई शर्म की बात नहीं रही। आपके लिए हो भी तो मज़ाक न बनाएं, चाहें जिसकी आराधना करें, लेकिन मूर्तियों को उपहासित न करें।

  *🌹यत्र धर्मस्य ततो जयः🌹*
-एम पी अग्रवाल
*प्रमोद शुक्ल पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं और ज्योतिष का भी विशेष ज्ञान रखते हैं। धर्म के मामले में वह बहुत सैद्धांतिक हैं। किसी को बुरा नहीं कहते। अन्य लोगों से भी यही अपेक्षा।  उनका यह आलेख उनके फेसबुक प्रोफ़ाइल से साभार लिया गया है।  

Wednesday, 1 January 2020

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Sunday, 22 December 2019

आज की ज़्यादातर थरेपियाँ मेंटल वेकेशंज़ ही हैं-साध्वी वीरेशा भारती

Sunday:Dec 22, 2019, 6:40 PM
दिव्य ज्योति जागृति सतसंग में हुई आध्यात्मिक रहस्यों की गहन चर्चा 
लुधियाना: 22 दिसंबर 2019:(आराधना टाईम्ज़ ब्यूरो)::
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा कैलाश नगर में सत्संग का आयोजन किया गया। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी वीरेशा भारती जी ने बताया कि आजकल कल्पना पर आधारित बहुत सी  ध्यान-साधनाएं एवं पद्धतियां प्रचलित हैं। बहुत से मनोचिकित्सक भी इन पद्धतियों को थेरेपी के रूप में अपने मरीजों पर आज़माते हैं। उन्हें मेंटल वेकेशन्स (मानसिक छुट्टियों) पर ले जाते हैं। रंग बिरंगी ख्याली दुनिया की सैर कराते हैं। इन सभी ध्यान पद्धतियों का मकसद होता है तनावग्रस्त इंसान को शांति की अनुभूति करवाना। जिस उपकरण के माध्यम से यह कल्पना की उड़ान भरी जाती है उसे मनोवैज्ञानिक मन की आंख  कहते हैं। उनका मानना है कि सब कुछ मन से होता है और मन के स्तर  पर ही होता है। अब क्योंकि इस सारी प्रक्रिया में मन ही कर्ताधर्ता है, इसीलिए इस माध्यम से आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर वास्तविक आनंद को पाना असंभव है। यह सीधा सीधा अनुपात पूर्ण तर्कसंगत है। वह इसलिए कि जो सत्ता आत्मस्वरूप मन के दायरे में आती ही नहीं उसकी अनुभूति मन कैसे कर सकता है। चाहे वह कितनी ही ऊंची छलांग क्यों ना लगा ले।
 गीता में भगवान श्री कृष्ण जी कहते हैं कि इंद्रियों से ऊपर मन है ,मन से ऊपर बुद्धि है और आत्मा  बुद्धि से भी ऊपर है। यानी कि  आत्मा का क्षेत्र मन व बुद्धि से बहुत ऊंचा है। मनोविज्ञान में भी आत्म सत्ता को मन से उच्चा माना गया है। विख्यात मनोवैज्ञानिक मास्लो पिरामिड के अनुसार भी सबसे ऊपर आत्मस्वरूप में स्थित होना है। इस शीर्ष पद के नीचे आती है तन और मन से जुड़ी आवश्यकताएं। अतः दूसरे शब्दों में कहें तो मन की परिधि इतनी विस्तृत नहीं कि उसमें आत्मा को सम्मिलित किया जा सके। इसलिए मन अपनी कल्पना के कितने भी पंख क्यों न पसार ले। उसकी  पहुंच आत्म- अनुभव तक जा ही नहीं सकती। अतः आत्म तत्व को देखने के लिए हमें उसी स्तर के उपकरण को प्राप्त करना होगा। इस उपकरण को ब्रह्म ज्ञानी महापुरुषों ने आई ऑफ द सोल अर्थात दिव्य चक्षु की संज्ञा दी है। जो समय के पूर्ण गुरु ही सक्रिय कर सकते हैं। सार रूप में आप भी अपने जीवन में ऐसे तत्व वेता ब्रह्मनिष्ठ सतगुरु की खोज करें जो आपको ब्रह्म ज्ञान की परम विद्या से दीक्षित कर सके।